सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

हिन्दी पत्रकारिता पर तोहमत ना लगाइए अरविंद

रविवार, 3 फरवरी 2013

मंचमुखी नहीं, जनोन्‍मुखी बने प्रिंट पत्रकारिता – अरविंद चतुर्वेदी

हिंदी के वरिष्‍ठ पत्रकार और डीएनए के संपादक अरविंद चतुर्वेद ने कहा है कि हिंदी पत्रकारिता आज मंचमुखी है जबकि उसे जनोन्‍मुखी होना चाहिए। श्री चतुर्वेद आज रविवार को सआदत हसन मंटो कक्ष में हिंदी प्रिंट पत्रकारिता पर आयोजित संगोष्‍ठी को संबोधित कर रहे थे। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के ‘हिंदी का दूसरा समय’ के तीसरे दिन आयोजित इस संगोष्‍ठी में श्री चतुर्वेद का यह भी कहना था कि हिंदी पत्रकारिता को सहस्‍त्र बाजू की भूमिका में न आते हुए अपने भाषिक समाज के सरोकारों से जुड़ना चाहिए।  वरिष्‍ठ पत्रकार और कल्‍पतरू  एक्‍सप्रेस के संपादक अरूण कुमार त्रिपाठी ने बीज वक्‍तव्‍य देते हुए कहा कि पत्रकारिता को हाशिए के लोगों की जुबान बननी चाहिए। किसान, आदिवासी और ग्रामीण समाज के बुनियादी सवाल उठ़ाकर पत्रकारिता अपनी बेहतर भूमिका सुनिश्चित कर सकती है।
      लोकमत समाचार के संपादक विकास मिश्र ने कहा कि आज प्रिंट पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पत्रकारों की जो नई पीढ़ी आ रही है, वह योग्‍य नहीं है। पुरानी पीढ़ी के संपादकों ने अपने योग्‍य उत्‍तराधिकारी भी नहीं बनाए। आज नए पत्रकारों के पास भाषा का भी पर्याप्‍त ज्ञान नहीं है। वरिष्‍ठ पत्रकार सी. के. नायडू ने कहा कि आज हिंदी पत्रकारिता हिंग्‍लिश पत्रकारिता बन गई है। उन्‍होंने एक खबर पढ़कर इसका उदाहरण भी दिया। वरिष्‍ठ पत्रकार विजय किशोर मानव ने कहा कि चालीस साल पत्रकारिता करने के बाद उन्‍हें आज लगता है कि नई वेब पत्रकारिता की संभावना उनके सामने बनी हुई है। वरिष्‍ठ पत्रकार और आउटलुक के संपादक नीला‍भ मिश्र ने कहा कि आज पूंजी का दबाव हिंदी पत्रकारिता पर बहुत ज्‍यादा बढ़ गया है। उन्‍होंने कहा कि आज पत्रकारिता में भाषा के अलावा पेड न्‍यूज समेत कई विकृतियां आ गई हैं। सन्‍मार्ग के सहायक संपादक अभिज्ञात ने कहा कि अंग्रेजी अखबारों की पृष्‍ठ संख्‍या बहुत ज्‍यादा होती है और हिंदी अखबारों की कम पृष्‍ठ संख्‍या होती है। इसके बावजूद विज्ञापन का प्रवाह इसके उलट होता है। पत्रकारिता के अध्‍येता डॉ. श्‍याम कश्‍यप ने कहा कि विश्‍व कई संकटों से जूझ रहा है। पत्रकारिता का संकट उससे अलग नहीं है। वरिष्‍ठ पत्रकार प्रकाश चंद्रायण ने अपने आलेख में पत्रकारिता के इतिहास में झांकते हुए उसके स्‍वरूप में आए बदलावों की विस्‍तृत चर्चा की। कार्यक्रम का संचालन करते हुए विश्‍वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर तथा कोलकाता केंद्र के प्रभारी डॉ. कृपाशंकर चौबे ने कहा कि आज प्रिंट पत्रकारिता के सामने जो संकट हैं, उनकी पहचान यदि हम कर रहे हैं तो यही आश्‍वासन है कि हम उसका समाधान भी ढूंढ़ लेंगे। इस कार्यक्रम में विश्‍वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. जी गोपीनाथन, डॉ. के. एम. मालती, वरिष्‍ठ कथाकार से.रा. यात्री, प्रो. रामशरण जोशी, स्‍त्री अध्‍ययन विभाग के अध्‍यक्ष प्रो. शंभू गुप्‍त, सुशिला टाकभोरे, मधु कांकरिया, गौतम सान्‍याल, आशु सक्‍सेना, विश्‍वविद्यालय के विशेष कर्तव्‍य अधिकारी नरेंद्र सिंह, हिंदी अधिकारी राजेश यादव, जनसंपर्क अधिकारी बी. एस. मिरगे, वचन के संपादक तथा इलाहाबाद केंद्र के सहायक निदेशक प्रकाश त्रिपाठी समेत भारी संख्‍या में शोधार्थी और शिक्षक उपस्थित थे। 

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