शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

समाचार चैनलों के एंकर लोकतंत्र के लिए खतरनाक – मणिशंकर अय्यर




समाचार चैनलों के एंकर को राज्य सभा सदस्य मणिशंकर अय्यर लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं. ये बात बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कही. उन्होंने न्यूज़ चैनलों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आप कितना भी उनको कह लीजिये कि पूरी बात दिखाना लेकिन जैसे ही टीवी वालों की स्टोरी बन जाती हैं झूठ शुरू हो जाता है. वो टीवी में नीचे जो टिकर चलता है उसमें आपके शब्दों को तोड़ मरोड़ कर लिख दिया जाएगा और उसके बाद कोई याद नहीं रखेगा कि आपने दरअसल कहा क्या था. पेश है उनका पूरा वक्तव्य :
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एंकर
हमारे जो टीवी एंकर हैं वो लोकतंत्र के सबसे बड़ा ख़तरा बनते जा रहे हैं. क्योंकि लोगों को भड़काते है और उनका सत्य से कोई लेना देना नहीं है. ख़ास तौर पर एक-दो वो टीवी एंकर जिनकी टीआरपी सबसे ज़्यादा है.

यह एंकर हर नौजवान एंकर को यह बुरा सबक सिखा रहे हैं कि आप शिष्टता को एक तरफ छोड़िये ज़ोर ज़ोर से चीखिये. सवाल ऐसे कीजिये जैसे मुजरिम खड़ा है अपने कठघरे में. सामने वाले के बारे में मत सोचिये कि उसकी नज़र में उसका खुद का कोई सम्मान होगा. आपके टीआरपी रेटिंग उठ जायेगें.

यह सिखा रहे हैं कि शहद बटोरने वाली मधुमक्खी की तरह हर दिन आगे बढ़ जाओ. एक दिन शिंदे साहब का नाम लेकर चीखो, दूसरे दिन पाकिस्तान का नाम लेकर चीखो, उसके बाद आशीष नंदी का नाम लेकर.

आपके टीआरपी बढ़ते जायंगे और आपको आपकी बात के लिए कोई जिम्मेवार नहीं ठहराएगा.
यह हालाँकि बहुत अफ़सोस की बात है लेकिन हमारे लोकतंत्र का हिस्सा है. आप कितना भी उनको कह लीजिये कि पूरी बात दिखाना लेकिन जैसे ही टीवी वालों की स्टोरी बन जाती हैं झूठ शुरू हो जाता है. वो टीवी में नीचे जो टिकर चलता है उसमें आपके शब्दों को तोड़ मरोड़ कर लिख दिया जाएगा और उसके बाद कोई याद नहीं रखेगा कि आपने दरअसल कहा क्या था. मैं खुद इसका दो चार बार शिकार हो चुका हूँ.

कम से कम दो ऐसे टीवी एंकर हैं जो मुझे अपने प्रोग्राम में नहीं बुलाते क्योंकि मैं उनका स्क्रीन पर खंडन करता हूँ. वो अगर मुझसे बदतमीजी से पेश आते हैं तो मैं भी जानवर बन जाता हूँ. मैं भी इनके प्रोग्राम में नहीं जाना चाहता. एक दो टीवी चैनलों में इतना ज़्यादा कट्टरपन है कि क्या कहें. इन एंकर महोदय ने और मैंने दोनों ने आपस में यह तय कर लिया है कि मेरी इनके प्रोग्राम में कोई जगह नहीं है. वो मुझे नहीं बुलाते दस दूसरे चैनल बुलाते हैं और यह भी कोई ज़रूरी नहीं है कि रोज़ टीवी पर दिखना है.

और दूसरा इन टीवी चैनलों का दृष्टीकोण बहुत ही सीमित है. मिसाल के तौर पर मैं तमिलनाडु में अपने चुनाव क्षेत्र में हूँ एक तमिल टीवी चैनल को छोड़ कर कोई ऐसा नहीं है कि तीन सौ किलोमीटर अपनी ओबी वैन को भेजे. टीवी वाले मुझसे रोज़ फ़ोन कर के पूछते हैं कि आप दिल्ली कब आ रहे हैं. मैं तो तमिलनाडु में छुट्टी मना रहा हूँ पूरे चार दिन से टीवी पर नहीं आया.

टीवी पर दिखने वाले राजनीतिज्ञों से के बारे में क्या कहूँ. कायर बनना है तो कोई भी कायर बन सकता है और इसमें राजनीतिज्ञ भी जुड़े हुए हैं.

दरअसल राजनीति में उतरने के लिए बहुत ही हिम्मत की ज़रुरत है. एक दिन आप जीतते हैं मंत्री होते हैं, दूसरे दिन आप हार जाते हैं. कभी समझ ही नहीं आता कि जिताया क्यों था और हराया क्यों. जब जीते थे तब भी वही आदमी थे वैसे ही काम करते थे और हार गए तब भी वही आदमी थे.

और यही अनिश्चितता बहुत सारे नेताओं में दिखती हैं जब वो टीवी पर होते हैं. वैसे 70-80 फीसदी नेताओं के साथ यह संकट नहीं है क्योंकि उन्हें कोई टीवी पर बुलाता ही नहीं है. जिन बचे हुए लोगों को बुलाया जाता है उनमे से कुछ अपने दृष्टीकोण पर हिम्मत के साथ कायम नहीं रह पाते.मैं तो अपने साथियों से यही कहूंगा कि कहो वो जो कहना है मत घबराओ. मैं मिसाल देता हूँ दिग्विजय सिंह की जो चाहते हैं कहते हैं बाकी चाहे जो चिल्लाता रहे. मैं उनसे सहमत हूँ या नहीं यह बात महत्वपूर्ण नहीं लेकिन मिसाल के तौर पर जो बटला हाउस के मुद्दे पर उन्हें कहना था वो उन्होंने कहा और जिसको जो मानना था उसने माना.

रही बात आशीष नंदी विवाद की जहाँ दलित और पिछड़े समाज से आने वाले कई बुद्धीजीवी उनके साथ खड़े दिखे जबकि नेता ज़्यादा असहिष्णु लग रहे हैं तो मैं बस यही कहूंगा कि हमें हर पांच साल में वोट मांगने जनता के बीच में जाना पड़ता है बुद्धिजीवियों को तो कोई इस तरह का संकट नहीं है. इसके अलावा एक महत्वपूर्ण बात और है.

मैं इस तरह के विवादों को छोटे समूहों के हंगामे को असहिष्णुता के तौर पर या लोकतंत्र के खतरे के तौर पर नहीं देखता. मैं मानता हूँ कि यह इस बात का सबूत हैं कि हमारा लोकतंत्र अधिक व्यापक हो रहा है.

अब चाहे मेरे जैसे राजनेता हों या आशीष नंदी जैसे बुद्धीजीवी सबको सार्वजनिक जगहों पर बोलते वक़्त अपने शब्दों पर ध्यान रखना होगा क्योंकी वो लोग, वो समूह जो सदियों से लोकतंत्र के कमरे के बाहर थे वो अन्दर आने के लिए धक्के मार रहे हैं और अपनी बात को सुनाने की कोशिश कर रहे हैं यह अच्छा है बुरा नहीं.
(बीबीसी संवाददाता अविनाश दत्त से बातचीत पर आधारित. बीबीसी से साभार)

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