मंगलवार, 19 सितंबर 2017

मोदी के बीजेपी में जेडीयू का साथ रहना गवारा नहीं : केसी त्यागी









22 साल के बाद राज्यसभा के रास्ते संसद में जनतादल( यूनाईटेड) के नेता केसी त्यागी की राजनीति की मुख्यधारा में फिर से वापसी हुई है। इनकी छवि वेस्ट यूपी के एक दिग्गज और धाकड़ नेता की है। तमाम बड़े और दिग्गज नेताओं की कसौटी पर भी ये हमेशा खरे साबित हुए है।  कुशल संयोजक और हर तरह के हालात को मैनेज करने में दक्ष जुझारू और मशहूर होना इनकी सबसे बड़ी खासियत है। तमाम धाकड़ नेताओं में लोकप्रिय रहे राष्ट्रीय यूनाईटेड  के सांसद (  राज्यसभा  )  और अब प्रवक्ता केसी त्यागदी से 2013 में अनामी शरण बबल ने लंबी बातचीत की। उस समय जेडीयू और भाजपा कहे या एनडीए से तलाक हो चुका था। दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने और आरोप प्रत्यारोप  लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते थे। मगर सुशासन कुमार के बिहार के दबंग और राजद लालटेन छाप नेता लालू यादव से भी तलाक हो गया। तलाकशुदा जेडीयू पलक झपकते ही पहले सनम एनडीए की अंकशायिनी हो गयी। बदले हाल और हालात में भाजपाईयों पर कटाक्ष को देखना सुनना और पढ़ने का एक अलग सुख होता है। पेश है चार साल पहले लिए गए इंटरव्यू के  मुख्य अंश  : -अनामी शरण बबल-  


सवाल – राष्ट्रीय  जनतांत्रिक गठबंधन ( एनडीए) से जनतादल यूनाईटेड के अलगाव के बाद नयी योजना या रणनीति क्या है ?
जवाब—एनडीए से अलग होना एक बेहद कष्टदायक फैसला रहा, जिसको लेकर घोषना करने में करीब एक साल का समय लग गया। आजादी के बाद गैरकांग्रेसवाद का यह सबसे लंबा और टिकाउ गठबंधन बना था। रोजाना इस तरह के गठबंधन नहीं बनते हैं, जिसमें एक कार्यक्रम को लेकर 17 साल तक साथ साथ रहे। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा का रूख हमलावर हो गया है और वो पूरी तरह जेड़ीयू को दोषी ठहराना चाहती है। जिसके खिलाफ बिहार और खासकर अपने इलाके में गोष्ठी सेमिनार पैदल यात्रा जुलूस जनसभा वाद विवाद और नुक्कड़ सभाओं के जरिये बीजेपी की चाल को रखाजा रहा है। हम जनता को बताना चाहते हैं कि इस गठबंदन को तोड़ना क्यों जरूरी हो गया था।
सवाल – जरा हमें भी बताइए न कि क्या ऐसी मजबूरी आ गई कि जब लगने लगा कि बस अब मामला बर्दाश्त से बाहर हो चला है ?
जवाब – देखिए, जब तक बीजेपी में माननीय अटल बिहारी बाजपेयी और लाल कृष्ण आड़वाणी का प्रभाव और दबदबा था, तब तक सामान्य तौर पर हमें कोई तकलीफ नहीं थी, क्योंकि वे लोग आदर के साथ गठबंधन की मर्यादा को समझते थे।  मगर इन वरिष्तम नेताओं के बाद की पीढ़ी में गठबंधन को लेकर पहले जैसा सम्मान नहीं रह गया था।
सवाल – क्यों राजनाथ सिंह का यह दूसरा कार्यकाल है और वे तो इन सीमाओ की मर्यादा को जानते है ?
जवाब-  राजनाथ जी भले ही वहीं है, पर भाजपा ही पूरी तरह बदल गयी है। एक समय दिवगंत श्रीमती इंदिरा गांधी को अपने आप पर इतना घमंड़ हो गया था कि खुद अपने आप को ही इंदिरा इज इंड़िया मानने लगी थी।.इंदिरा इज इंड़िया और कांग्रेस का फल तो आपलोगो ने 1975 के बाद देख ही लिया। यही हाल आजकल भाजपा की हो गयी है।, अटल जी और आड़वणी की जोड़ी से भाजपा एक अलग दिशा में चलती थी, मगर आज बीजेपी मोदी की हो गयी है।  मोदी इज बीजेपी या बीजेपी इज मोदी के इस आधुनिक  संस्करण को कम से कम जेड़ीयू तो बर्दाश्त नहीं कर सकती है। , लिहाजा हमें एनड़ीएक को और बदतर या बदनाम होने से ज्यादा जरूरी यह लगा कि इसको अब तोड़ दिया जाए या इसका साथ छोड़ दिया जाए।
सवाल— एनडीए से अलग होने के बाद आपलोंगों की भावी योजना और रणनीति पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
सवाल--  इस पर चिंतन और मंथन हो रहा। सही मायने में देखे तो एनडीए छोड़कर तो हमलोग सड़क पर आ गए है। छत से बाहर निकलने पर तो आशियाना बनाने की नौबत और जरूरत आ पड़ी है।.इस दौर में अपने आप को सुरक्षित रखने की बीजेपी से ज्यादा जरूरत और खतरा तो हमलोंगों के साथ है।
सवाल – इतनी बुरी हालत भी नहीं है त्यागी जी  एक तरफ राहुल गांधी का नीतिश प्रेम जगजाहिर हो चुका है ?
जवाब— (मुस्कुराते हुए) देखिए जब कोई एक जवान लड़की सड़क पर आकर खड़ी हो जाती है, तो उसके पीछे लाईन मारने वालों की फौज लग जाती है। जेड़ीयू के सामने कई ऑफर है, मगर हमें यह तो सोचने का मौका और अधिकार है कि कौन सा बंधन हमारे लिए सबसे भरोसेमंद रहेगा।
सवाल – अच्छा, इसीलिए पूरे ताव के साथ एनडीए को छोड़ भी दिया और गरिया भी रहे है ?
जवाब--  नहीं एकदम नही। आपके आरोप में कोई सत्यता नहीं है। .यह एक दिन का फैसला नहीं था, और ना ही रोज रोज इस तरह के गठबंधन बनते हैं। एनडीए के संयोजक भी शरद यादव जी थे, लिहाजा अपनी पकड़ और प्रभाव भी था,। मैंने पहले भी जिक्र किया था कि अटल और आड़वणी के रहते कभी भी दिक्कत नहीं हुई। 2002 में गुजरात दंगों के बाद एनडीए में तनाव हुआ था, मगर अटल जी ने पूरे मामले को संभाला और काफी हद तक मामले को शांत भी कर दिया। मोदी का प्रसंग सामने आकर भी  मंच से बाहर हो गया। उस समय गठबंधन के अनुसार हमलोग भी इसे  एक राज्य का मामला मान कर छोड़ देना पड़ा। मगर 2011 से ही मोदी प्रकरण उभरने लगा और देखते ही देखते मोदी सब पर भारी होते चले गए। बार बार कहने पर भी मामले को साफ नहीं किया गया, जिससे मोदी को लेकर एनडीए में विवाद हुआ।
सवाल—  यह तो एकदम सच हो गया कि मोदी के चलते ही यह अलगाव हुआ है ?
जवाब – नहीं इस बात में पूरी सत्यता नहीं है। मोदी एक मुद्दा रह है। हमारे बार बार कहने के बाद भी पीएम को लेकर उनकी दुविधा से जनता के बीच भी भम्र बढ़ रहा था। आड़वाणी द्वारा बेबसी जाहिर करने या गतिविधियों को लेकर बीजेपी की उपेक्षा के चलते ही एनडीए में पहले वाली सहजता नहीं रह गयी थी। कई बड़े नेताएं की उदासीनता से संवाद खत्म हो गया था। बीजेपी के नये चेहरो में भी इसको लेकर उत्सुकता नहीं थी, जिसके चलते हमलोगों को एनड़ीए से बाहर होना पड़ा। और हमलोंगो को इसका कोई मलाल भी नहीं है।
सवाल – 2013 में होने वाले कई राज्यों में विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव को आप किस तरह देख और आंक रहे है ?  
जवाब – इन चुनावों को लेकर अभी कोई रणनीति नहीं बनी है।  हम 2013 विधानसभा के परिणाम को देखकर ही अपनी तैयारी और कार्यक्रमों को अंतिम रुप देंगे। 100 से भी कम लोकसभा सीटों पर हमारे प्रत्याशी होंगे, लिहाजा सबों को समय पर मैनेज कर लिया जाएगा।
सवाल – भाजपा के साथ मिलने पर बिहार में जेड़ीयू एक पावर थी, मगर साथ खत्म होने पर आज दोनों कुछ नहीं है। क्या 2015 में होने वाले विधानसभा चुनाव में लालू यादव और रामविलास  पासवान समेत बीजेपी से टकराना क्या जेडीयू के लिए नुकसानदेह हो सकता है ?
जवाब – हो सकता है। इन  तमाम खतरों के बाद भी केवल अपने लाभ या स्वार्थ के लिए घटक में बने रहना हमें गवारा नहीं था। बिहार में 2015 के चुनावी परिणाम कुछ भी हो सकते है। हमें नुकसान भी हो सकता है, इसके बावजूद मोदी के बीजेपी में रहना जेडीयू को गवारा नहीं है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह से व्यक्तिगत संबंध अलग है मगर पार्टी के संबंधों की एक लक्ष्मण रेखा होती है। फिर अध्यक्ष होकर भी राजनाथ बेबस है। आप देख रहे हैं कि आज हालत यह है कि जो मोदी का जाप करेगा, वही बीजेपी में रहेगा। 1996
सवाल – यानी जेडीयू को लगा कि मोदी से मामला संतुलित नहीं हो पा रहा था ?
जवाब –  गुजरात में मोदी को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी, मगर एक विवादास्पद आदमी को एक राज्य में तो सहन किया जा सकता है, मगर एकदम नेशनल हीरो की तरह पेश करने के मामले में जेडीयू बीजेपी के साथ कभी नहीं है।
सवाल – तो क्या मान लिया जाए कि देश में अब विपक्ष की भूमिका समाप्त सी हो चली है ?
.जवाब --  जी नहीं विरोध और खासकर लोकतंत्र में विपक्ष और विरोध कभी खत्म नहीं हो सकता। लोकतंत्र में विरोध और विपक्ष संजीवनी की तरह है, लिहाजा यह तो एक राजनैतिक परम्परा है और यह खत्म नहीं हो सकती। 1969-70 में दीन दयील उपाध्याय और तमाम गैरकांग्रेसी नेताओं ने पूरे देश में इस तरह की हवा बनायी कि देश के करीब 10 राज्यों में गैरकांग्रेसी दलों की सरकार बनी  थी। लिहाजा विपक्ष की भूमिका कब एकाकएक मुख्य हो जाए यह कहना आसान नहीं है।


सवाल --  शायद अब फिर इस तरह का मुहिम ना हो ?
जवाब –  राजनीति में इस तरह का कोई दावा करना बेकार है।
सवाल --   बीजेपी द्वार नरेन्द्र मोदी को फोकस करने के बाद पूरा विपक्ष जिस तरह मोदी के खिलाफ हमलावर होकर पीछे पड़ गयी है, , विरोध के इस शैली को किस तरह देख रहे है ?
जवाब – मोदी का जिस तरह विरोध हो रहा है, मैं उसको एक स्वस्थ्य परम्परा नहीं मान रहा हूं।  चारो तरफ मोदी विरोध की धूम है। मोदी पर इस तरह कांग्रेस हमलावर हो गयी है कि जबरन विवाद  के लिए विवाद हो रहा है। इससे मैं काफी आहत और चकित भी हूं कि एकाएक यह क्या हो रहा है। इसके कई खतरे है। हो सकता है कि जनमानस में मोदी को लेकर इस तरह की इमेज भी बने कि मोदी के बहाने बीजेपी को भी लोग नकार दे और काफी नुकसान हो सकता है , मगर इसका उल्टा असर भी हो सकता है। विरोध करने वाले तमाम नेता जनता की कसौटी पर परखे गए है, मगर नेशनल स्तर पर मोदी एक नया फेस है। विरोध को देखते हुए यह भी मुमकिन है कि बाकी दलों को भारी नुकसान झेलना पड़े और जनता मोदी सहित बीजेपी की नैय्या पार लगा दे। कांग्रेस समेत सभी दलों को इस खतरे पर गौर करना होगा।   
सवाल --  और क्या क्या खतरे है ?
जवाब --   कांग्रेस को भी मोदी विरोध को और हवा देने में मजा आ रहा है, क्योंकि मोदी का हौव्वा इतना बड़ा बन गया है कि पीएम मनमोहन सिंह के 10 साला कुशासन पर कहीं कोई चर्चा नहीं है। करप्शन से बेहाल कांग्रेस की सारी असफलता छिप गयी है। यूपीए के कुशासन और देश बेचने की साजिश का मुद्दा ही गौण हो गया है। मंहगाई मुद्दे को लेकर कहीं कोई धरना प्रदर्शन नहीं हो रहा है। देश बंद करने की बात ही छोड़ दीजिए। जनहित के तमाम मुद्दों पर किसी का ध्यान नहीं है। कांग्रेस की इससे पहले कोई भी इतनी खराब लाचार बेबस और दिशाहीन जनविरोधी सरकार नहीं बनी थी। मोदी को मुद्दा बनाकर यूपीए सत्ता में फिर आने का रास्ता बना रही है।
सवाल –  आपलोग भी तो यूपीए के बैंड बाजा बाराती के संग जुड़ने के लिए अपनी बारी देख रहे है ?  राहुल गांधी तो सालों से नीतिश कुमार पर लाईन दे रहे है ?
जवाब --  नहीं इस मामले में अभी कुछ भी नहीं कह सकते। नीतिश को पसंद करने का मतलब केवल व्यक्तिगत माना जा सकता है।
सवाल – नीतिश कुमार पीएम के एक साईलेंट प्रत्याशी की तरह है, जो खुद को खुलकर ना पेश कर पा रहे हैं, ना ही किसी और को बर्दाश्त कर पा रहे है  ?  
जवाब –  एकदम नहीं ,नीतिश जी बार बार और हर बार इसका खंड़न करते आ रहे है, और मात्र 30-32 सांसद के बूते पीएम बनने का सपना देखना भी उनके लिए संभव नहीं है। वे लगातार कहते रहे हैं और मैं फिर आज कहना चाहूंगा कि इस तरह की बातें करने वाले लोग और नेता जेडीय के सबसे बड़े दुश्मन है।, जिससे सावधान रहने की जरूरत है। नीतिश जी बिहार को लाईन पर लाने के मिशन में लगे हैं और यहीं उनका मकसद है, बस्स।
सवाल --   कमाल है  माना तो यह जा रहा है कि मंत्रीमंडल के विस्तार में आप सहित कई लोग मनमोहन के सहयोगी बनने जा रहे है ?
जवाब --  ( मुस्कुराते हुए) हमें तो पत्ता नहीं है , मगर जब आपको कोई जानकारी मिले तो हमें भी सूचना दे दीजिएगा।।







26 टिप्‍पणियां:

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