बुधवार, 20 सितंबर 2017

राजरंग में है फूलों की खुश्बू





रंग बिरंगे फूलों से सुसज्जित एक मोहक गुलदस्ता

अनामी शरण बबल

साक्षात्कार लेना सरल नहीं होता। पत्रकार एक हमलावर सा उन तमाम सवालों को सामने रखता है, जिससे अमूमन सामने वाला व्यक्ति साफ बचना चाहता है। आरोपों-प्रत्यारोपों, हमलावर सवालों और साफ साफ बच निकलने की यथा-कोशिशों के बीच ही मूलत: साक्षात्कार केंद्रित होता है। ज्यादातर आम पाठकों को भी साक्षात्कार पढ़ने की ललक होती है। बिना लाग लपेट साफ साफ बातों की प्रस्तुति ही एक साक्षात्कार की सफलता और पत्रकार की कार्यकुशलता वाकपट्टुता, हाजिरजवाबी, तथा अपने कार्य की निष्ठा को प्रदर्शित करता है।

आम पाठकों में काफी लोकप्रिय होने के बाद भी आमतौर पर साक्षात्कारों पर आधारित या बहुत सारे साक्षात्कारों को संकलित करके एक किताब की तरह प्रस्तुत करने की परम्परा अभी खासकर हिन्दी जगत में प्रचलित नहीं है। यही कारण है कि कविता कहानी नाटक उपन्यास आदि की तो अनगिनत किताबें बाजार से लेकर रेहड़ी पटरी की दुकानों पर पुरानी किताबों के बाजारों मेलों में मिल जाएंगी, मगर साक्षात्कारपरक पुस्तकों का नितांत अभाव है। प्रकाशन क्षेत्र में इस दुर्लभ श्रेणी की परम्परा को पाठकों के बीच हाजिर करने की इस महत्ती प्रयास की  सराहनीय है। बतौर एक पत्रकार 20-25 पहले किए गए साक्षात्कारों को इतने लंबे समय तक सहेजकर रखने और इसकों किताब के रूप में प्रस्तुत करने की ललक के लिए पत्रकार संजय सिंह को बहुत बहुत बधाई कि महानगरीय पत्रकार का चोला ओढने के बाद भी इनके भीतर का एक कोमल संवेदनशील पत्रकार अभी जिंदा है।

किसी कथा कहानी संग्रह की तरह ही इस किताब राजरंग को भी साक्षात्कार संग्रह ही कहा जाना ही इस किताब की मान्यता और इस रचनात्मक परम्परा के प्रति ज्यादा न्याय-संगत  होगा। साक्षात्कार संग्रह राजरंग में कुल 25 लोगों के 32 साक्षात्कार संकलित है। ज्यादातर इंटरव्यू बहुत लंबें नहीं है,,जिससे पाठकों को पल भर में देख लेने की एक और सुविधा मिलती है। मगर आकार प्रकार में लंबोदर नहीं होने के बाद भी इंटरव्यू की गुणवत्ता सहजता सरलता सटीकता और मारक प्रभावी उद्देश्यों से कहीं भी कोई इंटरव्यू  कहीं भटकता हुआ नहीं दिखता है। हर इंटरव्यू का एक उद्देश्य परिलक्षित होता है। खासकर बेहद बेहद पुराने और लगभग अप्रांसगिक से हो गए इंटरव्यू को ( हर साक्षात्कार के साथ) एक समकालीन टिप्पणी के साथ यह बताया गया है कि लिया गया इंटरव्यू कब और क्यों है और उस समय की तात्कालिक स्थितियां कैसी थी। इस तरह के परिचायक टिप्पणी के बाद पुराने इंटरव्यू को पढ़ने देखने और समझने की मानसिकता को बल मिलता है। लगभग अप्रांसगिक से हो गए उसी इंटरव्यू के प्रति फिर नजरिया भी बदल जाता है।
खासकर लालू यादव और शरद यादव के तीन तीन इंटरव्यू है। जिसमें लालू की तीन हालातों में बयान और टिप्पणियों पर भी अलग छाया दिखती है। खुद को ईमानदार और बेदाग दिखने दिखाने की उत्कंठा के बीच लालू यादव एक ताकतवर नेता होने के बाद भी आमलोगों के लिए प्रेरक कभी नहीं बन सके। दूसरों की केवल गलती देखने की भूख ने ही यादव परिवार को सपरिवार कटघरे में खड़ा कर दिया है। इसके बावजूद सपरिवार लालू यादव में आत्म मूल्यांकन से बचने की कमी ही इस परिवार की विफलता का मुख्य वजह है। पत्रकार संजय के साथ अनौपचारिक रिश्तों के कारण ही लालू में ही यह दम था (और है) कि कांग्रेस मुखिया के आसपास घेरा डाले कुर्सीछाप नेताओं पर कमेंट्स करके भी वे सोनिया के लिए संकटमोचक बने रहे। शरद यादव के भी इसमें तीन इंटरव्यू है। ज्ञान जानकारी और शिष्टता के मामले में काफी संयमित (आक्रामक भी) संतुलित से शरद यादव के इंटरव्यू को पढ़ना ज्यादा रोचक लगता है। कहीं कहीं पर आक्रामक तो कभी मीडिया से भी शिकायत करने और रखने वाले शरद की बातों में एक खास तरह की सहजता है जिससे तीखी बातें भी बहुत खराब नहीं लगती। समय की पदचाप को भांपने में विफल या देश को ज्यादा प्रमुऱता देने वाले शरद इस समय एनडीए के सहयोगी बनकर मंत्री बन सकते थे। ताजा मंत्रीविस्तार में जेडीयू को केंद्र में कोई जगह नहीं मिली। शायद शरद यदि जेडीयू में होते तो प्रधानमंत्री इनकी उपेक्षा नहीं कर पाते, क्योंकि शरद यादव में ही परिणाम की परवाह किए बगैर यह  कहने का दम है कि देश की सबसे बड़ी बीमारी जातिवाद है।

दलित आधारित साक्षात्कार होने के बाद भी रामविलास पासवान के मानवीय संस्कार और पारिवारिक धरातल को खंगालने की पहल ज्यादा है। पसंद नापसंद विफल अभिनेता बेटे और सिनेमा आदि पर भी पासवान के जवाब पाठकों को सुकून देता है। दलबदल और समय के साथ समझौता नहीं हो पाने या मुलायम परिवार के प्रस्ताव को यह कहकर नकार देना कि मेरी कर्मभूमि बिहार है। यह निष्ठा ही पासवान की सबसे बड़ी ताकत है कि बिहार की राजनीति में (से) इनको कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
कर्नाटक में कई बार मुख्यमंत्री रहे समाजवादी नेता और पूर्व पीएम चंद्रशेखर के बतौर शिष्य की तरह मान्य रामकृष्ण हेगडे के इंटरव्यू से इस किताब की शुरूआत होती है। इस बेहतरीन इंटरव्यू में एक नेता के राजनीतिक सामाजिक पारिवारिक वैज्ञानिक सोच तथा साहित्यिक संस्कारों की रोचक अभिव्यक्ति हुई है. बहुत सारे सवालों को जिस सहजता और सौम्यता के साथ जवाब दिया गया है वह हेगड़े के कद को ज्यादा सम्मानजनक बनाता है। यह हेगडे जैसे ही बड़े दिल वाला कोई नेता कहने का साहस कर सकता है कि तमाम दलों और नेताओं के प्रति अपनी क्या धारणा है। इसे पढना हर पाठक को सुहाएगा।
दिल्ली की सीएम से भूत (पूर्व) सीएम हो गयी शीला दीक्षित के इंटरव्यू में चालाकी और दूसरों के प्रति निंदारस झलकता है। शांत और बेहतरीन व्यावहार कुशल होने की यह कौन सी खासियत (?) है कि नाना प्रकारेण आरोपों के बाद भी खुद को बेदाग और जमाने को चोर कहकर निकल जाए। यह पब्लिक सब जानती है मैड़मजी कि यदि 70 सदस्यीय विधानसभा में आप को 67 /3  के सुपर जीत के परिणाम में यदि कांग्रेस का खाता भी ना खुले और खुद शीला जी भी चुनावी भौसागर में डूब जाए तो इस हाल में बेदाग कहना अपनी ही बेइज्जती मानी जाएगी।     
चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी योगी आदित्य का इंटरव्यू भी बेहद रोचक और पठनीय है। सांसद और यूपी के सीएम के तौर पर काम कर रहे योगी के इंटरव्यू पर लिखित टिप्पणी भी बेहद रोचक और संबंधों को नया आयाम देता है। पौड़ी गढ़वाल से किस तरह गोरखपुर आए और बतौर गोरक्षपीठ के महंत से लेकर सासंद और अब मुख्यमंत्री का दायित्व संभाल रहे योगी को गोरखपुर में लोग महाराज जी कहते है। इनसे अपने संबंधों की निकटता को प्रदर्शित करते हुए पत्रकार नें एकदम खांटी पत्रकार बनकर इंटरव्यू किया है। जहां पर रिश्तों का संकोच नहीं दिखता। संबंधों को दरकिनार करके पत्रकारीय मूल्यों के साथ न्याय करना संभव नहीं होता मगर चरण स्पर्श करके मान देने वाले पत्रकार संजय सिंह का यह बेलौस धाकड़ इंटरव्यू इनकी पेशेगत ईमानदारी को सम्मानजनक बनाता  है।
कांग्रेसी नेताओं में बौद्धिक इमेज रखने वाले जयराम रमेश का इंटरव्यू दलगत खाने से बाहर निकलने वाले एक नेता की छवि को मजबूत करता है। ज्यादातर सवाल आप और केजरीवाल पर ही है मगर लगता है कि दिल्ली के सीएम ने जयराम रमेश की एक बात मान ही ली है । रमेश ने केजरीवाल को एक सलाह दी थी वे प्रॉमिस कम करे, काम ज्यादा करे। गवर्नेस इज नॉट राकेट साइंस। ही शुड टॉकलेस। लगता है कि सलाह मानकर ही अब केजरीवाल बातें कम और काम ज्यादा करने की नीति को अपना सूत्र बना लिया है। सलमान खुर्शीद के इंटरव्यू में भी पार्टी के भीतर मुस्लिमों अल्पसंख्यकों के वोट छिटकने का दर्द है, तो इस वोट को सहेजने की चिंता भी है । वहीं महाराष्ट्रीयन पृष्टभूमि से आने वाले अब्दुल रहमान अंतुले का इंटरव्यू भी पठनीय है। भारत के मुस्लमानों की सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक दशा दिशा पर सच्चर समिति की रिपोर्ट के संसद में रखे जाने के बाद यह इंटरव्यू लिया गया है। जिसमें तमाम विवादों हालातों तथा सामाजिक हालातों पर बातचीत की गयी है। बातचीत जितनी उम्दा और सारगर्भित बनती जा रही थी उसके हिसाब से यह एक संक्षिप्त और पाठकों को प्यासा रखने वाला  इंटरव्यू है। इसको और विस्तार देने की जरूरत थी, ताकि बहुत सारे प्रसंग और स्पष्ट हो पाते। उतराखंड के सीएम रहे हरीश रावत के इंटरव्यू से भी इनकी पीडा और दुर्बलता जाहिर होती है।
हरियाणा के राज्यपाल रहे महावीर प्रसाद और किस्मत से बिहार के मुख्यमंत्री बन गए जीतनराम मांझी  का इंटरव्यू आत्मश्लाघा से प्रेरित है। अपने आपको महाबलि समझने की भूल करने वाले इन नेताओं को अपने बौनेपन का अहसास नहीं होना भी भारतीय लोकतंत्र का एक कमजोर पक्ष है। किताब में स्वामी प्रसाद मौर्य मोहम्मद युनूस, क्रिकेटर कीर्ति आजाद, नरेश अग्रवाल, दिनेश त्रिवेदी, डा. सैफुद्दीन सोज, और जोलम ओरम के इंटरव्यू से अलग अलग पीडा और चिंता सामने आती है। मगर इंटरव्यू की संक्षिप्तता से पाठकों का मन नहीं भरेगा।
कुछ अलग हटकर देखे तो जवाहरलाल नेहरू यूनीवर्सिटी के छात्र नेता रहे डी.पी.त्रिपाठी के इंटरव्यू में इस शिक्षा संस्थान की सोच और खुलेपन को समझने में आसानी होगी। पत्रकार से एक नेता की दूसरी बीबी बनी और बाद में वैवाहिक खटास के बाद खुद को राजा मतंग सिंह कहलवाने के शौकीन मंतग सिंह की नंगई और उससे संघर्ष कर रही बीबी नंबर टू मनोरंजना सिंह की पीड़ा और सामाजिक हालात के विरूद्ध होकर युद्ध करने की मानसिकता को समझना रोचक लगेगा। समलैंगिको के अधिकारों के लिए संघर्षशील नाज फाउण्डेशन इंडिया की अंजलि गोपालन का साक्षात्कार और लंबा होता तो और बेहतर बन पाता। महामंडलेश्वर सच्चितानंद गिरि महाराज की आत्मस्वीकृति ही इनकी सबसे बड़ी ताकत और साहस का परिचायक है। किस किस तरह के लोग किस तरह महामंडलेश्वर बन जा रहे हैं यह जानना आस्थावान लोगों के विश्वाल पर गहरा आघात से कम नहीं है। और अंत में यूपी के दिवंगत मुख्यमंत्री वीरवहादुर सिंह के बेटे फतेह बहादुर सिंह का अति संक्षिप्त इंटरव्यू इस बात को जगजाहिर नहीं कर पाता कि किस तरह कांग्रेसियों ने इनके पिता और केंद्रीय संचार मंत्री की फ्रांस पेरिस में दौरे के समय हत्या करायी थी?
साक्षात्कारों के संग्रह की इस किताब की भूमिका हिन्दी के युवा आलोचक  डा. ज्योतिष जोशी और वरिष्ठ पत्रकार अरूणवर्धन की है। डा. जोशी की यह टिप्पणी सौ फीसदी सही है कि कहना न होगा कि संजय सिंह जैसे कर्मठ और विचारवान  पत्रकार ने इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय नागरिकों को सचेत करने के साथ साथ नागरिक धर्म के प्रति जिम्मेदार बनाने का कार्य किया है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। जबकि  अरूणवर्धन की यह टिप्पणी बड़ी मूल्यवान है कि पुस्तक इस दृष्टि से अर्थवान है कि इसमें संकलित नेताओं की चर्चा के बिना भारतीय राजनीति की कोई भी चर्चा अधूरी मानी जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण है कि इस पुस्तक कगा प्रकाशन ऐसे मोड़ पर हो रहा है जबकि भारतीय राजनीति के मुहाबरे बदल रहे हैं। शाहदरा के लोकमित्र प्रकाशक ने बड़ी लगन के साथ इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। मगर इससे भी ज्यादा उल्लेखनीय पत्रकार संजय सिंह का यह कहना है कि मैं न अपने अतीत में जीता हूं और न भविष्य मे। मैं तो बस अपने वर्तमान से मतलब रखता हूं। और आभार जताने में कहीं से भी किसी से भी कोई कोताही ना करने और रखने वाले पत्रकार संजय की यही खासियत है जो उन्हें भीड़ से अलग करके एक स्वायत्त पहचान देती और दिलाती है।
अंतत इस पुस्तक में भारतीय राजनीति और समाज के विभिन्न प्रकारेण के रंग बिरंगे फूलों को संयोजित करके एक जगह एक सुदंर मोहक और आर्कषक मनभावन गुलदस्ते का रूप दिया गया है। जिसमें कई तरह की खुश्बू और गंध मिश्रित है। कुलमिलाकर सामाजिक संदर्भो को समझने में यह एक उपयोगी और पठनीय संकलन है. जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

2 टिप्‍पणियां: