शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

वरिष्ठ पत्रकार आलोक तोमर:



 

 

अनछुआ कोना



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नाराज़गी आलोक  :

ऐसे भी खरे तुम तो न थे दादो-सतद के,
करता मुलकुल- मौत तक़ाज़ा कोई दिन और ।
-ग़ालिब

    पत्रकारिता कुर्बानी माँगती है । कुर्बानी ऐशो-आराम की, नींद-चैन की, सुविधापरस्ती की । पत्रकारिता बेहद मुश्किल आज़माइश है । इसके फैले संसार में मुकम्मल कुछ नहीं होता । बस, यात्रा है- अंतहीन यात्रा । यहाँ सुरक्षा-भाव तलाशने वाले पथिकों को निराशा हाथ लगेगी । यह तो कुरुक्षेत्र है, जीत गये तो इतिहास में नाम सुरक्षित हो जायेगा, गर हारे भी तो वीरगति को प्राप्त होगे । इसलिए इस धर्मयुद्ध में जुनूनी व समर्पित योद्धाओं की ज़रूरत है ।

आज जबकि मीडिया बेज़बानों की ज़बान बने रहने के बजाय मज़बूत व ताकतवर लोगों का बयान बनकर रह गया है, वैसे में हमारे ज़ेहन में आलोक की यादें ताज़ा होना लाज़िमी है। ज़मीनी हक़ीक़ी दुनिया की पत्रकारिता के अमिट, अतुलनीय व अप्रतिम हस्ताक्षर,  हमारे बीच से असमय चले जाने वाले, सच्चे अर्थों में जनसंचार के संसार के जॉन कीट्स आलोक तोमर एक ऐसे देदीप्यमान सितारे का नाम है, जो बुझ कर भी नहीं बुझता। "सूरज हूँ, ज़िन्दगी की रमक छोड़ जाऊँगा / गर डूब भी गया, तो अपनी शफक़ छोड़ जाऊँगा।" यूँ तो आलोक जी से मेरा कभी मिलना न हुआ, पर न मिलते हुए भी उनके प्रति एक जुड़ाव-सा, एक खिंचाव-सा महसूस होता है। जिस तरह क़रीने व सलीक़े से वो लिखा करते थे, ऐसा लगता था कि इस ख़बर या आलेख को उन्होंने बख़ूबी जिया है। उनकी जीवन्त लेखन शैली का मैं हमेशा क़ायल रहा, उन्हें बड़े चाव से पढना एक तरह की अतिरिक्त ऊर्जा देता था। अपने लुभावने अंदाज़े-बयां और साफगोई के लिए याद किये जाने वाले ख़बरपालिका के सच्चे दूत और पक्षधर पत्रकारिता के प्रतीक आलोक तोमर की इस वर्ष तृतीय पुण्यतिथि पर  कॉन्सटीट्यूशन क्लब में उनकी स्मृति में आयोजित विचार गोष्ठी में "पत्रकारिता में मर्यादा" पर विशद चर्चा हुई । कार्यक्रम में अशोक वाजपेयी, राहुल देव, केे. सी. त्यागी, ओम थानवी, प्रियदर्शन, शंभुनाथ शुक्ल, राजेश बादल, संतोष भारतीय, शैलेश, राजीव मिश्र, दीपक चौरसिया, आनंद प्रधान आदि की गरिमामयी मौजूदगी थी ।

            बकौल श्री प्रकाशचंद्र भुवालपुरी, "एक पत्रकार साहित्यकार की तरह मधुव्रती बनकर जीवन के बिखरे हुए सत्य का मात्र संचयन ही नहीं करता, वरन् उसे देवर्षि नारद-सा घ्राणशील, संजय-सा दूरदृष्टिसंपन्न, अर्जुन-सा लक्ष्यनिष्ठ, एकलव्य-सा अध्यवसायी, अभिमन्यु-सा निर्भीक, परशुराम-सा साहसी, सुदामा-सा संतोषी, दधीचि-सा त्यागी, धर्मराज-सा सत्यव्रती, भीष्म-सा प्रतिबद्ध, गणेश-सा प्रतिभासमपन्न, कृष्ण-सा ज्ञानी एवं कर्मयोगी, राम-सा मर्यादावादी, कृष्ण द्वैपायन-सा प्रगतिशील और भगवान शिव-सा लोकमंगल के लिए विषपायी होना पड़ता है । ये सभा गुण किसी एक में समवेत् होकर उसे सम्मानित पत्रकार बनाते हैं और ऐसा पत्रकार अपनी पत्रकारिता को व अपने दायित्व-बोध को सामने ले आकर सामाजिक सम्मान और समादर का सच्चा अधिकारी बनता है ।" ठीक ऐसा ही जीवन आलोक ने जिया। पर अफसोस कि
न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन
बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई ।
-मीना कुमारी

पर जाते-जाते आने वाली नस्लों को अपनी जीवन-शैली व कार्य-पद्धति से यह संदेश देते गये :

कबीरा तुम पैदा हुए, जग हसा तुम रोये
ऐसी करनी कर चलो, तुम हसो जग रोये ।

वाकई, पत्रकारिता को जिस शख्स ने महज आजीविका के लिए नहीं, अपितु समग्र जीवन-पद्धति के रूप में अपनाया हो, उनका इस तरह हमारे बीच से इतनी जल्दी जाना इस नवोदित पीढ़ी का नुकसान है । अपनी बेबाक, बेलाग, बेख़ौफ, बेलौस रिपोर्टिंग के लिए मशहूर आलोक जी ने जनसत्ता के आकर्षण व रोचकता का पर्याय बनकर यह दिखाया कि क़िस्सागोई की कला हो, तो बगैर ख़बरों के साथ खिलवाड़ किये, सूचनाओं के साथ छेड़छाड़ किये किसी भी समाचार को रोचक बनाया जा सकता है, समग्रता में परोसा जा सकता है । आज की तारीख़ में, जबकि पत्रकारिता की पसरी दुनिया में ज़बर्दस्त प्रतिस्पर्धा है, एक-दूसरे को पीछे धकेलने की होड़ लगी हुई है, परछिद्रान्वेषण की पनप रही अपसंस्कृति से भलेमानुष आजिज़ हो कर रह जाते हैं, वैसे में आलोक की अमिट पत्रकारीय विरासत हम जैसे नयी पीढ़ी के पत्रकारों; जिनकी लेखनी अभी शैशवावस्था में है, को अपनी आभा से अभिसिंचित करती मालूम पड़ती है। उनकी सृजनधर्मिता व सूक्ष्म साहित्यिक समझ हमारे अंदर की संवेदना को झिंझोरती है, चेतना को झकझोरती है।


आलोक जी की मुकम्मल शख़्सियत व उनका सम्यक् जीवन-दर्शन उनकी इन पंक्तियों में झलकता है :

मैं डरता हूँ कि मुझे डर क्यों नहीं लगता,
जैसे कोई बीमारी है अभय होना,
जैसे कोई कमज़ोरी है निरापद होना
जो निरापद होते हैं, भय व्यापता है उन्हें भी
पर भय किसी को निरापद नहीं होने देता ।


             मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक दोनों) में साहित्य को भी समुचित स्थान मिलना चाहिए, जो वस्तुत: वास्तविक समाज का आईना है । आखिरकार जॉन गॉल्सवर्थी के नाटक जस्टिस का मंचन देखकर ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल  एकल कारावास के कठोर व यातनापूर्ण कानून में बदलाव करने पर विवश हुए । साहित्य के इस असर को मीडिया पर्याप्त और यथोचित जगह देकर और भी उभार व प्रभावशाली बना सकता है, जिसके लिए आलोक जी ताअम्र अपने स्तर पर लगे रहे और कई बार अड़कर साहित्यिक समाचार के लिए ज़गह सुनिश्चित करा, उसके प्रकाशन की अविरल धारा बहाते रहे । टी.आर.पी. की चिंता कोई अनैतिक चिंता नहीं है । पर, पत्रकारिता का पूरी तरह व्यवसायीकरण हो जाना तो इसके मक़सद पर ही तुषारापात कर देता है । आज तो लोकप्रसारक (पब्लिक ब्रॉडकास्टर) भी जन सरोकार के मुद्दों व मसलों पर पर्याप्त बात नहीं कर रहे हैं ।  जी.बी. शॉ ने ठीक ही कहा था कि आज के समाचार पत्र (भारत के संदर्भ में टी.वी. चैनल कहना ग़लत नहीं होगा) साइकिल-दुर्घटना व सभ्यता के विघटन में पार्थक्य (फर्क़) करने में अक्षम हैं  

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस व्यवहारकुशल व्यक्तित्व की निजी ज़िन्दगी के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में दयानंद पाण्डेय जी के ज़रिये पता चला। पत्रकार-मानस पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का सहज आत्मिक स्नेह इन्हें मिलता रहा। 
पत्रकारिता इनके लिए महाभारत का संजय था- जो समग्रता में सच बोलने से डरता नहीं । जो स्थितप्रज्ञ है- राग-द्वेष, भेद-भाव, हानि-लाभ से परे है । वह सत्यनिष्ठ है । उसकी आस्था संस्था से है, किसी व्यक्ति- विशेष से नहीं। आज आपकी दुनियावी उपस्थिति  भले न हो, पर रूहानी मौजूदगी हमें आलोकित करती रहेगी। ये रोशनी हमेशा रहेगी। राज्यसभा सांसद के.सी. त्यागी की यह टिप्पणी कि पत्रकारिता में मूल्यों के ह्रास को लेकर आज आलोक जी के बहाने हम सार्थक-सारगर्भित चर्चा कर तो रहे हैं, अवमूल्यन के इस दौर में "राजनीति में मर्यादा" पर तो अब शायद ही कोई गोष्ठी हो; सोचने को बाध्य करती है । साथ ही, संवादपालिका से संवेदनशीलता की अपेक्षा भी करती है । पत्रकारिता में पक्षधरता के पैरोकार रहे, बड़ी ख़ूबसूरती से मसि-क्रीड़ा करने वाले सादर स्मरणीय आलोक जी के व्यक्तित्व के विविध आयामों पर उनसे गहरे जुड़े मित्रों व सुधीजनों ने अपनी यादें साझा कीं । शत-शत नमन मातृसमा आदरणीया सुप्रिया राय जी को, जो बड़ी जिजीविषा, जीवटता व जीवन्तता के साथ आलोक जी की प्रखर प्रज्ञात्मक परम्परा व कुशाग्र बौद्धिक विरासत को आगे ले जाने हेतु कृतसंकल्प हैं । भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली के दो संभावनाशील व उदीयमान साथी - विवेकानंद भारत व मीना कोतवाल को आलोक तोमर छात्रवृत्ति दी गयी । उन्हें बहुत-बहुत बधाई !

श्रद्धेय अशोक वाजपेयी, राहुल देव और प्रियदर्शन जी को धैर्यपूर्वक तन्मयता से प्रमुदित होकर सुनना मेरे लिए हमेशा संजोने वाला सुखद अनुभव रहा है । कल वाजपेयी जी व राहुल जी ने अपनी बातों से अनुप्राणित कर दिया । बाद में, जनसत्ता के पूर्व सम्पादक राहुल जी ने मुझसे व्यक्तिगत बातचीत में कहा, "तुमने पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए सेंट स्टीवन'स कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर (एम. ए.), दिल्ली वि.वि. से हिन्दी में एम.ए. एवं जवाहरलाल नेहरू वि.वि. (जेएनयू) से भाषाविज्ञान (लिंग्विस्टिक्स) में एम.ए. का विकल्प छोड़ दिया, साहसी हो, हाथ मिलाओ"।

बहरहाल, भाषाई शुद्धता जो हमारी इयत्ता है, पहचान है, सबसे बड़ी शक्ति है, उसकी ओर भी इस महत्वाकांक्षी पीढ़ी को ध्यान देना होगा । मैं तो कहता हूँ भाषाओं का कोई पारस्परिक अंतर्विरोध नहीं होता । बस, हिन्दी बोलते हुए, लिखते हुए अंग्रेजी के 
अनावश्यक प्रयोग से मुझे चिढ़ होती है ।और तो और, वेतन-वृद्धि की घोषणा के बाद ख़बर आती है, 'गुरु जी मालामाल' । कार्रवाई की ख़बर में 'अफसर नपेंगे', विरोध प्रदर्शन के लिए 'छात्रों ने जमकर बवाल काटा' आदि का प्रयोग क्या दर्शाता है ? मतलब, पत्रकारिता का शब्दकोश इतना निर्धन हो गया है ? लिंग-बोध तो मानो गायब ही हो गया हो । आज पत्रकारिता की भाषा पतनोन्मुखी हो चली है । शब्द अर्थहीन हैं, भाव मरणासन्न । आज हम अपनी भाषा पर से अपना मालिकाना हक़ खोते जा रहे हैं- जो दु:खद है ।  पत्रकारिता में शब्द के अर्थ से ज़्यादा शब्द से जुड़ाव का महत्व है । चूँकि, शब्द से हम विलग रहते हैं, उसे जीते नहीं हैं, इसीलिए ' संभावना व आशंका में हम फर्क़ करने की ज़हमत नहीं उठाना चाहते । अंग्रेजीदां यदि 'प्राइड' (जो बहुधा 'वैनिटि' में बदल गयी है) छोड़ दें और हिन्दी भाषी अपनी 'प्रेज्युडिस', तो संवेदना व चेतना से युक्त पत्रकारिता की एक खूबसूरत व प्यारी दुनिया हमारी होगी । आलोक तोमर को याद करते हुए हमें भाषा, संस्कार व संस्कृति को संपुष्ट, परिष्कृत व परिमार्जित करने की भी सुध लेनी होगी । यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी । उनका जीवन इस बात की गवाही है कि पत्रकारिता जीवन के कुरुक्षेत्र में हारे हुए लोगों की आखिरी पनाहगाह नहीं है।

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