सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

‘भारतीय भाषाओं और बोलियों की ताकत


 अंग्रेजी से हार नहीं सकती’भारतीय भाषाएं

images-22नई दिल्ली (एजेंसी) दुनिया में भारत ही एक ऐसा अकेला देश है, जहां हजारों भाषाओं और बोलियों का बड़ा खजाना है। इन भाषाओं में विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं के साथ यहां के लोगों के सपनों और उम्मीदों की धड़कनें हैं। इससे बढ़ कर इन भाषाओं और बोलियों की उसकी अपनी अंदरूनी ताकत है। यह ताकत कभी भी अंग्रेजी से हार नहीं मान सकती है। ये बातें इंडिया हैबिटाट सेंटर में शुक्रवार से शुरू हुए तीन दिन के भारतीय भाषा महोत्सव के पहले दिन विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों के वक्तव्यों के निचोड़ के रूप में सामने आई। इंडिया हैबिटाट सेंटर सहित दिल्ली प्रेस और प्रतिलिपि बुक्स की ओर से आयोजित इस उत्सव में ज्यादातर वक्ताओं ने जहां यह स्वीकार किया कि देश की स्थानीय बोलियां वापस लौट रही हैं वहीं उन्होंने भूमंडलीकरण के दौर में भारतीय भाषाओं के सहज विकास में अंग्रेजी को बहुत बड़े बाधक के रूप में शिनाख्त की। इसी के साथ वक्ताओं ने यह उम्मीद भी जाहिर की कि अगर हम अपने ईमानदारी से सोचें और प्रयत्न करें तो भाषाओं और बोलियों के साथ अपनी विविधता भरी संस्कृति को भी बचा सकते हैं। दूसरी बार आयोजित किए जा रहे इस महोत्सव में चौदह भारतीय भाषाओं के साठ से ज्यादा लेखकों के साथ नृत्य और गायन से जुड़े कलाकार भी भाग ले रहे हैं।
‘बोली, बानी, भाषा और गांव, कस्बा और शहर’ पर केंद्रित इस महोत्सव के उद्घाटन और ‘पुरानी बोली नया दौर: बोली इज बैक’ शीर्षक वाले सत्रों में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक चंद्रशेखर कम्बार ने भारतीय भाषाओं की विशेषताओं की चर्चा के साथ अंग्रेजी के बढ़ते खतरों से आगाह किया। उन्होंने कहा कि हम आज भले अंग्रेजी के चंगुल में फंस गए हैं पर इस भाषा में अपनी संस्कृति की महक को नहीं पा सकते। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं का क्षरण होगा तो हमारे सोच, स्वप्न, विचार और उम्मीदें भी खत्म हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि हमारी आधुनिकता तब तक अधूरी रहेगी जब तक हम अपनी बोली को साथ लेकर नहीं चलेंगे। मणिपुरी लेखक और रंगकर्मी रतन थियम ने भूमंडलीकरण के खतरों की चर्चा करते हुए कहा कि हमारी भाषा और बोली केवल लिखने-पढ़ने का जरिया मात्र नहीं है, यह हमारी मातृभाषा है और इसमें हमारी परंपराएं जीवित हैं। बोली पर भूगोल, इतिहास और वातावरण की गहरी छाप होती है। भाषाएं और बोलियां हमारी पहचान होती हैं। भारतीय भाषाएं और बोलियां लुप्त हो जाती हैं तो हमारे सामने पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अपने देश की प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को महत्व दिया जाता तो आज अंग्रेजी हम पर इस तरह हावी नहीं होती।
उड़िया के नामचीन लेखक सीताकांत महापात्र ने विभिन्न भाषाओं के बीच परपस्पर अनुवाद के काम में तेजी लाने की जरूरत बताते हुए कहा कि बड़े पैमाने पर अनुवाद कार्य नहीं होने से हम एक-दूसरे की भाषा के साहित्य और संस्कृति को ठीक
से नहीं जान पाते हैं। उन्होंने इस पर आपत्ति जताई कि अपने देश की कुछ भाषाओं को ही क्लासिक भाषा के रूप में शूमार किया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि अपने देश की सभी भाषाएं क्लासिक हैं, क्योंकि सभी की अपनी गहरी परंपराएं हैं। आलोक राय ने कहा कि हमें अपनी भाषाओं और बोलियों में सृजनात्मक क्षमता की वृद्धि के लिए अधिक बौद्धिक श्रम करने की जरूरत है। हिंदी के लेखक काशीनाथ सिंह ने भारतीय भाषाओं को कमजोर करने के लिए ज्ञान आयोग की ओर से प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाने की कार्रवाई को जिम्मेदार बताते हुए यह हैरानी जाहिर की कि मां, माटी और मानुष के नाम पर सत्ता में आने वाली ममता बनर्जी ने अपने राज्य में भी प्राथमिक शिक्षा में अंग्रेजी को लागू कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय भाषाओं के विभाग शुरू किए गए, पर वहां आध्यापक तो हैं पर पढ़ने वाले विद्यार्थी ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी संचार, संवाद और व्यापार की सक्षम भाषा के साथ इसमें राष्ट्रीयता और जातीयता का बोध है और भूमंडलीकरण के समर्थकों को इस पर ही आपत्ति है। भारतीय परेश नाथ ने कहा कि सरकार अंग्रेजी के मुकाबले भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों को कोई महत्व नहीं देती। अंग्रेजी के समाचार पत्रों को लाखों रुपए के विज्ञापन देती है, जबकि भारतीय भाषाओं के पत्रों को हजारों में भी नहीं देती।
जिलियन राइट ने कहा कि भारत में जितनी भाषाएं और बोलियां हैं, उतनी दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इसमें विविध संस्कृतियों का लेखा-जोखा है और इसकी अपनी अंदरूनी ताकत भी है, जो कभी अंग्रेजी के सामने हार नहीं मान सकती। फिल्ममेकर गुरविंदर सिंह ने कहा कि उन्हें जब फिल्म बनाने की जरूरत पड़ी तो उनका अंग्रेजी ज्ञान काम नहीं आया। उन्होंने कहा कि मुझे लोग बताते कि पंजाबी घर की और हिंदी सड़क की भाषा है और काम की भाषा तो अंंग्रेजी है लेकिन जब हम सृजनशील होने लगे तो पंजाबी का ही सहारा मिला। गीतकार निलेश मिश्र ने दावा किया कि अपने देश के लोग आज भी अपनी भाषा और बोली से प्यार करते हैं। हमारी गलती है कि हम उनके बीच अंग्रेजी मिश्रित कुछ से कुछ परोसने लगे। उन्होंने रेडियो के जरिए गांव की बोली में प्रस्तुत कर रहे अपने एक कार्यक्रम की कामयाबी का जिक्र करते हुए कहा कि आज जिस बड़ी संख्या में उसके चहेते उमड़ पड़े हैं कि हम अब गांव की बोली में अखबार निकालने को उत्साहित हो गए हैं।

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