सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

मीडिया पर भूमंडलीकरण के प्रभाव की पड़ताल


 
-हिमांशु शेखर
30 अगस्त को दिल्ली के कांस्टीटयूशन क्लब में ‘मीडिया पर भूमंडलीकरण का प्रभाव और हमारी परंपरा’ विषय पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की ओर से एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसमें देश के जाने-माने पत्रकारों एवं मीडिया विद्यार्थियों ने शिरकत की।

भारत को अंग्रेजों की लंबी दासता से मुक्त कराने में यहां की पत्रकारिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहां खबरनवीसी की शुरुआत 1780 से हुई और देखते ही देखते अखबारों ने स्थापित व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। जब देश में आजादी के लिए माहौल बनना शुरू हुआ तो यहां के अखबारों और पत्रकारों ने इसे परवान चढ़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। इसका सकारात्मक परिणाम 1947 में स्वाधीनता के रूप में आया। इसके बाद हर क्षेत्र में काफी तेजी से बदलाव आया और बदलाव की इस बयार से पत्रकारिता भी नहीं बच सकी। अस्सी के दशक से पूंजीवाद के दबदबे में बढ़ोतरी होती गई और इसका प्रभाव पत्रकारिता पर पड़ने लगा। देखते-देखते पत्रकारिता की देशी परंपराएं लुप्त होती गईं और भारत की पत्रकारिता भी विदेशी रंग-ढंग में ढलने लगी। यही वह दौर था जब वैश्वीकरण की आंधी की जद में विकासशील देश आने लगे। वैश्वीकरण ने समाज के हर हिस्से को प्रभावित किया और पत्रकारिता भी इससे बच नहीं सकी। वैश्वीकरण ने भारत की पत्रकारिता की परंपरा पर तो गहरा असर डाला ही, साथ ही इसने पत्रकारिता की प्राथमिकताएं भी बदल डालीं।
गत माह 30 अगस्त को दिल्ली के कांस्टीटयूशन क्लब में ‘मीडिया पर भूमंडलीकरण का प्रभाव और हमारी परंपरा’ विषय पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन की ओर से एक सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में भारतीय पत्रकारिता की परंपरा और इस पर वैश्वीकरण के प्रभावों पर जाने-माने पत्रकारों ने चर्चा की।
वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने भारतीय पत्रकारिता की परंपरा को याद करते हुए ‘स्वदेश’ अखबार का नाम लिया। इसकी चर्चा करते हुए भरे गले से उन्होंने कहा कि स्वदेश के आठ संपादक जिंदगी भर के कालापानी के लिए अंडमान भेज दिए गए। क्योंकि उन्होंने अंग्रेज सरकार को पैसा नहीं दिया था। पर यह देश की पत्रकारिता का कैसा दुर्भाग्य है कि आजकल पैसा लेकर खबर लिखी और दिखाई जा रही है। ऐसे में पत्रकारिता का बचना मुश्किल है। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि वैश्वीकरण के इस दौर में यह कहा जा रहा है कि दुनिया एक विश्वग्राम बनती जा रही है। यह कहने वाला विश्व को तो जानता है लेकिन ग्राम को नहीं जानता। उन्होंने इस देश की पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां महात्मा गांधी और बाल गंगाधर तिलक जैसे संपादक हुए हैं, जिन्होंने मानवता को जगाया। पर ऐसे संपादकों के देश की पत्रकारिता में आज विवेक का अभाव दिखता है। प्रभाष जोशी ने यह भी जोड़ा कि आज की पत्रकारिता में जो कुछ हो रहा है उसे देखकर मुझे लगता है कि मेरे लिए जाने की घंटी बज रही है।
पत्रकारिता की मौजूदा दुर्दशा का उल्लेख करते हुए प्रथम प्रवक्ता के संपादक रामबहादुर राय ने कहा कि ऐसा लगता है जैसे इस दौर की पत्रकारिता हवा में हो रही है। उन्होंने हिंदुस्तान के बनारस संस्करण के पहले पन्ने पर छपे अपराधी ब्रजेश सिंह के पूरे पृष्ठ के विज्ञापन का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारिता की नैतिकता कहां खो गई है। उन्होंने जोर देकर कहा कि चाहे कितना भी करोड़ रुपए उस विज्ञापन के एवज में क्यों न मिले, उसे नहीं छापना चाहिए था। उन्होंने आजमगढ़ में दो ग्रामीणों को सूचना मांगने पर जेल भेजे जाने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि पत्रकारों को इसकी सफलता की खबरों की बजाए इसके कार्यान्वयन में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी उजागर करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता समेत इस व्यवस्था की गड़बड़ी के लिए संविधान पर सवाल उठाने की जरूरत है, क्योंकि वहीं से यह व्यवस्था निकलती है। इस संविधान से मुक्त होने पर ही हम भूमंडलीकरण और बाजारवाद से पार पा सकेंगे और पत्रकारिता भी पटरी पर लौट पाएगी। वर्तमान समय की पत्रकारिता के समक्ष आने वाली मुश्किलों का उल्लेख करते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के संयोजक के.एन. गोविंदाचार्य ने कहा कि जो लोग पत्रकारिता की परंपरा को बनाए रखते हुए समझौता नहीं करना चाहते हैं, उन्हें सोचना होगा कि उनका रास्ता क्या होगा। अगर जरूरत पड़े तो इसके लिए व्यक्तिगत तौर पर भी कीमत चुकाने को तैयार रहना होगा। गोविंदाचार्य ने कहा कि पत्रकारों को व्यावहारिक चीजें दिखाना और गलत को नहीं दिखाने के प्रति दृढ़संकल्प होना पड़ेगा। जड़ों से जुड़कर पत्रकारिता करने पर ही भूमंडलीकरण से लड़ा जा सकेगा।
भारतीय पत्रकारिता की समृध्द परंपरा का उल्लेख करते हुए वरिष्ठ पत्रकार जवाहर लाल कौल ने कहा कि एक दौर वह था जब पत्रकारिता में नैतिक आग्रह होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है। आज हर माध्यम की पत्रकारिता एक उद्योग में बदल गई है और हर उद्योग की तरह इसकी प्राथमिकता भी अपने उत्पाद को अधिक से अधिक बेचना हो गया है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि इस दौर की पत्रकारिता के पीछे वैश्विक ताकतें हैं, इसलिए आज उम्मीद की किरण वैकल्पिक मीडिया के रूप में ही दिखती है।
वरिष्ठ टेलीविजन पत्रकार फण्य प्रसून वाजपेयी ने पत्रकारिता की बदहाली के लिए इस क्षेत्र में आ रहे नए पत्रकारों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि नए लोगों ने काम करना बंद कर दिया है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि हमें यह सोचना होगा कि देश के 84 करोड़ लोगों के हितों की अनदेखी करते हुए हमें पत्रकारिता करनी है क्या। फण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि पत्रकारिता की घटती विश्वसनीयता के लिए भूमंडलीकरण के साथ-साथ मीडिया संस्थानों के मालिक और संपादक भी जिम्मेदार हैं।
आज तक के समाचार प्रमुख कमर वहीद नकवी ने यह स्वीकार किया कि भूमंडलीकरण का नकारात्मक असर मीडिया पर पड़ा है। उन्होंने कहा कि मीडिया समाज का आईना है और हम जो कुछ दिखा रहे हैं वह इस बदले समाज की तस्वीर ही है। कमर वहीद नकवी ने यह माना कि जो कुछ मीडिया में हो रहा है वह सही नहीं है और इस समस्या के भागीदार हम सब हैं। इसलिए समस्या के समाधान की दिशा में हम सब को सोचना होगा। वरिष्ठ पत्रकार अजय उपाध्याय ने इस मौके पर बोलते हुए कहा कि भूमंडलीकरण ने पत्रकारिता को कई तरह से चुनौती दी है और इसने पूरी मानवता को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि आज भी यह संभव है कि इसके खिलाफ एक निर्णायक लड़ाई छेड़ी जा सके।
इस सेमिनार के पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए ईटीवी

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