शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

भारत यायावर ने रेणु साहित्य को नयी पहचान दी हैँ

 सतत विरोध झेल कर भी सदैव गतिशील रहे रेणु : यायावर / विजय केसरी

प्रख्यात साहित्यकार कवि, संपादक, आलोचक भारत यायावर ने महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के संपूर्ण लेखकीय जीवन को आधार बनाकर लेखकों के संदर्भ में एक बड़ी बात कहने की कोशिश की है। उन्होंने दर्ज किया है कि 'रेणु की जीवनी का सबसे प्रेरक तत्व यह है कि कैसे एक लेखक पद और लिप्सा से विरत रहकर रत रहता है और नित नूतन संधान में लगा रहता है। लेखक भौतिक उपलब्धियों को ठुकरा कर रचनाशीलता को ही अपना जीवन सौंप देता है और सतत विरोध झेल कर भी गतिशील रहता है।" उपरोक्त दो वाक्यों के माध्यम से भारत यायावर ने यह बताने की कोशिश की हैं कि एक लेखक सतत विरोध झेल कर भी गतिशील रहता है। लेखक कोई बाहर के व्यक्ति नहीं होता है बल्कि हमारे ही आसपास रहता है। वह हमारे दैनंदिन जीवन के सुख - दुख को ही आधार बनाकर अपनी कहानियों और कविताओं में बातों को दर्ज करता है। वह हमारे रहन -सहन, भाषा, रीति - रिवाज, संस्कृति  को गहराई से अध्ययन कर कुछ ऐसा रच डालता हैं, जिसे हम सब उनकी कृति  को पढ़े बिना नहीं रह पाते हैं। उनकी कृति में गहरी अर्थवत्ता छुपी रहती है। गहरा संदेश होता है। उनकी कृति समाज को संघर्ष करने की एक नई ऊर्जा प्रदान करती है।

 एक लेखक के गहरे अनुसंधान के बाद रचना के रूप में चंद पंक्तियां उत्पन्न होती हैं। यही कारण है कि इन पंक्तियों की गूंज सदियों तक बनी रहती हैं। यह तभी संभव हो पाता है, जब लेखक पूरी तन्मयता के साथ अपनी साधना में रत होता है।  इस संदर्भ में यह विचार करना  जरूरी हो जाता है कि एक लेखक और आम आदमी में क्या फर्क है ? उदाहरण स्वरूप एक दृश्य को सभी लोग देखते जरूर हैं, लेकिन उसी दृश्य को  एक लेखक  अपने वैचारिक दृष्टिकोण से देखता है। वह उस पर गंभीरता से विचार करता है।  उस दृश्य के कारणों तक जाता है। उस दृश्य के मर्म,  पीड़ा व संवेदना को समझने की कोशिश करता है। तब वह लेखक कुछ पंक्तियों में अपनी बातों को प्रस्तुत कर पाता है। वह दृश्य उस लेखक को वैचारिक रूप से झकझोर कर रख देता है। उस लेखक के मन में कई तरह की बातें उठती हैं। वह गहन शोध में रत हो जाता है । यही भूमिका उसे आम आदमी से अलग करता है। आम आदमी के लिए वह दृश्य एक सामान्य घटना के समान होती है।

  भारत यायावर  ने रेणु के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि कैसे एक लेखक पद और लिप्सा से विरत रहकर अपनी लेखकीय साधना में रत रहता है। अगर लेखक पद और धन की लिप्सा में दौड़ना प्रारंभ कर देता है, तब वह अपने लेखकीय साधना से विरत हो जाता है।  ऐसी परिस्थिति में वह चाह कर भी महत्वपूर्ण रचनाओं को उत्पन्न नहीं कर पाता है। एक लेखक की रचना समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण है ? यह बड़ा सवाल है। कई लेखक गण निरंतर लिख रहे हैं। लेकिन उनकी रचनाएं  समाज में कोई असर पैदा कर नहीं पा रही हैं । ऐसा क्यों ? इस सवाल पर समाज के बुद्धिजीवियों को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

   उसी लेखक की रचना महत्वपूर्ण होती है, जो समाज को एक नई दिशा व रौशनी प्रदान कर सके। महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु का संपूर्ण जीवन हिंदी साहित्य की साधना में बीता था।  अगर रेणु चाहते तो कई सरकारी पदों पर विराजमान हो सकते थे।  उनकी प्रसिद्धि देश और देश के बाहर तक  फैली हुई थी। वे धन का अंबार लगा सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया था। उन्होंने  कलम की साधना को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। वे  जीवन के अंतिम क्षणों तक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते ही रहे थे। वे नित  नूतन संधान में रत होते थे। तभी उनकी रचनाएं कालजई बन पाई।

    आज की बदली परिस्थिति में अधिकांश लोगों एवं  लेखकों की  पद प्राप्ति और कई पीढ़ियों के लिए धन संग्रह करने की लालसा ने समाज का रूप ही बदल कर रख दिया है। क्या पद, धन और विलासिता  के बीच  कोई  लेखक अपनी लेखकीय संवेदना को बनाए रख सकता है ? यह यक्ष प्रश्न है। धन के पीछे भागने वाला लेखक क्या धन के अभाव को समझ सकता है ? क्या  पद पर आसीन वह लेखक गरीब, असहाय, मजबूर, बेसहारा दलित लोगों की पीड़ा को महसूस कर सकता है ? क्या विलासिता का जीवन जीने वाला  लेखक समाज में घट रही घटनाओं पर निष्पक्ष होकर रचना कर्म कर सकता है ?

     भारत यायावर ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि एक लेखक का जीवन सिर्फ और सिर्फ साहित्य साधना में रत होना चाहिए । पद, धन और विलासिता का जीवन उनके स्वतंत्र विचार व संवेदना के पंखों को कतर कर रख देता है।  देश के महान कवि निराला जी ने इलाहाबाद एक मोड़ पर  तपती धूप में एक महिला को पत्थर को तोड़ते हुए देखा था । उसके बाद कुछ पंक्तियां उनकी कलम से पैदा होती है। यह पंक्तियां कालजई बन जाती है । यह उनकी सतत साधना का प्रतिफल था। आज भी उनकी पंक्तियां पढ़ी जाती है । उनकी पंक्तियों में  पसीने से लथपथ, पत्थर तोड़ती महिला की तस्वीर साफ उभर कर आ जाती है।

      फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियां  समय के साथ संवाद करती नजर आती है । उनकी कहानियों  जितनी बार भी पढ़ी जाती है ,  कुछ न कुछ नूतन विचार प्रकट होते रहते हैं।  कई नई बातें निरंतर उभरकर सामने आती है । यह इसलिए हो पाता है कि रेणु  पद और लिप्सा से पूरी तरह विरत होकर अपनी साहित्य साधना में रत थे ।   एक लेखक का जीवन कैसा होना चाहिए ? इस विषय पर यायावर ने बहुत ही मंथन के बाद यह दर्ज किया है कि एक लेखक को भौतिक उपलब्धियों से मुक्त होना चाहिए और रचनाशीलता को ही अपना जीवन सौंप देना चाहिए । तभी कुछ बातें उत्पन्न होती है। अगर  लेखक भौतिक उपलब्धियों को ही बटोरने में लगा रहेगा, तब वह चाह कर भी लेखकीय साधना से रत नहीं हो पाएगा। लेखक का जीवन सहज, सरल और संवेदना से भरी होनी चाहिए । 

      फणीश्वर नाथ रेणु की तमाम रचनाएं एक नई बात कहती नजर आती हैं। एक नया संदेश देता नजर आता है। उनका व्यक्तिगत जीवन बहुत ही सहज  और सरल था। उनका जीवन कभी भी भौतिक उपलब्धियों को प्राप्त करने में नहीं लगा ।   फणीश्वर नाथ रेणु अपना संपूर्ण जीवन रचनाशीलता को समर्पित कर दिया था। भारत यायावर आज के नए लेखकों को फणीश्वर नाथ रेणु के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि चंद रचनाएं लिख कर, छप कर कोई महान लेखक नहीं बन सकता है। उन्होंने साफ शब्दों में दर्ज किया है कि एक लेखक सतत विरोध झेल कर भी साहित्य साधना में रत रहता है। अब विचारणीय बात यह है कि आज के लेखक कितना विरोध झेल कर अपनी साधना में रत हैं ?  थोड़ी सी परेशानी आने पर कई भाग खड़े होते हैं । क्या रेणु  अपनी परेशानियों से कभी भागे ? अगर वे भाग खड़े होते तो उनकी रचनाएं समय से संवाद करती नजर नहीं आती। लेखक का जीवन निश्चित तौर पर सतत विरोध झेल कर भी रत रहने वाला होता है । तभी वह कुछ महत्वपूर्ण रच पाता है। आज की बदली परिस्थिति में जहां चंहुओर  लोग धन के पीछे भाग रहे हैं। पद के पीछे भाग रहे हैं । भाई भतीजावाद के पीछे भाग रहे हैं । समाज जाए भाड़ में । इन विषम परिस्थितियों में एक सच्चे लेखक का उत्पन्न होना भी अपने आप में बड़ी बात है । मैंने पूर्व में दर्ज किया है कि लेखक हमारे ही समाज के बीच के होते हैं । जब सब लोग धन और पद के पीछे भाग रहे हैं, तो कैसे कोई  खुद को इन विकृतियों से बचा पाएगा । इन्हीं  परिस्थितियों और लोगों के बीच एक सच्चा लेखक जन्म लेता है, जो भौतिक उपलब्धियों को ठुकरा कर रचनाशीलता को ही अपना जीवन सौंप देता है। वह लेखक सतत विरोध झेल कर भी वह  गतिशील रहता है।


विजय केसरी

(कथाकार / स्तंभकार),

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301

मोबाइल नंबर : 92347 99550,

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