गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

. ०आज़मगढ़ में तैयार हुआ था अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मसौदा / मुहम्मद अख्तर

चिरैयाकोट को कुल हिन्द का यूनान कहा जाता था .. 

आज़मगढ़ में तैयार हुआ था अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मसौदा

० आजमगढ़ एक खोज.. 

क्या आप जानते हैं कि अलीगढ  मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मसौदा अविभाजित आजमगढ़ के चिरैयाकोट में तैयार हुआ .....

चिरैयाकोट को कुल हिन्द का यूनान कहते हैं 

यहाँ के आलिमों को फख्र ए हिंदुस्तान कहते हैं .

मुहमद अख्तर /

मलिक सुल्तान अहमद दाग चिरैयाकोटी ने यह शेर यूंही नहीं लिखे ,बल्कि इसके पीछे की हकीकत से आपको रूबरू कराते चलें .उत्तरप्रदेश के पूर्वी खित्ते के आजमगढ़ जनपद के  चिरैयाकोट कस्बा (वर्त्तमान में मऊ जनपद का हिस्सा ) का इल्म के क्षेत्र में इतिहास यह रहा है कि ,यहाँ से 15 वी शताब्दी से लेकर 20वी सदी के मध्य तक एक से बढ़कर एक विद्वान लगातार अपनी विद्वता की चमक से इस क्षेत्र को मुनौवर करते रहे .लकिन आज की तारीख में इस क्षेत्र के लोग भी बहोत कम अपनी मिटटी के शानदार इतिहास से परिचित हैं .यह एक अभिशाप से कम नहीं है क्योकि जो लोग अपने इतिहास को भूल जाते हैं ,वे अपने भविष्य को अन्धकार के आगोश में धकेल देते हैं .

इसी क्रम में आपको यह बतलाते चलें कि आजमगढ़ आज अल्लामा शिबली नोमानी के आँगन के तौर पर जाना पहचाना जाता है .अल्लामा का अर्थ होता है विद्वान या महापंडित .आपको बतला दें कि शिब्ली को तराशकर इल्मी जगत का नायाब रत्न बनाने वाले का नाम था ,मौलाना फरूक चिरैयाकोटी . शिब्ली इन्ही के सानिध्य में दीक्षित होकर अपने वैचारिक स्तर को इतनी बुलंदी तक ले गए कि आज उनके नाम की अजमत हिन्द से लेकर दुनिया के अन्य कई देशों में अपना परचम लहरा रही है .अल्लामा ने लिखा है कि ,"मेरी कूल इल्मी कायनात मौलाना फारूक च्निरैयाकोटी साहब के इस्तेफादे है ,यदि इनका योगदान मेरी शिक्षा से निकाल दिया जाए तो मेरे पास कुछ नहीं बचता ."

आपको यह भी जानकारी देते चलें कि मौलाना फारूक के भाई मौलाना इनायत रसूल चिरियाकोटी व सर सय्यद अहमद खां समकालीन थे .इनायत रसूल साहब 22 भाषाओं के प्रखंड विद्वान थे .सर सय्यद सन 1862 में गाज़ीपुर ज़िले में बतौर न्यायाधीश नियुक्त थे .गाज़ीपुर का एक इल्मी इदारा जो पूर्वांचल के सबसे प्राचीन इदारो में से एक है ,नाम है "चशम ए रहमत "में वैचारिक महफ़िलों में इनायत साहब का जाना आना लगा रहता था .इसी दौरान सर सय्यद का सम्पर्क इनायत साहब से हुआ .सर सय्यद ,इनायत साहब के विद्वता पर मंत्र मुग्ध हो गए ,और दोनों के बीच मुलाक़ात संवाद का सिलसिला शुरू हो गया .इनायत रसूल ने सर सय्यद से कहा कि एक ऐसे शैक्षणिक संस्थान की आधारशीला रखे जाने की आवश्यकता है जो हिंदुस्तान में शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करे .सर सय्यद का इसी दौरान स्थानांतरण अलीगढ हो गया बवाजूद इसके दोनों में पत्र व्यवहार आदि से संवाद जरी रहा और सन 1875 में अलीगढ में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की संग ए बुनियाद पड़ी .

इसी कड़ी में आप यह भी जान लें कि अलीगढ यूनिवर्सिटी से पहला स्नातक परीक्षा पास करने वाले बैच में सबसे शीर्ष पर जो छात्र था उसका ताल्लुक भी चिरैयाकोट से था और वह मौलाना इनायत का सबसे ज़हीन शिष्य था ,नाम था ,"मौलाना अबुल फज़ल एह्नसानुल्लाह चिरैयाकोटी ",जो बाद में गोरखपुर चले गए .

आपको यह भी बतलाते चलें कि मौलाना इनायत रसूल चिरैयाकोटी की एक कृति है "बुशरा "जिसमे उन्होंने चारो वेद ,बाइबिल ,इंजील और तौरात के उन टेक्स्ट को कोट कर के तर्जुमा किया है जो पैग़म्बर ए इस्लाम जनाब ए मुहम्मद स० के बारे में जानकारी देते हैं .ऐसी कृति पिछले 700 सालों के इतिहास में किसी के द्वारा नहीं की गई .

इस तरह से चिरैयाकोट ने इल्म की दुनिया को अपनी धरती से ऐसे ऐसे नायाब तोहफे बख्शे जिनके योगदान शिक्षा व साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय हैं .आज के चिरैयाकोट के वैचारिक भूगोल को उसके शानदार इतिहास से तुलना करे तो यह प्रतीत ही नहीं होता कि यह वही कस्बा है जहाँ से ज्ञान की गंगा बहती थी .

[.साभार.....मुहम्मद अख्तर .... पत्रकार ]

(मौलाना अफरोज क़ादरी चिरैयाकोटी, जो साउथ अफ्रीका के डैलास यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं ,से बातचीत से मिली जानकारी पर आधारित).

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