गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

मीडिया शिक्षण का व्यापार और शून्य बाजार





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media-educationजून के पहले हफ्ते में मुंबई के अंग्रेजी टेबलॉयड अखबार मिड डे में मुंबई प्रेस क्लब की तरफ से दिया गया एक विज्ञापन छपा था। उसमें लिखा था ”मुंबई प्रेस क्लब ऑफर्स थ्री मंथ्स कोर्स इन पब्लिक रिलेशंस एंड मीडिया मैनेजमेंट” (मुंबई प्रेस क्लब जन संपर्क और मीडिया प्रबंधन में तीन महीने के पाठ्यक्रम के लिए आवेदन आमंत्रित करता है)। नीचे विद्यार्थियों को लुभाने के लिए सीमित सीट होने और जल्द प्रवेश लेने की बात भी कही गई थी। प्रवेश की अंतिम तारीख तेईस जून थी।
पत्रकारों के क्लब की तरफ से जन संपर्क और मीडिया प्रबंधन का कोर्स चलाना एक हैरत में डालने वाली और असामान्य बात है। क्लब को अगर इस तरह का कोई पाठ्यक्रम शुरू करना ही था तो वह पत्रकारों के लिए कोई प्रशिक्षण कार्यक्रम या फिर भावी पत्रकारों के लिए पत्रकारिता का परिचयात्मक कैंप जैसा कुछ कर सकता था। क्लब को आखिर क्या जरूरत पड़ी कि वह पत्रकारों की संस्था की तरफ से जन संपर्क और मीडिया प्रबंधन का पाठ्यक्रम चलाए? इस मामले की पड़ताल करते हुए जब मुंबई प्रेस क्लब की वेबसाइट को देखा गया तो वहां ‘प्रेस क्लब ऑफर्स यू पीआर सर्विसेस’ (प्रेस क्लब आपका पीआर करने के लिए तैयार है) नाम का एक और नया विज्ञापन देखने को मिला।
हाल के वर्षों में जिस तरह से पत्रकारिता, जन संपर्क और प्रबंधन के बीच की रेखा धुंधली हुई है ये विज्ञापन बड़ी बेशर्मी से इस हकीकत को बयान करते हैं। वैसे ही भारतीय पत्रकारिता को अब समाज विरोधी तत्त्वों और बड़े-बड़े कॉरपोरेट के जन संपर्क अधिकारी चला रहे हैं। वे हर तरह से पत्रकारों को खरीद कर अपना एजेंडा लागू करने की कला जानते हैं। नीरा राडिया और कॉरपोरेट पत्रकारों से उनकी दोस्ती के किस्से अभी बहुत पुराने नहीं हुए हैं। द हिंदू के पत्रकार हरीश खरे और एनडीटीवी के पत्रकार पंकज पचौरी का प्रधानमंत्री का प्रेस सलाहकार (पीआरओ) बन जाना इसी हकीकत के दूसरे पहलू हैं। पर यह परंपरा नई भी नहीं है। संभवत: इसकी शुरुआत कुलदीप नैयर से हुई थी।
वैसे भी भारतीय पत्रकारों में खुद को बाकी जनता से कुछ अतिरिक्त रूप से विशिष्ट समझने की बीमारी सदा से रही है। इस पेशे के नाम पर वे वक्त-वक्त पर सरकारों से अपने लिए तरह-तरह की सुविधाएं मांगने से नहीं चूकते हैं। पिछले दिनों जब प्रतिदिन अठाईस रुपए से ज्यादा कमाने वालों को गरीब न मानने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया द्वारा तीस लाख रुपए अपने ऑफिस के टायलेट के पुनरुद्धार करने में खर्च कर डालने की खबर आम हुई तभी आठ जून को मुंबई से एक खबर आई। यह खबर भारतीय पत्रकारों की भ्रष्ट मानसिकता का विकट नमूना है। सन 1998 में महाराष्ट्र में शिव सेना के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को मुख्यमंत्री राहत कोष से डेढ़ लाख रुपए टॉयलेट के पुनरुद्धार के लिए दिए थे। इस बात का पर्दाफाश एक आरटीआई के जरिए हुआ। आपदा से घिरी जनता के राहत का पैसा हड़पने का यह किस्सा राजनेताओं (यहां एक मुख्यमंत्री) और पत्रकारों के नैतिक आचरण को लेकरकोई बड़ी बहस खड़ी नहीं कर पाया। करता कौन? वही जो स्वयं इस के नायक हों? यह इस बात का संकेत है कि भ्रष्टाचार किस तरह धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति पाता जा रहा है।
इसी तरह की एक और शर्मनाक घटना का सबूत भारतीय संसद से कुछ ही फर्लांग की दूरी पर रायसीना रोड पर बने दिल्ली के प्रसिद्ध प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का है। प्रेस क्लब किस तरह के लोगों का अड्डा बन चुका है यह उसका उदाहरण है। आज पत्रकार कॉरपोरेट और सरकारी संस्थाओं से अपने संपर्कों को ही महान उपलब्धि मानते हैं। दिल्ली प्रेस क्लब का हॉल इधर लाखों रुपए की लागत से पुनर्निमाण के बाद चमकने लगा है। एयरकंडीशन उसे हमेशा सुकूनदायक बनाए रखते हैं। इसके लिए भारतीय वायुसेना ने दरियादिली दिखाते हुए सारे पैसे खर्च किए हैं। लेकिन बदले में क्लब के लॉन में उसने सैन्यीकरण और युद्ध का प्रतीक ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र का नमूना गाड़ दिया। हर शाम वो बिजली की रोशनी में जगमगाता रहता है। लॉन में बैठने वाले पत्रकार जब कभी अपने देसी-विदेशी दोस्तों के साथ दुनियाभर में शांति के बारे में बात कर रहे होते हैं तो सैन्यीकरण का प्रतीक ब्रह्मोस उनको मुंह चिढ़ा रहा होता है।
पिछले दिनों कुछ पत्रकारों ने ब्रह्मोस के उस नमूने को उठाकर क्लब की सीमा से बाहर फेंक दिया। प्रेस क्लब के नेताओं और रक्षा पत्रकारों में इस पर हंगामा मच गया। ब्रह्मोस को उखाडऩे वाले पत्रकारों के खिलाफ केस दर्ज करने की बात हुई। करीब पंद्रह ऐसे जनपक्षीय और वामपंथी पत्रकारों की एक लिस्ट भी बनाई गई जो कई बार ब्रह्मोस की खुली मुखालफत कर चुके थे। ब्रह्मोस के उखडऩे से दुखी सत्ता-समर्थक पत्रकार इसे राष्ट्रद्रोह का मामला करार दे रहे थे लेकिन उन्हें इस बात पर कोई शर्म नहीं थी कि पत्रकारिता जैसे पेशे में यह खैरात उन्हें क्यों दी गई और उन्होंने क्यों ली? प्रेस क्लब द्वारा सरकार या कारपोरेट हाउसों से किसी भी तरह की मदद लेना अनैतिक तो है ही खुलेआम भ्रष्टाचार का मामला भी है। यह क्लब किसी भी रूप में कोई सामाजिक भूमिका नहीं निभाता सिवा पत्रकारों को सस्ती दारू उपलब्ध करवाने के। बहरहाल फिर से प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के आंगन में ब्रह्मोस को सजा-संवार कर लगा दिया गया है।
प्रशिक्षण की कॉरपोरेट दुकान
पर बात की शुरुआत पब्लिक रिलेशंस एंड मीडिया मैनेजमेंट की दुकान को लेकर हुई थी। देश में निजीकरण की हवा के तेज होने के साथ ही कुकुरमुत्तों की तरह छोटे-बड़े शहरों में मीडिया शिक्षण की कई संस्थाएं खुल गई हैं। इन संस्थाओं का हाल भी तीस दिन में अंग्रेजी सिखाने के दावे करने वालों की तरह ही तुरंत पत्रकार बनाने का रहता है। बढ़ती बेरोजगारी और मीडिया के ग्लैमर से आकर्षित वे बच्चे जो और किसी क्षेत्र में नहीं जा सकते इस धंधे में अपना भाग्य आजमाने की कोशिश करते हैं। दूसरी ओर पत्रकारिता और मीडिया प्रशिक्षण का न तो कोई मानकीकरण है और न ही कोई ऐसा केंद्रीय संगठन जो इसे नियंत्रित करता हो। नतीजा यह है कि इस अनियंत्रित और अनियमित क्षेत्र का लाभ उठाने के लिए दर्जनों संस्थाएं सामने आ गई हैं। इस दौड़ में सब से आगे बड़े-बड़े कॉरपोरेट मीडिया घराने नजर आ रहे हैं। उन्होंने खुद अपने मीडिया स्कूल खोल दिए हैं। इनमें लाखों रुपए की फीस वसूल कर छात्रों को ट्रेनिंग दी जाती है। खुद का मीडिया होने की वजह से ऐसे संस्थान छात्रों को अपनी तरफ लुभाने में काफी कामयाब रहते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया, पायनियर, इंडियन एक्सप्रेस, एनडीटीवी, आजतक, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों इस धंधे में बड़े पैमाने पर शामिल हो चुके हैं।
मीडिया शिक्षण के क्षेत्र में धंधेबाजी करने की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया की मालिक बैनेटकोलमैन कंपनी ने की थी। उन्नीस सौ पचासी में जब राजीव गांधी उदारीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहे थे तब इस विशाल मीडिया घराने ने भविष्य की थाह लेते हुए सबसे पहले दिल्ली में टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की शुरुआत की। आज यह संस्था टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया एंड मैनेजमेंट स्टडीज के नाम से जाना जाता है। अब इस संस्थान में टाइम्स स्कूल ऑफ जर्नलिज्म नाम से नई शाखा की शुरुआत की गई है। यहां से एक साल का कोर्स करने की फीस दो लाख पैंतीस हजार रुपए वसूली जाती है। इस रकम पर अलग से सर्विस टैक्स भी देना होता है। फॉर्म भरने की फीस अलग है। साथ ही पंद्रह हजार कॉशन मनी भी जमा करना पड़ता है। पर यह समूह कभी प्रतिभाशाली युवाओं को पत्रकार बनाने के लिए चुनता था और उन्हें प्रशिक्षित कर अपने संस्थान में नौकरी दिया करता था। हिंदी और अंग्रेजी के ऐसे कई पत्रकार हैं जो टाइम्स आफ इंडिया समूह की इसी प्रशिक्षण योजना के तहत पत्रकारिता में आए थे। इन में आज के प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रकार एमजे अकबर और स्व. एसपी सिंह भी थे। तब इन प्रशिक्षु पत्रकारों को सम्मानजनक स्टाइपेंड के साथ नौकरी भी दी जाती थी।
इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस समूह का एक्सप्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज भी एक साल का प्रोग्राम इन जर्नलिज्म कराता है। इसके लिए वह एक लाख 95 हजार रुपए फीस वसूलता है। पांच हजार सिक्युरिटी डिपॉजिट है और फॉर्म फीस अलग से। इस समूह ने देश के कई हिस्सों में सरकार से पत्रकारिता के नाम पर सस्ती दरों में जमीन हथिया रखी है। दिल्ली-मुंबई-चंडीगढ़ जैसे शहरों में इसके पास अरबों रुपए के गगनचुंबी भवन हैं। जिसे इसने किराये पर उठाया हुआ है। अखबार के उसी भवन से अब यह शिक्षा का व्यापार भी चलाने लगा है। पत्रकारिता के नाम पर लिए गए इन भवनों से आज और भी कई तरह के धंधे चल रहे हैं जिनका पत्रकारिता से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भाजपा नेता चंदन मित्रा के स्वामित्व वाला पायनियर भी सन 2003 से पायनियर मीडिया स्कूल चला रहा है। यहां एक साल के पाठ्यक्रम की फीस अस्सी हजार रुपए है।
तकनीकी विकास और पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप देश में टेलीविजन मीडिया पिछले दो दशक से खूब फल-फूल रहा है। एनडीटीवी का उदय और उत्थान इसी दौर की घटना है। पत्रकारिता की साख को गिराने के लिए इसके पत्रकारों और मालिक पर लगातार आरोप लगते रहे हैं। इस समूह के मीडिया संस्थान का नाम है एनडीटीवी ब्रॉडकास्ट ट्रेनिंग प्रोग्राम। दस महीने के कोर्स के लिए यहां एक लाख अस्सी हजार रुपए वसूले जाते हैं। बाकी खर्चे अलग से। यहां के विद्यार्थी बरखा दत्त जैसी राडिया प्रिय व्यक्ति से पत्रकारिता की कला और नैतिकता सीखते हैं।
iimcहाल ही में अपने एक बड़े हिस्से को बिड़ला को बेच देने वाले इंडिया टुडे समूह ने भी टीवी टुडे मीडिया इंस्टीट्यूट शुरू किया है। यहां एक लाख बीस हजार फीस ली जाती है। विद्यार्थियों को लुभाने के लिए यह समूह आजतक और हेडलाइंस टुडे जैसे अपने ब्रैंड का इस्तेमाल करता है। देश में सर्वाधिक प्रसार वाला हिंदी अखबार, दैनिक जागरण भी दो हजार चार से नोएडा में जागरण इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड मास कम्युनिकेशन चला रहा है। यहां तीन साल की बैचलर डिग्री के लिए करीब पांच लाख रुपए और पीजी कोर्स के लिए भी लाखों रुपए वसूले जाते हैं।
अखबार और टेलीविजन चैनलों को क्यों अपने शिक्षण संस्थान शुरू करने दिया जा रहा है यह अहम सवाल है। प्रश्न है क्या हर उद्योग इस तरह से अपने यहां काम आनेवाले कर्मियों के लिए प्रशिक्षण के संस्थान चला सकता है? जैसे कि सीमेंट उद्योग सीमेंट इंजीनियर, इस्पात उद्योग मैटलर्जी के इंजीनियर, बिल्डर सिविल इंजीनियर, आईटी उद्योग सॉफ्टवेयर इंजीनियर वगैरह-वगैरह। अगर ऐसा नहीं हो सकता तो फिर मीडिया के प्रशिक्षण की इजाजत इन अखबारी संस्थानों को किसने दी है? अगर नहीं दी है तो आखिर इसके लिए कोई नियम क्यों नहीं बनाया जा रहा है? पत्रकारिता के प्रशिक्षण के स्कूलों के क्या मानदंड हों, वे निर्धारित तो होने चाहिए? कौन तय करेगा कि जो शिक्षा दी जा रही है उसका स्तर क्या है और क्या होना चाहिए? आज स्थिति यह है कि देश का अपना कोई ऐसा बोर्ड नहीं है जो पत्रकारिता के प्रशिक्षण का मानकीकरण करता हो या उसके पाठ्यक्रम को निर्धारित करता हो। इसी का नतीजा यह है कि इस तरह के स्कूल फल-फूल रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या दुनिया में और भी कोई ऐसा देश है – अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस या और कोई विकसित योरोपी देश जहां समाचार पत्र या मीडिया संस्थान पत्रकारिता की पाठशालाएं चलाते हों?
हमारे देश में फिलहाल हालत यह है कि अनगिनत कालेजों और विश्वविद्यालयों नें मीडिया और पत्रकारिता के विभाग खोल दिए हैं। इनके पास न तो जरूरी उपकरण हैं और न ही स्टॉफ उस पर भी ये विभाग चल रहे हैं। यहां प्रादेशिक भाषा और साहित्य के प्राध्यापक पत्रकारिता पढ़ा रहे हैं। मूलत: ये विभाग पैसा कमाने के लिए चलाए जा रहे हैं। इनमें बड़ी-बड़ी फीस लेकर छात्रों को भर्ती किया जाता है। ये विभाग भी बेरोजगारों का ही शोषण कर रहे हैं।
देश में मीडिया से संबंधित अध्ययनों की हालत क्यों खराब है इसके बाद, समझना कठिन नहीं है। यहां ज्यादातर पढ़ाई मीडिया उद्योग के लिए कामगार बनाने वाली ही है। उनमें आलोचनात्मक ज्ञान का विकास करने वाला मीडिया अध्ययन नहीं के बराबर हैं। भारतीय जन संचार संस्थान जैसे सरकारी पैसे से चलने वाले संस्थानों में भी मीडिया उद्योग की जरूरतों को ही ज्यादा ध्यान में रखा गया है। वहां भी शोधपरक और आलोचनात्मक शिक्षा पद्धति की कमी है। पिछले कई वर्षों से भारतीय जन संचार संस्थान और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में गंभीर मीडिया अध्ययनों को शुरू करने की सुगबुगाहट चल रही है लेकिन अब तक वहां भी सन्नाटा ही है। अगर इस तरह के गंभीर अध्ययन देश में शुरू होते हैं तो वे बेकाबू कॉरपोरेट मीडिया की एक सटीक आलोचना विकसित कर सकते हैं और विकल्प के कुछ रास्ते भी सुझा सकते हैं।
पत्रकार की मौत पर सवाल?
tarun-sehrawatपंद्रह जून की सुबह तहलका के युवा फोटोग्राफर तरुण सहरावत ने गुडग़ांव के अस्पताल में आखिरी सांस ली तो देशभर की पत्रकार बिरादरी में शोक की लहर फैल गई। लेकिन तरुण की मौत जो सवाल छोड़ गई है उस पर नजर डालना जरूरी है। बाईस वर्षीय तरुण मई के महीने में अपनी सहकर्मी तुषा मित्तल के साथ छत्तीसगढ़ में माओवाद के गढ़ माने-जाने वाले अबूझमाड़ के जंगलों में गया था। वहां से लौटने के बाद वह सेरेब्रल मलेरिया की चपेट में आ गया, वह जानलेवा साबित हुआ। माओवादी इलाके में पत्रकारिता करना कई तरह से जोखिम का काम है। भौगोलिक परिस्थितियां तो विकराल हैं ही, माओवादियों और पुलिस के बीच संदिग्ध बन जाने पर, मारे जाने का खतरा भी अलग से है। इसलिए जो भी पत्रकार इन इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए जाते हैं वे पूरी तैयारी के साथ जाते हैं। वहां जाने से पहले वे पूरा होमवर्क करके निकलते हैं फिर क्या वजह थी कि तुषा और तरुण बिना तैयारी के लिए उस इलाके में चले गए। माओवादी हलचलों पर नजर रखने वाला कोई भी पत्रकार जानता है कि वह पूरा इलाका मलेरिया के लिहाज से बेहद खतरनाक है। यह बात सही है कि मलेरिया से बचाव पूरी तरह संभव नहीं है लेकिन इससे बचने की कोशिश की जा सकती है। इस घटना से यह भी सवाल उठता है कि क्या तहलका की इस मामले में कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं? अपने पत्रकारों को ऐसे खतरनाक इलाकों में भेजने से पहले क्या उसने उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी सभी कदम उठाए थे?


प्रस्तुति-- स्वामी शरण, समिधा, राहुल मानव
 

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