बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

कृषि कानून, लोकहित और ठंडा बस्ता! / ऋषभदेव शर्मा

कृषि कानून, लोकहित और ठंडा बस्ता! / ऋषभदेव शर्मा 


राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चली लंबी बहस का उत्तर देते हुए राज्य सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान, किसान आंदोलन और किसान कानून पर खुल कर और जम कर अपनी सरकार का पक्ष रखा। जिस बात की ओर कृषि मंत्री कई बार इशारा कर चुके थे, प्रधानमंत्री ने उसका और खुलासा किया। सरकार का मानना है कि किसान आंदोलनकारियों से 11 दौर की बातचीत से लेकर संसद में हुई बहस तक में कोई भी उसे यह नहीं बता सका है कि आखिर विवादित कृषि कानूनों में खराबी क्या-क्या है। लगता है, सरकार ने मन बना लिया है कि वह इस बात को बार बार दोहराएगी, ताकि सुनने वाले मान लें कि ये कानून स्वतःपरिपूर्ण हैं और इनका विरोध तथ्यों पर आधारित नहीं, बल्कि राजनीति से प्रेरित है। 


इस तरह चर्चा को कानूनों से हटा कर उन्हें लाने या पास कराने की प्रक्रिया और उसमें बरती गई हड़बड़ी पर केंद्रित करके सरकार शायद अपनी जवाबदेही को किसानों और विपक्ष के जिम्मे मढ़ने की चतुराई कर रही है। यह सबको साफ दिख रहा है। फिर भी अगर कोई केवल यह कह कर कानूनों को खारिज करना चाहे कि इनमें तो सभी कुछ काला है और कथित कालिख का हिसाब न दे, तो मजबूरन मानना ही पड़ेगा कि सारा विरोध केवल प्रक्रिया को लेकर है, कानूनों को लेकर नहीं। शायद ऐसा है नहीं; लेकिन सरकार इस सारे प्रकरण की यही व्याख्या समझाने पर कटिबद्ध दिखाई दे रही है। वैसे यहाँ यह भी पूछा जा सकता है कि इतने बड़े बदलाव के लिए बरती गई हड़बड़ी को क्या उचित तथा लोकतांत्रिक माना जाना चाहिए। अगर हड़बड़ी न बरती गई होती तो क्या ये विरोध प्रदर्शन वगैरह न हो रहे होते? शायद इनकी नौबत ही न आती, क्योंकि तब प्रक्रिया के तंत्र में ही तीनों कानून फँसे रह जा सकते थे!  सवाल यह भी है कि क्या ऐसे कानूनों को लाने की प्रक्रिया इतनी यथास्थितिवादी है कि कोई प्रचंड बहुमत वाली सरकार भी उसके आगे निष्क्रिय बैठने के लिए मजबूर हो जाए! शायद यही वजह रही कि कृषि सुधार के लिए संकल्पित होते हुए भी इससे पहले किसी सरकार ने इस मधुमक्खियों के छत्ते को हाथ नहीं लगाया। वर्तमान सरकार ने यह 'दुस्साहस' किया है, तो रसभोगी मधुमक्खियों का क्रोध भी तो झेलना पड़ेगा न?


बदलाव और यथास्थितिवाद का यह रगड़ा झगड़ा अभी शायद और लंबा चलेगा। क्योंकि सरकार कानूनों को रद्द नहीं करेगी, यह उसने अलग अलग अवसरों पर स्पष्ट कर दिया है। दूसरी ओर आंदोलनकारी लोग इसी एक माँग पर अड़े हैं। उन्हें बीच का रास्ता नहीं चाहिए। जबकि लोकतंत्र तो बीच के रास्ते अर्थात समझौते से ही चलता है। यही वजह है कि बहुत बार ऐसा लगता है कि चिर प्रतीक्षित कृषि सुधार ऐतिहासिक होते हुए भी यथास्थितिवाद की भेंट चढ़ जाने के लिए अभिशप्त हैं। क्योंकि तर्क यहाँ तक पहुँच चुके हैं कि आप जिस मरणासन्न प्राणी को संजीवनी पिलाने पर आमादा हैं, वह आपसे किसी तरह का इलाज चाहता ही नहीं! वह तो रोगशय्या पर रहने को ही आनंद मान रहा है!  भला आप जबरदस्ती इलाज क्यों कर रहे हैं? यानी, जो जहाँ जैसा है, उसे वैसा रहने दो! तुम्हारा बदलाव हमें नहीं चाहिए। दो गुनी क्या आमदनी तो चार गुनी चाहिए, लेकिन तुम्हारे ये सुधार नहीं चाहिए! 


इसे ही कहते हैं 'जन अच्छा' और 'जन इच्छा' का द्वंद्व। मोदी सरकार और उसके कृषि कानून इसी द्वंद्व में फँस गए हैं। सरकार को तो लोकप्रियता के शिखर पर विराजमान प्रधानमंत्री कुछ नहीं होने देंगे। लेकिन इन कानूनों को यथास्थिति के  ठंडे बस्ते में फ्रीज होने से वे शायद ही बचा सकें! बचा सकें तो लोकतंत्र का भला होगा।  000

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