75 साल बाद भी फ़िल्म का जादू बरकरार है

  • 4 घंटे पहले
    प्रस्तुति-- निम्मी नर्गिस 


अमरीका में एक ऐसी फ़िल्म बनी जिसकी लोकप्रियता 75 साल भी नहीं घटी. नाम है 'गॉन विद द विंड'.
इसे अमरीका की सबसे मशहूर और कामयाब फ़िल्मों में शुमार किया जाता है.
इसका प्रीमियर ठीक 75 साल पहले हुआ था. वर्ष 2008 में हैरिस पोल (अमरीका में 50 साल से सर्वेक्षण कराने वाली एक संस्था) और 2011 में एबीसी न्यूज़ के सर्वे में यह 1939 के बाद रिलीज़ की गई फ़िल्मों में बेहतरीन मानी गई.
बॉक्स ऑफिस पर इसकी कमाई भी इसके मशहूर होने का सबूत है. अगर इस फ़िल्म की तब की कमाई को महंगाई दर से जोड़ा जाए तो यह आज भी ये सबसे सफल फ़िल्म है.

स्क्रीन पर उतारने की चुनौतियां

इस फ़िल्म में अभिनेता क्लार्क गेबल की मूछें हों या ख़ूबसूरत अभिनेत्री विवियन ले की अदाएं, तब के रंगीन चलचित्र पर इन्हें खूब सराहा गया.

दोबारा देखने पर अचरज होता है कि ये फ़िल्म किसी भी तरह से पारिवारिक मनोरंजन की फ़िल्म नहीं लगती.फ़िल्म षड्यंत्र रचने, झूठ बोलने और पैसे से लगाव रखने वाले और पुरुषों को बहकाने वाले महिला की कहानी पेश करती है.
ये दास प्रथा को सही ठहराने वाले अमरीका के दक्षिणी भाग और दास प्रथा का विरोध कर रहे उत्तरी भाग के संघर्ष को भी दिखाती है.
चार घंटे के उतार-चढ़ाव के बाद कई अनसुलझी गुत्थियों के साथ ही फ़िल्म अचानक ख़त्म हो जाती है.
फ़िल्म को दोबारा देखने के बाद हैरानी होती है कि ये अमरीका की सबसे नापसंदीदा फ़िल्म कैसे नहीं बनी.
फ़िल्म माग्रेट मिशेल के उपन्यास पर बनी थी और यह उपन्यास 1037 पन्नों का था.
डेविड सेल्ज़ेनिक ने इस उपन्यास पर फ़िल्म बनाने के अधिकार 50 हज़ार डॉलर में ख़रीदे.
लेकिन इस उपन्यास को पर्दे पर उतारना बड़ी चुनौती थी. स्क्रिप्ट कई बार लिखी गई, यही नहीं निर्देशक सेल्ज़ेनिक फ़िल्म बनने के दौरान इसके संवाद बदलते रहे.

31 स्क्रीन टेस्ट

सेल्ज़निक ने मुख्य भूमिका के लिए हॉलीवुड की 31 अभिनेत्रियों का स्क्रीन टेस्ट लिया. इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन की विवियन ले को चुना जो उस समय हॉलीवुड में ज़्यादा चर्चित न थीं.

लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो सब कुछ बदल गया.बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म ने सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले और 10 श्रेणियों में ऑस्कर जीते. सेल्ज़निक की मेहनत रंग लाई लेकिन ऑडिएंस फ़िल्म देखकर असमंजस में भी पड़ सकती थी.
फिल्म अमरीका में हुए गृह युद्ध और इससे ठीक पहले की पृष्ठभूमि की बेजोड़ तस्वीर पेश करती है.
फिल्म की नायिका स्कार्लेट हवेली में रहती है. उसकी कपास की खेती है वहां बड़ी संख्या में ग़ुलाम काम करते हैं.
उसकी नटखट और चंचल प्रवृत्ति उसमें एक विशेष आकर्षण पैदा करती है. वह अपनी सुंदरता के प्रति भी बेहद सजग रहती है.

कई नाटकीय मोड़

स्कार्लेट किसी बात की परवाह नहीं करती सिवाय एशले विल्क्स के, जो उनकी आँखों में बस गया है. वहीं एशले विल्क्स अपनी चचेरी बहन मेलनी के प्रति आकर्षित है. मेलनी और एशले की शादी हो जाती है.

स्कार्लेट इस कदर एशले की दीवानी है कि बाँका नौजवान रिट बटलर भी उसका ध्यान नहीं बटा सकता.बाद में स्कार्लेट और बटलर की शादी हो जाती है, लेकिन स्कार्लेट अपने दिल से एशले को नहीं भुला पाती है.
हैरानी की बात यह है कि फिल्म चार घंटे की होने के बावजूद इसमें इतने नाटकीय मोड़ हैं कि वह ख़ासी तेज़ गति से बढ़ती है.

नस्लभेद

मिशेल का उपन्यास जब पहली बार प्रकाशित हुआ तो इस पर विवाद हुआ था.
सेल्ज़निक ने कुछ नस्लभेद टिप्पणियों को हटाने की भी कोशिश की, लेकिन फ़िल्म में स्कार्लेट के पिता की ये सलाह "आपको निचले दर्जे के लोगों, ख़ासकर काले लोगों के साथ सख़्त रहना चाहिए," वाला संवाद सुनना दुखद है.

फ़िल्म के आख़िरी घंटे में जब कहानी गृह युद्ध से आगे बढ़ जाती है और स्कार्लेट अपनी संपत्ति को दोबारा पाने के संघर्ष में लगी होती है, तब एक हैरान करने वाला लव ट्राएंगल छा जाता है.स्कार्लेट और रिट बटलर की शादी हो चुकी होती है लेकिन स्कार्लेट का दिल अब भी एशले के लिए धड़कता है.
क्लार्क गेबल के अलावा शायद नायक की इस भूमिका को कोई और नहीं निभा सकता था.
लेकिन फिल्म देखकर इस पर विश्वास करना मुश्किल लगता है कि स्कार्लेट जैसी महिला रिट बटलर (गेबल) की जगह एशले (46 वर्षीय लेसली हॉवर्ड) की ओर आकर्षित होगी.
मानवीय संवेदनाओं की ऐसी सूक्ष्म अभिव्यक्ति कुछ ही फ़िल्मों में दिखाई देती है.
पात्रों के कलात्मक परिधान, नायक और नायिका की रोमांटिक रूप सज्जा और अभिनय, उनके भारी-भरकम कॉस्ट्यूम, प्राकृतिक सुंदरता का मनमोहक फ़िल्मांकन इस फिल्म को महान और चिर-नवीन बनाता है.
अंग्रेज़ी में मूल लेख यहां पढ़ें, जो बीबीसी कल्चर पर उपलब्ध है.
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