मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

वसंत में टीस / आलोक कुमार

 

वसंत उत्सव है। सूरज चढा है। उपवन उल्लसित। चारों ओर हरा ही हरा है। ठिठुरन से मुक्ति मिली। मौसम खिला है। धरा गिली और ललहाते फसल से खेत सजे हैं.


वसंत पंचमी  है। पूरब के घर मोहल्लों में धूम है।  मां सरस्वती की सार्वजनिक पूजानोत्सव का जोश है। बच्चे मूर्ति स्थापना में लगे है। लड़कियां पहली बार साड़ी पहनी हैं। सुंदरता बोध पर इतरा रही हैं। कल विसर्जन है। 


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वसंत में बिछोह की टीस

 

                           -आलोक कुमार


याद बेतिया की। मोहल्ला बानू छापर। वर्ष 1980। मौका वंसती पूजा। घर से बाएं लगा बगीचा। यानी कोला। वहां बगीचा को कोला कहते हैं। सामने लीची का बाग यानी लीचीयानी। उसके आगे महेश कका का तालाब। दाहिने सूर्यकांत का घर। घर का विशाल आंगन। उसके पीछे आम की गाछी। यही चौहद्दी थी।

लीची का बाग, हमारे खेल का मैदान था। वहां गोजी भांजते। गिल्ली-डंडा और क्रिकेट ज्यादा खेलते। संख्या नहीं जुटती, तो लीची के पेड़ों पर डोला पाती जमता। गिरना-पड़ना। हाथ-पैर टूटना-फूटना आम बात थी। ‘रिटायर्ड हर्ट’ हमारे बातचीत का पोपुलर टर्म था।

  बसंती के घर की दीवार से विकेट लगाता। तेज बॉलर बनने का अभ्यास जमता। करसन घावरी और कपिल देव सपने में आते। रिटायर्ड हर्ट हो जाने वाले बॉलर के लिए आप्शन था। चंद्रशेखर और प्रसन्ना बन स्पिन बॉल डालने का अभ्यास करते। एक के बदले दूसरे की फिल्डिंग करने-कराने का इमानदार रिवाज था। 

सनीचर को किसी ने किसी के बदले फिल्डिंग की थी,तो मंगल को उसके बदले वह फिल्डिंग कर कर्ज उतार सकता था। कई बार एक भाई को दूसरे भाई अथवा एक दोस्त को दूसरे दोस्त का कर्ज उतारने का मौका मिलता।


वेस्ट इंडीज का पता  नहीं मालूम था पर हम कालीचरण, माइकल होल्डिंग और सिल्वेस्टर क्लार्क के जिक्र में डूबे रहते। माधव और हीरा खेल भंगठाने में माहिर था। उसे  आने नहीं देते। आ जाता तो बैट-बिकेट लेकर सरक लेते थे। एलू भैया हंसी के पात्र थे। डब्ल्यू- बब्लू की जगह बसंती, भपलेटर, ठेबर, नेवल, अंखमुन्ना गरई आदि टीम मेंम्बरान के उपनाम थे। 

मोहल्ले में किराएदार औऱ मालिक के बच्चों की अलग टीम थी। आपस में मैच होता। कुछ मकान मालिक बच्चे किराएदार की टीम में रहना ज्यादा पसंद करते। विकेट पर जो टिक जाता। खेल के बाद ज्यादा तनकर चलता। उसे गावस्कर और विश्वनाथ की जोड़ी के तमगे से नवाजा जाता।

वसंत आया। कोला में सरसो बाग था। घर पर चटक पीले रंग का पोचारा पहले से था। घर और बगीचा प्रकृति के रंग से एकाकार हो गया।


कोला और तालाब में गेंद मारने पर बैट्समैन स्वत: आउट हो जाते । गेंद को कोला से लाने के लिए कई तरह की मिन्नतें करनी पड़ती। चक्कर घिन्नी की तरह दिमाग चलाया जाता। अंधियारी रात में कोला में घुसकर बॉल की तलाश होती। ढूढ लाने वाले को वीरता का श्रेय मिलता।


 महेश कका के तलाब में गए ड्यूज बॉल को ढूढना बेकार था। मारकर तालाब में गेंद पहुंचाने वाला आउट तो होता ही उसे नए गेंद की कीमत डगनी पड़ती। तालाब में गया रबड़ बॉल को सुरर्रा ढेला की प्रैक्टिस से किनारे लगा लिया जाता। 


कोला से लगा था, बाहर का गोलाकार कमरा। मेहमान  आकर उसमें रमते। हमारी टीम ने उस कमरे में सरस्वती पूजा करने की ठानी। बड़ों को बिना बताए आपस में पैसा जुटाया। चंदे की रसीद खरीद लाए। पूजा को वृहत करने के लिए जिम्मेदार टोलियां बनी। चंदे के लिए चोरी से निकल पड़े। भेद खुलने में देर नहीं लगी।


चंदा उगाही का संगीन मामला दावानल की तरह घर तक  पहुंच गया। ज्यादातर की जमकर सेकाईं और कुटाई हुई। जिनके घर सेकाई का प्रावधान नहीं था। उन्हें क्विंटल के भाव से ताने मिले। तुलनात्मक हिसाब व्यवहारिक ज्ञान का लेक्चर सबको थोकभाव से सुनना पड़ा। ताना आज तक याद है। जितना दिमाग पूजा की प्लानिंग में धुसाए, उसका आधा-चौथाई भी पढने में लगाते, तो किलास में टॉप आ जाते। पढ लेते तो सरस्वती माता कल्याण कर देती।


 पोल खुलने का नुकसान तो एक भी फायदा हुआ। पूजा की जिम्मेदारी बच्चों के हाथों से निकलकर अभिभावकों की सिरदर्दी बन गई। हालांकि हमने सीख ली। चंदा लेना न सिर्फ कठिन बल्कि बुरी बला है। आगे से तौबा। कबीर बाबा सच ही कह गए हैं, तेती पांव पसारिए, जेती लांबी सौर। 


मर्यादा के लिहाज से मांगा चंदा लौटाया नहीं जा सकता था। लिहाजा सार्वजनिक पूजा करने की छूट मिल गई। प्रबंधन की बागडोर फिर बच्चों के हाथ आ गया। मोल मोलाई का क्रम चला। सस्ते में सुंदर से सुंदरतम मूर्ति के पहचान शुरु हुई। बाजार के चक्कर लगने लगे। मूर्तिकारों को प्रभावित करने में सबने दिमाग लगाया। चौथे चरण मे मामला फाइनल हुआ। एडवांस लेने वाले मूर्तिकार की निगरानी का जिम्मा घुमक्कड़ों ने उठा लिया। मूर्ति कितना तैयार हुआ। इसकी रिपोर्ट दैनंदिनी में शामिल हो गया। प्रसाद के लिए बुंदिए और फल की मार्केटिंग हुई। 

सब मिलकर पूजा को चर्चित बनाने की कोशिश में लग गए। बच्चा पार्टी रातोंरात जिम्मेदार हो गया। इससे पहले पंद्रह अगस्त और 26 जनवरी में हमने झंडोतोलन का उत्सव मनाया था। उस अनुभव की पूंजी साथ थी। पूजे की दिन से पहले रतजगा हुआ। देर रात गार्जियन की पहुंच से बाहर रहने की वह पहली आउटिंग थी। शाम ढलने के साथ ठेले पर मूर्ति लेकर घर पहुंचा। बाकी ने कमरे को सजाने का काम लगभग पूरा कर दिया था। सुबह बंटने वाले प्रसाद के फल कटे। सुबह बुंदिया आया। मां ने प्रसाद बनाया। पंडित जी को घेरकर तय मुहुर्त पर ले आया गया। घड़ी घंटाल बजा। आरती हुई। धूमधाम से पूजा हुई। 

विहंगम मूर्ति। अद्भूत सजावट। शानदार पूजा की तारीफ से हम बच्चे वासंती हुए जा रहे थे। जोश में शाम का सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। बैक टू बैक सब व्यस्त रहे। संध्या आरती हुई। पूजा की रात जगकर सब मूर्ति की रक्षा में लगे रहे। अगले दिन मुश्किल सामने आया। तकलीफ सालने लगा। विसर्जन की घड़ी थी। सोचकर मन खट्टा होना शुरु हुआ। फिर भी विसर्जन भव्य करना है। इस इंतजाम में गम को पीते रहे। खबर लगी कि गांव की बड़ी पूजा के आयोजक मूर्ति विसर्जन के लिए गंडकी धार ले जाने की तैयारी में है।

 संसाधन नहीं था। हम गुमसुम थे। महेश कका के तालाब में विसर्जन करना था। मनमसोसने को हम तैयार न हुए। पहल की। भाग्य जागे। जुगाड़ लग गया। बड़ो ने मिन्नत सुन ली। हमारी मूर्ति को साथ ले जाने को वो राजी हुए। उनकी ट्रक पर छोटी सी जगह मिली। यह बात साजिशन गार्जियन से छिपाई गई। गुपचुप मूर्ति लेकर हम उनकी ट्रक पर सवार हो गए। 

धूम घड़ाके से विसर्जन की बारात निकली। लाउड स्पीकर बजता रहा। अबीर गुलाल उडे। वसंत धरा पर उतर आई।  उल्लास से भरे नाचते गाते गांव से निकले। माहौल बेहद खुश, लेकिन हम अंदर से टूटे हुए थे। विसर्जन की सोच अंदर से शोकाकुल। आंखों में नमी लिए सफर भर मूर्ति के साथ चिपके रहे। मार्मिक घड़ी आई। भरे मन से रीत निभाई। सरस्वती माता की जयकारे भरे। हौले से ट्रक से मूर्ति उतारी। विनम्रता से भरे रहे। 

 मामला इतने तक सीमित नहीं रहा। अगली चुनौती मुंह बाए खड़ी थी। हमारे पास नाव से बीच धार तक मूर्ति ले जाने के पैसे नहीं थे। मां ने शंकर को विसर्जन के लिए साथ भेजा था। उसने कर्ज ऑफर किया। टूटे मन से हम मान गए। नाव वाले को तैयार किया। पर अचानक साथ आए गांव के बड़ों में जिम्मेदारी बोध जाग गया। वो आड़े आ गए। बच्चों को मूर्ति लेकर अलग से बीच मझधार में जाने देने का विरोध करने लगे। हमें डराया। सुनाया गया कि हर बार विसर्जन में नाव पलटता है। डूबने की घटना होती हैं। बाद में शर्त पर माने I  सिर्फ तैरना जानने वाले बच्चे ही नाव पर जाने की इजाजत दी। मुझे तैरना नहीं आता। शंकर को आता था। उसने इशारे से मेरी झूठी गवाही दी कि मैं अच्छा तैराक हूं।


दोपहर ढल रहा था I नाव पर मूर्ति को हिचकोले में सम्हालना नई चुनौती थी। खुद के डूबने का भय मूर्ति विसर्जन गम के आगे काफूर था। साथ में सिसकियां थी। आंखों में आंसू का सैलाव। मूर्ति को आखिरी प्रणाम किया। धीरे धीरे मूर्ति विसर्जित हो गई। मन रिक्तता से भर गया। बस गाता रहा। वर दे, वीणा वादिनी वर दे। विछोह की उस टीस पर बसंत का मरहम आजतक बेअसर है।

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