सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

राजेन्द्र यादव

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राजेन्द्र यादव की धज्जियाँ उड़ाएँ

प्रकाशन :गुरूवार, 1 अप्रेल 2010
सैन्नी अशेष
राजेन्द्र यादव की धज्जियाँ?
कोई क़सर रह गई थी क्या?
हाँ-हाँ! समूची! अपनी तरफ़ से लोगों ने बहुत धज्जियाँ उड़ाई होंगी, मगर बात नहीं बनी। बंदा कभी टस है, तो कभी मस है, मगर कमबख़्त जस का तस है।
न भगवान का डर, न अनचुनी मौत का;  न चुनी हुई हमसफ़र का,  न हमसफ़र की सौत का! तमाम होने-सोने वालियाँ हैरान हैं; सारी की सारी रोने-धोने वालियाँ परेशान हैं। यह आदमी है कि हमारी खाज है ?
कोई इलाज़ है? नहीं है। जब जाएगा तो तुम्हें ही ज़्यादा याद आएगा।
कुछ बात है कि मस्ती मिटती नहीं तुम्हारी! कुछ करना ही होगा किसी को!
यह सब इसलिए लिख रहा हूँ कि कल यानी ‘हंस’,  फरवरी, 2010 का संपादकीय पढ़ा और फिर रात एक महफ़िल में नामवरसिंह की मौजूदगी में अशोक वाजपेयी और राजेंद्र यादव की एक दिलचस्प झड़प का तिलस्मानी नज़ारा आँखों से होकर गुज़रा। उसका हाल सुनाने से पहले एक पुराना वाकया सुनाता हूँ:
राज कपूर की फिल्म ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’  के बाद ज़ीनत अमान को फ़िल्मों में काम करते और मशहूर होते दस साल हो गए थे। एक थे राजकुमार! एक ही! अपनी जानलेवा आवाज़, सदा के बिगड़े हुए मिज़ाज़ और बेहद संजीदा अदाकारी के लिए मशहूर यह ‘जानी’ मनाली के ऊपरी इलाके में ज़मीन का सौदा करके लौटे। एक पार्टी में ज़ीनत अमान ने राजकुमार को दूर अकेले हाथ में जाम लिए खड़े देखा तो अपने दोस्तों को छोड़ कर उनकी तरफ़ लपकी। सब हैरान कि इतनी बड़ी हीरोइन को इस अहंकारी शख़्स के पास जाने की क्या ज़रूरत?
‘‘राजकुमार साहब... सलाम!’’ ज़ीनत ने सामने पहुँच कर अदब से सिर झुकाया। राजकुमार ने उसे पाँव से लेकर सिर तक देखा और चुप खड़े रहे।
‘‘मैं... ज़ीनत... ज़ीनत अमान...’’ ज़ीनत के छक्के छूटे।
राजकुमार ने अब ज़रा ठहर कर कुछ ग़ौर से उसे देखा; जाम को होंठों तक ले जाकर आराम से चुस्की ली और फिर कहा, ‘‘माशा अल्लाह! आपका नाम बहुत ख़ूबसूरत है... ज़ीनत अमान! मगर आपकी सूरत आपके नाम से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत है! मोहतरिमा, आप फ़िल्मों में क्यों नहीं आ जातीं?’’
अब आगे चलना थोड़ा आसान है।
अशोक वाजपेयी को सिज़दे में देख कर राजेंद्र यादव कह रहे थे: ‘‘आपका गद्य बहुत ख़ूबसूरत और काव्यात्मक है... आप कविता में क्यों नहीं आ जाते?’’ नामवरसिंह ने राजेंद्र को टोका, ‘‘तुम्हें सिर पर बैठाने वाले नए लौंडों ने तुम्हारी याददाश्त अपने जैसी बना ली है। अशोक वाजपेयी तो हिंदी के इस ज़माने के जाने-माने कवि हैं।’’
सबके बीच-बचाव के बावजूद राजेंद्र अपने वक़्तव्य पर क़ायम थे और कह रहे थे, ‘‘यहाँ न तो किसी में सेंस ऑफ़ ह्यूमर है, न ही अपनी सेल्फिश विधा में चैन से मरे रहने का सलीका। जब देखो, ‘हंस’ न पढ़ने का ऐलान करके भी मेरे संपादकीय गद्य का एक-एक अक्षर चाटते रहते हैं। तुम अपनी कविता में बने रहो न! इन कवियों और कवयित्रियों ने तो जीना हराम कर रखा है! छापता तो मैं भी हूँ, मगर पता नहीं क्या लिखा होता है? पता नहीं मैं ही कब कह दूँ कि मैं ‘हंस’ नहीं पढ़ता।’’
अपनी मंडली में लौट कर अशोक वाजपेयी कह रहे थे, ‘‘मैंने बहुत कोशिश कर ली, आख़िर इस आदमी को अपनी मूर्खताओं से मुक्त होना क्यों अच्छा नहीं लगता? अब एक ही उपाय है कि निरुपाय होकर प्रभाश जोशी की भांति इनके पाँव छुओ और मुक्त हो जाओ।’’
हल्के-फुल्के होकर अब हम राजेंद्र यादव के फरवरीय संपादकीय पर चलते हैं और देखते हैं कि राजेंद्र आख़िर चाहते क्या हैं? और, कहानी के अनासक्त डॉन! तुम्हारी विरक्ति की अनुरक्त इच्छाएँ क्या हैं? तुम अपने वक़्तव्यों से परेशान करते हो या मुरदों में जान भरते हो? संपादकीय में आप फरमाते हैं:
‘‘मेरी सर्वग्रासी विकराल संशयात्मा शब्द पर विश्वास खो चुकी है। फिर विचार तो शब्द के अर्थ को तिरस्कृत करके अपने बौद्धिक वितान का विस्तार है...’’
‘‘विचार का अंत हुआ,  साहित्य का अंत हुआ,  हर चीज़ का अंत हुआ। हमें लगा कि हम एक ऐसे मोड़ पर आ गए हैं,  जहाँ विचार लगभग व्यर्थ हो चुका है...’’
‘‘विचारधारा को आधार बना कर जो समाज बनाया जाता है,  वह बहुत क्रूर और निष्ठुर होता है। चाहे वह साम्यवाद का विचार हो या फ़ासिज़्म का। धर्म को विचार मानें तो उसे भी हम आतंकवाद के रूप में देख रहे हैं। विचारधारा के आधार पर खुला समाज बनाना शायद संभव नहीं है, क्योंकि वह बहुत घुटन भरा या लगभग मनुष्य-विरोधी है...’’
‘‘हमारे पास दो ही रास्ते हैं: व्यक्तिगत अतीत में जाएँ या सामाजिक अतीत में। व्यक्तिगत अतीत हमें कलावादी जंगलों में ले जाता है... वहाँ वर्तमान समाज को बदलने या उससे मुठभेड़ करने की कोई गुंजाइश मुझे नहीं दिखाई देती...’’
‘‘मुझे लगता है कि क्या फ़ायदा है लिखने का, लिखना ही व्यर्थ लगने लगता है। सारा सोच अनरियल लगने लगता है। मैंने पता नहीं कितने पन्ने लिखे होंगे अभी तक। क्या फ़ायदा हुआ उससे? फिर उन्हीं लोगों ने क्या ग़लत किया जिन्हें हम कलावादी कहते हैं। अंत में उसी जगह पहुँचे जिसके विरोध में हम खड़े थे...’’
‘‘जिस चीज़ का आपको डर था वही मैं कहने जा रहा हूँ। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श,  जिनको लेकर मुझे बहुत गालियाँ मिलीं... मैं एक अंधी गली में आ गया हूँ। उससे निकलने का रास्ता तो मुझे वहीं दिखाई देता है...’’
‘‘मुक्ति की पहली शर्त यही होगी कि आप वहीं से अपनी बेड़ियों को काटें। हज़ारों साल से स्त्री अपनी देह तक सीमित कर दी गई है... पहला क़दम उसकी देह की मुक्ति का होगा। वो क्या हो?’’
‘‘हमने जिस मध्यवर्ग की कहानियाँ डूब कर लिखी थीं,  आज वैसा मध्यवर्ग है ही नहीं। मुझे वो कहानियाँ अच्छी चाहे जितनी लगती हों,  मैं उन्हें चाहे जितने नंबर दूँ लेकिन वो मुझे आज बहुत प्रासंगिक नहीं लगतीं...’’
‘‘मृत्यु की चेतना ने बहुत महान साहित्य दिया है... मुझे इस तरह की मृत्यु दिखाई नहीं देती... मृत्यु मेरे लिए कभी भी डर का कारण नहीं रही...’’
‘‘एक ख़ास अवरोध पर खड़े होकर जो रास्ता मुझे दिखाई देता है,  वह है स्त्री और दलित संघर्ष का रास्ता। इससे आगे नक्सली संघर्ष से जुड़ने का ही विकल्प है और वह साहस मुझमें नहीं है।’’
मामला कुछ गंभीर हो गया। एक ब्रेक लेते हैं।
तीन ‘एम’ अचानक एक लेखक के यहाँ एक घरेलू समारोह में मिल गईं। एम. बी., एम. जी. और एम. पी.। जब मिल ही गईं तो एक कोने में बैठीं बतियातीं एक मुद्दे पर एक हो गर्इ्रं। मिलजुल मन!
‘‘वही हाल है... जिससे दो मीठी बातें हुईं,  अगले अंक में उसकी कहानी देख लो! अब तो री-राइट भी नहीं करते।’’
‘‘और जो अतीत हो गई, वो मरी हुई गाय या भैंस!’’
‘‘नई और अनोखी होनी चाहिए, थोड़ी चमचमाती! साकार न भी हो...’’
‘‘अरे! एक भूतनी तो निराकार होकर भी साल में चार छपवा कर फरार हो गई।’’
सपने भी क्या ग़ज़ब ढाते हैं! अगले ही पल दृश्य समंदर का था। जहाज अभी-अभी डूबा था। एक तैरते तख़्त से चिपट कर यही तीन बची थीं। सामने छोटा सा टापू था। नदी के द्वीप सा!
किनारे लगते ही आशा-संपन्न सद्भाव-संवाद:
‘‘मैं लकड़ियाँ लाऊँगी और पर्णकुटीर बनाऊँगी।’’
‘‘मैं कंदमूल...’’ दूसरी ने कहा।
‘‘लेकिन हम तीनों खाएँगी।’’ तीसरी ने चेताया।
महान से महान लेखिकाएँ किसी भी षैतान के सपने में कितनी अपदस्थ हो जाती हैं!
ज्योंही वे कुछ क़दम आगे बढ़ीं, सच मानिए,  अभिनव ओझा जी,  तीनों के मुँह से एक ही प्रकार की समवेत चीख निकल गई। चीखें नहीं, चीख!
सामने एक सुंदर पर्णकुटीर था। कुटीर के खुले आँगन में एक पुष्पशैया थी। शैया पर एक शेर मुँह में सिगार लगाए अधलेटा और अधबैठा था। उसके सामने एक शेरनी सुराही की गर्दन को झुका कर दो पैमानों में ओमरस या सोमरस जैसा कुछ भर रही थी।
असंभव दृश्य था, क्योंकि शेर का नाम और रूप राजू! शेरनी का नाम व रूप ‘एम. नं. वन’। मीतू।
‘‘शादी नहीं करने का यह मतलब कैसे निकल सकता है कि मरते वक़्त तक भी साथ हुआ जा सकता है?’’ इस निर्जन में तीन मिलजुल मन सामने की दुविधा को देख त्रिविधा में एक साथ सोचते रह गए।
अच्छे लोगों को सपने में कैसे गच्चे दिए जा सकते हैं!
होना तो यह चाहिए कि तीन स्त्रियाँ वयोवार्धक्य में भी शेरनियाँ होकर एक साथ टूट पड़ें, लेकिन हुआ कुछ और ही! इनकी समवेत चीख सुनते ही दो मुंडियाँ इस ओर मुड़ीं और एक भी विमर्श किए बिना दो तन एक स्प्रिंग पाकर लंबी छलाँग हो गए। एक ही छलाँग में बीच समंदर में कैसे तिरोहित हुआ जाता है, इसे साहित्य में भला कैसे चित्रित किया जा सकता है?
अगले ही क्षण तीन में एक बोली:
‘‘भीतर सब कुछ है। मैं कॉफी बना कर लाती हूँ।’’
‘‘दो ही बनाना। मेरे लिए तो सुराही में आवेहयात छोड़ गए हैं जाने वाले।’’
‘‘तुम दोनों बहुत निर्मम हो ! कैसे बताऊँ कि राजू और मैं इतने साल से अलग रहकर कितने क़रीब आ गए थे... मेरी लड़ाईयाँ लड़ने लगे थे... जो उन्हें आता था, या जो उनसे हो सकता था, वो सब किया मेरे लिए... अब...’’
‘‘धीरे बोलो,  अभी हवाई की तरह उठेगा समंदर में से और कहेगा, ‘‘हम कौन साले मर गए हैं?’’
विछोह भारी था और टापू वर्जनामुक्त। गले से ज़रा ही नीचे तक भरी सुराही शाम तक ख़ाली थी। लेकिन जब दिमाग़ नहीं रह जाता तो दिल में यादें और आँखों में आँसू तूफ़ान ले आते हैं।
साली हर बात गंभीर क्यों होने लगती है?
राजेंद्र जी, आपने अपने संपादकीय में इस बार बहुत मूलभूत बात कह दी है। यह सब लेखन-वेखन टाइमपास करने के लिए था। ‘ये कैसी मुहब्बत, कहाँ के अफ़साने, ये पीने-पिलाने के सब हैं बहाने!’ मेरा आशय यह ज़रा भी नहीं, जैसाकि पिछले साल ‘समयांतर’ ने कहा था और अन्यत्र भी कहा जा रहा है, कि अब ‘हंस’ शराबें पिलाने वालों की कहानियाँ छापने लगा है। और यह आशय तो कतई नहीं कि किसी संपादक को शराब पिलाने वाले लाजवाब या ख़राब आदमी की अच्छी कहानी नहीं छापनी चाहिए। मेरे लिए ख़राब से ख़राब चीज़ अपनी रचना का अहंकार है या उसे मिलने वाला मंचीय सम्मान या पुरस्कार। मैंने आपके ऊपर पत्थर उछालते लोगों की लड़खड़ाती बदहवास शराबनोशी देखी है और आपके अविचलित कदमों में झुकते प्रभाश जोषी भी देखे हैं। यह भी देखा है कि दिल्ली में रहते कोई मुझ फक्कड़ पहाड़ी घुमक्कड़ की तरह निश्चिंत नहीं जी सकता। ‘हंस’ के लिए कितनी ही स्तरीय कहानियाँ आपको नए लोगों के स्वागत और उनके लिए जगह बनाने की ख़ातिर एक तरफ़ सरका देनी पड़ती होंगी। ‘हंस’ दैनिक भी हो जाए तो भी कविता-कहानी छपवाने के लिए जीवन गँवाने को तैयार लोगों का पेट नहीं भरेगा। चुप देखने वाले जो कह सकते हैं अगर उसे सामने आकर समवेत कह दें तो ये कहीं के न रहें।
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  सैन्नी अशेष
अंतिम कुटीर, आरामगढ़, रायसन, जिला कुल्लू (हिमाचल प्रदेश) 175128 मो.- 09418240363
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3 टिप्पणियाँ >>

काजल कुमार

टिप्पणी # 1

बार बार ज़िक्र कर, ऐसे लोगों को ज़्यादा तरज़ीह देने की ज़रूरत नहीं है.
कुल टिप्पणियाँ : 3; समय : 24/April/2010 21:05:10


sanjay

टिप्पणी # 2

yeh sab sahitya ka polatic hai bhi
कुल टिप्पणियाँ : 3; समय : 24/April/2010 22:08:09


ललित शर्मा

टिप्पणी # 3

साली हर बात गंभीर क्यों होने लगती है?
कुल टिप्पणियाँ : 3; समय : 24/April/2010 22:31:49


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