सोमवार, 1 दिसंबर 2014

कैमरा आंख का मुकाबला नहीं कर सकता : रघु रॉय









प्रस्तुति-- अखौरी प्रमोद 

बीकानेर, अपने आप को अपने पेशे में पूर्णतया समर्पित भाव से लगाने पर ही श्रेष्ठता हासिल होती है। यह बात पद्मश्री प्राप्त फोटोग्राफर रघु रॉय ने आज धरम सज्जन ट्रस्ट भवन में आयोजित संगोष्ठी 'दैनिक जीवन में रचनात्मकता विषय पर अपने उद्बोधन में कही। रघु रॉय का बीकानेर के फोटो जर्नलिस्टों द्वारा अभिनंदन किया गया। अभिनंदन में शॉल मनीष पारीक ने, साफा अजीज भुट्टा ने, श्रीफल दिनेश गुप्ता ने तथा माल्यार्पण ओम मिश्रा ने किया। धरम सज्जन ट्रस्ट की तरफ से लूणकरण छाजेड़ ने अभिनंदन करते हुए कहा कि अपने जीवन को ही फोटोग्राफी बना लेने के कारण रघु रॉय ने श्रेष्ठता को प्राप्त किया है। इटली के फोटो पत्रकार रैनेडो बुलट्रिन व रघु रॉय की पुत्री अवनी रॉय का कनक चौपड़ा, एडवोकेट महेन्द्र जैन, युगराज सामसुखा ने स्वागत किया।
अपने विषय का शुभारंभ करते हुए रघु रॉय ने कहा कि मुझे फोटोग्राफी करते हुए 50 वर्ष होने को हैं और भगवान व तस्वीर कहां मिल जाए, कोई पता नहीं। अत: फोटोग्राफर को चाहिए कि अपने दिमाग को हमेशा खुला रखें। उन्होंने कहा कि रोजमर्रा की जिंदगी के साथ रचनात्मकता को जोड़ें तो साक्षात सत्य दिखलायी देगा। फोटोग्राफी में एक बिमारी होती है कि जो तस्वीर, चित्र, हम देख लेते हैं, वह आकर हमारे दिमाग में रुक जाती है। उन्होंने कहा कि दिमाग दुनिया का सबसे बड़ा कम्प्यूटर है, जिसमें तस्वीरें, यादें, कल्पनाएं संकलित रहती है। उन्होंने फोटोग्राफरों को सलाह दी कि वे दूसरों की फोटो देखकर कॉपी नहीं करें। अपनी फोटो की बात करें, अपनी स्वयं की तस्वीर खीचें। रॉय ने कहा कि आवश्यकता है कि जिंदगी के साक्षात् दर्शन करें। डिजीटल फोटोग्राफी से आप अपनी क्रिया को, एक्शन को तुरंत देख सकते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान के पास खजाना भरा पड़ा है। रघु रॉॅय ने कहा कि किसी व्यक्ति की शक्ल नहीं मिलती पर तस्वीरें मिलती है क्यों? उन्होंने कहा अच्छी तस्वीर प्राप्त करने के लिए धैर्य रखें, तलाश करें व इंतजार करें व अपने दिमाग को खुला रखें। मुश्किल यह है कि अपने दिमाग में पहले से बनी हुई तस्वीरों को नहीं छोड़ते हैं, आप उसमें ना पड़े, भगवान बहुत रास्ते निकालेगा, नया हर जगह मिलेगा, यह मेरा अनुभव कहता है। 
पद्मश्री रघु रॉय ने कहा कि मेरा धर्म फोटोग्राफी है, सच्चा व साफ सुथरा काम करता हूं। फोटोग्राफरों से कहा कि आप अपना काम ईमानदारी से व उसे अपना धर्म मानकर करें, हमारा धर्म हमारा काम होना चाहिए। हर जगह पर प्रकृति, की, हवा की, उर्जा है, शक्ति है, उसे प्राप्त करें। 70 वर्षीय रघु रॉय ने कहा कि क्रिएटिव लोग बूढ़े नहीं होते हैं। मन-वचन-कर्म से पूरी ताकत से कार्य करें, अपने काम में अपने आप को समर्पित कर देने से ही उपलब्धि हासिल होगी। 
उन्होंने उपस्थित फोटोग्राफरों द्वारा पूछे गये प्रश्रों के उत्तर भी बड़ी सहजता से देते हुए कहा कि अपने कार्य में अनुशासन की कमी न रहने देवें। अच्छा परिणाम प्राप्त करने के लिए समय देना होगा, जोखिम उठाने के लिए तैयार रहें, प्रकृति सहयोग करेगी। रघु रॉय ने कहा कि कैमरा कभी आंख का मुकाबला नहीं कर सकता है। डिजीटल टैक्नोलॉजी से फोटोग्राफी बहुत आसान हो गयी है, परन्तु जीवन में जश्न, तलाश, प्यास की जरुरत है। इससे पूर्व सुबह करणी मां के मंदिर, रामपुरिया हवेली गए तथा बाद में आचार्य तुलसी समाधी स्थल व तेरापंथ भवन जाकर आचार्य तुलसी के अंतिम प्रवास स्थल एवं समाधी स्थल के भी फोटो लिए।

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