बुधवार, 29 अप्रैल 2020

रवि अरोड़ा की नजर में




वेदान्त बारास्ता स्पिनोज़ा

रवि अरोड़ा

मेरे मोहल्ले के मंदिर में हर मंगलवार को बहुत भीड़ रहती थी । प्रसाद चढ़ाने वाले ही नहीं बेचने वाले और इसे लेने वाले भिखारियों की भी अच्छी ख़ासी रेलमपेल रहती है उस दिन । मगर इस मंदिर के तमाम मंगलवार आजकल सूने-सूने से होते हैं। मेरे मोहल्ले का मंदिर ही क्यों , देश दुनिया के तमाम मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, गिरजाघर और अन्य सभी पूजा स्थल भी तो आजकल वीरान हैं । कोरोना के आतंक ने पूरी दुनिया की रौनक़ ग़ायब की है तो आदमी द्वारा बनाये गये भगवान के घर भी सुनसान क्यों न होंगे ? यक़ीनन तमाम पूजाघरों की वीरानगी ईश्वर के घर की वीरानगी नहीं हो सकती मगर वह शायर ही क्या जो इस पर बात कुछ तंज न करे या चुटकी न ले । अब उर्दू के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम को ही लीजिये जिन्होंने लगभग आधी सदी पहले ही पूजाघरों की कुछ एसी ही वीरानगी पर यह शेर कह दिया था- दिल ख़ुश हुआ है मस्जिद-ए-वीराँ को देख कर ,मेरी तरह ख़ुदा का भी ख़ाना ख़राब है । अब अदम साहब जितनी समझ और साहस तो मुझमे नहीं मगर दो चार छोटी मोटी बातें तो मैं भी इस मौक़े पर कर ही सकता हूँ ।

सनातन धर्म शाश्वत है , इसमें कोई दो राय नहीं । मगर वेद और उपनिषद से शुरू हुई हमारी आस्थाएँ न जाने कहाँ कहाँ घूमती हुई अब कर्मकांडों में जाकर अटक गई हैं । पाप-पुण्य का एसा खेल हमारे साथ खेला गया है कि अब उनसे बाहर आने का कोई रास्ता ही नहीं सूझता । नैतिकता से मुँह चुराने को हमने धार्मिक स्थलों के चक्कर काटने शुरू कर दिये । बेशक तात्कालिक तौर पर ही सही मगर कोरोना की वजह से इस दिशा में अब कुछ आराम तो पड़ा है । बिज़नस मोडयूल बन चुके तमाम धार्मिक स्थलों की वीरानगी का बस इतना ही अर्थ है , इसे विज्ञान की धर्म पर बढ़त के रूप में क़तई नहीं आँका जा सकता । उधर, हमारी पीढ़ी की याददाश्त का यह पहला रमज़ान होगा जब इफ़्तियार दावतें नहीं हो रही होंगीं । पता नहीं अभी और कौन कौन से पूजा पाठ के दिन इसी प्रकार सोशल डिसटेंसिंग में बीतने हैं ।

विद्वान समझाते हैं कि कर्मकांडों से छुटकारा पाने के लिए हमें वेदान्त की और लौटना होगा । वेदान्त यानि वेदों का अंत यानि उनका सार अर्थात उपनिषद । मगर दुनिया पीछे तो लौटती नहीं । उसे तो हर मार्ग आगे की ओर चाहिये । तो आइये आगे के मार्ग की ही बात करते हैं ।बारूथ डी स्पिनोज़ा को याद करते हैं । वही स्पिनोज़ा जिसके ईश्वर को आइंस्टीन भी मानते थे । हमारे वेदान्त जैसी बातें ही तो करते हैं स्पिनोज़ा । ईश्वर को मनाने, उसकी चापलूसी करने और उसने डरने की बजाय उससे प्रेम की बात करते हैं स्पिनोज़ा । प्रेम भी भावुकता से नहीं वरन तन्मयता से भरा प्रेम यानि बौद्धिक प्रेम । स्पिनोज़ा वही सब तो कह रहे हैं जो हमारे वेद कहते हैं । आदि शंकराचार्य के अद्वैत की भाँति जीव और जगत को अलग न मानने की बात ही तो करते हैं स्पिनोज़ा ।

 स्पिनोज़ा का ईश्वर इंसान से कहता है कि मुझसे प्रेम करना है तो मेरी बनाई दुनिया से प्रेम करो । उसका ईश्वर हमसे कहता है कि एसा तुमने सोच भी कैसे लिया कि मैं तुम्हें तुम्हारे किये की सज़ा अथवा इनाम दूँगा । क्यों सुबह शाम मेरे आगे नाक रगड़ कर अपना वक़्त ख़राब करते हो । तुम्हारे धार्मिक स्थल मैंने नहीं बनाये , वे मेरा घर क़तई नहीं हैं । मैं तो क़ुदरत के कण कण में हूँ । तुमने एसे कैसे मान लिया कि तुम्हें सज़ा देने के लिये मैंने नर्क जैसी कोई अलग से जगह बनाई होगी , जबकि तुम मुझे बहुत प्रिय हो । बेशक यह बातें भी पुरानी हैं और अब से साढ़े पाँच सौ साल पहले पुर्तगाली दार्शनिक स्पिनोज़ा द्वारा कही गईं मगर देखिये हैं ना आज भी कितनी मौजू ?

 मैं भली भाँति जानता हूँ कि रहती दुनिया तक खुदा का खाना ख़राब कभी नहीं होगा । बेशक उसकी इबादतगाहों का आजकल खाना ख़राब है । मगर यह भी तो तभी तक है जब तक हम कोरोना से लड़ रहे हैं । इस महामारी से निपटते ही हम फिर एक दूसरे से लड़ेंगे और एक दूसरे के खुदा को अपने खुदा से अलग मानकर उसका खाना ख़राब करने की जुगत बैठाएँगे । ज़ाहिर है इस लड़ाई के शोर में फिर कहीं घुट जाएँगी वेदान्त और स्पिनोज़ा की बातें ।




दूसरों का ‘ भला ‘ करने निकले लोग

रवि अरोड़ा

सोशल डिसटेंसिंग जैसा शब्द हाल ही में देश-दुनिया में पॉपुलर हुआ है। इसी शब्द का एक भाई-बंधु और है जो बेशक अभी पॉपुलर नहीं हुआ है मगर सोशल डिसटेंसिंग से अधिक उसने अपनी पैठ बना ली है । वह शब्द है- कम्यूनल डिसटेंसिंग । जी हाँ तमाम निर्देशों और हिदायतों के बावजूद लोगबाग़ सामाजिक  दूरी तो बेशक नहीं बना रहे मगर धार्मिक दूरी का जम कर पालन कर रहे हैं । बेशक एसा कोई सरकारी आदेश नहीं हो सकता और न ही है मगर देश के दो प्रमुख धर्मों के बीच जो खाई इस कोरोना काल मे चौड़ी हुई है वह पिछले कई दशकों में भी चाह कर कुछ ख़ास लोग नहीं कर पाये थे । यक़ीनन कोरोना जैसी महामारी जिस तरह आई है उसी तरह चली भी जाएगी मगर अविश्वास का जो माहौल इसने बनाया है वह पता नहीं कभी दुरुस्त हो भी पाएगा अथवा नहीं । कहते हैं न कि सौ बार बोला गया झूठ अपने आपक सच मान लिया जाता है । मगर यहाँ तो एक एक झूठ लाखों करोड़ों बार दोहराया जा रहा है तो बताइये उसकी असत्यता कैसे साबित की जा सकती ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में कोरोना को फैलाने में तबलीगी जमात के लोगों का बड़ा हाथ है । सरकारी आँकड़े दावा करते हैं कि लगभग तीस फ़ीसदी मरीज़ जमात के कारण बढ़े । यह भी सत्य है कि इंदोर , मुरादाबाद और राजस्थान में जाँच को गई मेडिकल टीम अथवा पुलिस के साथ मुस्लिमों द्वारा पथराव किया गया । दोनो तरह के ही मामले बेहद संगीन थे और उसमें दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई भी की गई । मुस्लिमों के कई टिक टोक एवं अन्य वट्सएप मैसेज भी प्रकाश में आये जिसमें दावा किया गया कि पाँच वक़्त की नमाज़ पढ़ने वालों का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता । यक़ीनन यह भी मूर्खता की पराकाष्ठा ही है मगर इस सभी तथ्यों की आढ़ में एक बहुत बड़ा खेल देश में और शुरू हो गया है । अब एसे एसे वीडियो फैलाये जा रहे हैं जिन्होंने मुस्लिमों के प्रति देश की बड़ी आबादी को पूरी तरह अविश्वास से भर दिया है । सुबह से शाम तक मिलने वाले सोशल मीडिया के संदेशों में से अधिकांश यही होते हैं कि मुस्लिम सब्ज़ी वाले से सब्ज़ी मत ख़रीदो, वे इसपर थूकते हैं अथवा पेशाब करते हैं । मुस्लिम नाई से बाल न कटवाने की ताक़ीद भी सुबह शाम मिलती है । किसी संदेश में जमाती द्वारा पुलिस पर थूकते हुए दिखाया जाता है तो किसी में नोटों पर थूक लगाते दिखाया जाता है  ।

विभिन्न जागरूक संस्थाओं और मीडिया हाउस  द्वारा हाल ही में की गई जाँच में पाया गया कि ये तमाम वीडियो फ़र्ज़ी , विदेशी अथवा पुराने हैं । कोरोना और जमात से उनका कोई लेना देना नहीं है । यह भी पाया गया कि रियल हिंदू , वेकअप हिंदू, एक्सपोज द देशद्रोही व रिसर्ज हिन्दुइज़्म जैसे पंद्रह फ़ेसबुक एकाउंट द्वारा इन्हें पूरे देश भर में फैलाया जाता है । ये लोग प्रतिदिन एसे वीडियो देश दुनिया के ढूंढ़ते हैं जिसमें मुस्लिम वेशभूषा पहने किसी भी व्यक्ति द्वारा कोई बेहूदगी की गई हो और फिर उसे देश के मुस्लिमों , जमात अथवा कोरोना काल से जोड़ कर फैला देते हैं । समाज में अविश्वास की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी है कि लोगबाग़ उसे सत्य मान लेते हैं और अपनो का ‘ भला ‘ करने की गरज से उन्हें भी यह संदेश बिना किसी जाँच के आगे भेज देते हैं । और इसीतरह यह सिलसिला आगे बढ़ता ही जाता है । जब तक मामले की जाँच होती है और वीडियो फ़र्ज़ी, पुराना अथवा विदेशी साबित होता है तब तक वह अपना काम भली भाँति कर चुका होता है और उसके फ़र्ज़ी होने की सच्चाई नक्कारखाने की तूती बन चुकी होती है । पिछले एक महीने में आये एसे तमाम वीडियो की पोल खुल चुकी है मगर अफ़सोस उसमें अब किसी की रुचि नहीं । कम्यूनल डिसटेंसिंग के हिमायती लोगों को तो बस इंतज़ार रहता है एसे ही किसी और मनमुताबिक़ वीडियो का , जिसे फैला कर वह अपना सामाजिक दायित्व पूरा कर सकें । यदि कुछ न हो तो कम से कम अपने लोगों को तो ताक़ीद कर ही दें कि सावधान ! इन लोगों का कोई भरोसा नहीं ।





गंदा है पर धंधा है ये

रवि अरोड़ा


चलिये आज एक सवाल का जवाब दीजिये । आपमें से कितने लोग नोर्थ कोरिया गए हैं ? नहीं गये तो कोई बात नहीं चलिये ये बताइये कि आपमें से कितने लोग बिना किसी मशक़्क़त के ग्लोब में नोर्थ कोरिया ढूँढ कर दिखा सकते हैं ? नहीं ढूँढ सकते तब भी कोई बात नहीं चलिये ये बताइये कि पाकिस्तान के उस मौलाना से आपका क्या लेना देना है जो सुबह शाम आपकी टीवी स्क्रीन पर रो रो कर बताया है कि कोरोना जैसी बीमारी हमारी कर्मों की वजह से फैली है ? इस बार भी आपके पास कोई जवाब नहीं तो यह तो बता ही दीजिये कि जमात के मौलाना साद के पूरे ख़ानदान, उसकी पिछली सात पीढ़ियों और आने वाले पुश्तों के बाबत आपकी कितनी रुचि है ?

 अच्छा ये तो आप बता ही दोगे कि यूपी पुलिस के किस दरोग़ा ने कल अपनी बीवी से बाल कटवाए थे ? कमाल है आपको यह भी नहीं पता ? कमाल है ! फिर आपका दिन भर टीवी के आगे जमे रहने का क्या फ़ायदा ? क्या कहा कि आपकी एसी ख़बरों में रुचि नहीं है ? अच्छा रुचि नहीं है तो फिर क्यों देखते हो एसी बेहूदा ख़बरें ? क्यों नहीं फ़ोन करते इस न्यूज़ चैनल वालों को कि बस बहुत हुआ । बंद करो यह बकवास । अब हमारी बात करो, हमारे सुख-दुःख की ख़बरें दिखाओ ?

आज तमाम अख़बारों में एसी ख़बरें थी कि कवारंटीन किए गए लोगों को भोजन नहीं मिल रहा । सैंकड़ों रपटें न्यूज़ साइट पर आ रही हैं कि करोड़ों लोग एक वक़्त की रोटी को तरस रहे हैं । किसानों की फ़सल खेत में बर्बाद हो रही है , यह पूरे देश को पता चल रहा है । नौकरीपेशा रो रहे हैं कि उन्हें वेतन नहीं मिल रहा और नौकरीदाता कह रहे हैं कि हमारी ख़ुद की जेब ख़ाली है तो कहाँ से दें । लाखों लोग आज भी पैदल अपने पैतृक घरों के रास्ते में हैं । कल ही एक आदमी कर्नाटक से पैदल चलता हुआ यहाँ पहुँचा ।

कहीं किसी न्यूज़ चैनल दिखीं आपको एसी कोई ख़बर ? केजरीवाल कहते हैं कि मैं रोज़ाना एक करोड़ लोगों को मुफ़्त खाना खिला रहा हूँ । केंद्र सरकार कहती है उसने कोरोना से जूझने को पौने दो लाख करोड़ ख़र्च कर दिये जबकि डाक्टर सुबह शाम चिल्ला रहे हैं कि उनके पास बचाव के उपकरण ही नहीं हैं । प्रदेश सरकार कहती है कि हम हर ग़रीब को खाना दे रहे हैं । मेरे अपने शहर में जितना खाना रोज़ बँटने के दावे समाजसेवी और नेता कर रहे हैं उस हिसाब से तो मेरे आपके घरों में भी भोजन के पैकेटों के ढेर लग जाने चाहिये थे । कहीं कोई न्यूज़ चैनल अपने स्तर से जाँच करने का प्रयास करता दिखता है इन दावों की ?

मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि तमाम न्यूज़ चैनल फ़्री टू एयर हैं और केवल विज्ञापनों से उनका पेट नहीं भरता । ईमानदारी से न्यूज़ चैनल चलाना आसान नहीं शायद इसलिए ही किसी न किसी राजनैतिक दल की गोद में बैठना इनकी मजबूरी है । कुछ हुक्म अपने आका मुकेश अम्बानी का भी बजाना पड़ता है जिसका अधिकांश न्यूज़ चैनल में पैसा लगा है ।

दो चार दस बीस की नहीं देश के लगभग सभी नौ सौ चैनल्स में से अधिकांश की यही कहानी है । जिन्हें कोई गोद में नहीं बैठाता वह ब्लैक मेलिंग से अपने बच्चे पाल रहे हैं । कुल मिला कर इस खेल में मूर्ख आप हम ही हैं जो उनके द्वारा परोसे गये बेहूदा विषयों पर दिन भर एक दूसरे के कपड़े फाड़ते हैं । समझ ही नहीं पाते ही गंदा है पर धन्धा है ये ।

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