मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

अखंड आजमगढ़ माटी के लाल आजमियो की तलाश

  शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूं,

जेहन में पर , गांव का  नक्शा रखा है ।


सुनील कुमार मल्ल                                                         

प्रस्तुति सुनील दत्ता कबीर ,


ताहिर अजीम के इस शेर का असर अखंड आजमगढ़ बेल्थरा रोड दोहरी घाट सड़क पर बेल्थरा से 11 किमी पश्चिम और मधुबन से 8 किमी पूर्व मर्यादपुर स्टेशन है । मार्यादपुर बस अड्डे से 2 किमी उत्तर एक , गांव है "लखनौर" के मल्ल परिवार में 28 जून 1966 को आसमान से एक चमकता सितारा , गांव में रौशन हुआ ।

घर के लोग उसे सुनील नाम दिए , ।


शिक्षा। प्राथमिक पाठशाला ,उरुवा बाजार गोरखपुर से पूरा किया उसके बाद श्री राम रेखा सिंह इन्टर कालेज उरुवा बाजार गोरखपुर से सीधी उड़ान 1984 में अाई अाई टी रुड़की से होते हुए 1988 में महामना द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में अाई अाई टी में प्रवेश लिया और शानदार सफलता अर्जित किया ।

इसके बाद 1992 में भारतीय राजस्व सेवा में सहायक आयुक्त पद पर कार्य करने लगे । 1994 से 2018 तक अहमदाबाद और बड़ौदा में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए 2019 में मुंबई में कस्टम आयुक्त के रूप में वर्तमान में कार्यरत है , महानगरों में रहते हुए भी सुनील मल्ल जी अपने गांव की सोधी महक उसके एहसास को खेत खलिहानों के उछल कूद को आज भी अपने जेहन में ताजा किए हुए है, आइए उनके इन एहसासों के साथ हम सब जुड़कर अपनी सोधि मिट्टी का एहसास करे ।

सलाम लखनौर


शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूँ,

जेहन में पर, गाँव का नक्शा रखा है |     

                 --- ताहिर अजीम


    गांव  की जमीन से सक्रिय सम्बन्ध खत्म हुए अब तीन दशक से ऊपर हो रहे हैं | पर आज भी रात में सोते समय शहर के घर की सूनी छत को निहारते हुए गाँव के उस फैले आसमान की याद आ जाती है जिसकी बदौलत सप्तर्षि मंडल और आकाशगंगा हमारी हर रात के हिस्से होते थे | अपने अनजान पडोसी के बगल से गुजरते हुए गांव का मंजर याद आता है जिसमें जिंदगी अपनेपन से सराबोर थी और जहाँ परायेपन का किसी को भान नहीं था |

    बेल्थरा रोड- दोहरीघाट सड़क पर बेल्थरा से 11 कि.मी. पश्चिम और मधुबन से 8 कि.मी. पूर्व मर्यादपुर स्टेशन है | मर्यादपुर बस स्टेशन से 2 कि.मी. उत्तर एक गांव है “लखनौर” | यही लखनौर गांव मेरे बचपन की यादों के केंद्र में अवस्थित है | इस गांव में अधिकतर ‘मल्ल’ परिवार हैं जो ‘विशेन’ वंशीय क्षत्रीय हैं | साथ ही ब्राह्मण, यादव , कोइरी, गोड़, बारी  और हरिजन परिवार भी हैं | गांव में एक मुस्लिम परिवार भी है |

 मध्युगीन भारत में “माध्यमिका” क्षेत्र पर मल्लों के पूर्वज राज करते थे और उनकी राजधानी ककराडीह थी जो मधुबन के पास ताल रतोय के किनारे है | सन 1193 में मुहम्मद गोरी के हाथों जयचंद की पराजय के बाद माध्यामिका क्षेत्र की सीमा मुहम्मद गोरी की सीमा से टकराने लगी | इस कारण सुरक्षा की दृष्टि से माध्यामिका क्षेत्र के तत्कालीन शासकों ने अपनी राजधानी को सरयू के उस पार मझौली में स्थानांतरित कर दिया | इस तरह मल्लों का मझौली राज्य अस्तित्व में आया | अकबर के शासन काल में मझौली राज्य पर राजा देव मल्ल का शासन था | राजा देव मल्ल अकबर के कृपा पात्रों में से थे | अकबर के प्रभाव में राजा देव मल्ल ने अपने तीन पुत्रों-प्रसाद मल्ल, माधव मल्ल और राय मल्ल , में से अपने मंझले पुत्र माधव मल्ल को सरयू के इस पार के विस्तृत क्षेत्र  का प्रबंधन संभालने के लिए भेज दिया | माधव मल्ल ने अपनी राजधानी जिस जगह पर बनायी उस जगह का नाम उन्हीं के नाम पर ‘मधुबन’ पड़ा जो आज मऊ जिले की एक तहसील हैं | राजा माधव मल्ल के बिशेनवंशीय मल्ल वंशज मधुबन के ईर्द-गिर्द करीब दर्जन भर गांवों में रहते हैं | इस पुरे इलाके को “मल्लान” के नाम से जाना जाता है | क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी है | भोजपुरी की छ: मुख्य उप-शाखायें है , यथा (1) मल्लिका ( मल्ल गणतंत्र, आजमगढ़ क्षेत्र), (2) काशिका (काशी क्षेत्र), (3) बल्लिका (बलिया-आरा क्षेत्र ), (4) छपरहिया (छपरा-पटना  उत्तर गंगा) (5) नगपुरिया (कर्मनाशा से रांची क्षेत्र) और , (6) विदेशी (सूरीनाम, मॉरिशस, फिजी, गयाना इत्यादि) | अथ, यही मल्लिका भोजपुरी इस क्षेत्र की भाषा है| राहुल सांकृत्यायन, अयोध्यासिंह उपाध्याय “हरिऔध”, लक्ष्मीनारायण मिश्र, डॉ विजयशंकर मल्ल और पण्डित  कन्हैयालाल मिश्र सरीखे महापुरषों की मातृभाषा यही मल्लिका भोजपुरी रही है | भाषा की मिठास ऐसी कि इस मिठास पर भी कटाक्ष किया जाता था | बचपन में मैंने ऐसी ही कटाक्षभरी कुछ पंक्तियां सुनी थी जो आज भी याद हैं –

                          चार चोर चौदह हमनी के,

 खेदलें चोर, भगलीं हमनी के,

वहा रे हमनी के, वहा रे हमनी के |  

राजा माधव मल्ल की सांतवी पीढ़ी के वंशज बाबू रामदुलार मल्ल ने 1750 ई. में लखनौर गांव  बसाया | गांव  के सीवान पर पडोसी गांव  हैं – मर्यादपुर, अजोरपुर, बांकेपुर, बैरियाडीह, भेड़ौरा, डुमरी इत्यादि | शिक्षा और समृद्धि दोनों ही मामलों में लखनौर क्षेत्र के अग्रणी गांवों में शुमार होता रहा है | जमींदारी उन्मूलन से पहले क्षेत्र के कुछ सबसे बड़े जमींदार इस गांव के थे | गांव की  प्राथमिक पाठशाला, जिसकी स्थापना ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रथम भारतीय वकील मुंशी चोआलाल ने  अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्घ में की, बहुत लम्बे अरसे तक दूर-दराज के बच्चों को उपलब्ध एकमात्र स्कूल था | प्रसिद्ध विधिवेत्ता और उत्तर प्रदेश के दीर्घकालीन महाघिवक्ता पण्डित कन्हैयालाल मिश्र और हिन्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र ने इसी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की | लखनौर के बाबू जमुनाप्रसाद मल्ल, जिन्होंने सन 1900 के आस-पास थामसन कॉलेज ऑफ़ सिविल इंजीनियरिंग (वर्तमान में आई.आई.टी रूडकी) से डिप्लोमा किया, डॉ विजयशंकर मल्ल, जो हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार और बनारस हिन्दू विशवविधाल्य  में प्रोफेसर हुए, डॉ लल्लन प्रसाद मल्ल, जो उज्जैन विशवविधाल्य में वनस्पति शास्त्र के प्रोफ़ेसर हुए और श्री कृष्णमोहन मल्ल जो भारतीय रेलवे से महाप्रबन्धक (जी एम) पद से रिटायर हुए-सभी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक पाठशाला लखनौर से ग्रहण की | बींसवी शताब्दी के पूर्वार्ध में पढने-लिखने की ऐसी समृद्ध परम्परा ग्रामीण भारत के लिए विरली ही थी |

 इस श्रृंखला की एक कड़ी मेरे बाबूजी स्वर्गीय हृद्याशंकर मल्ल भी थे जो तमाम आर्थिक आवरोधों के बावजूद प्राथमिक पाठशाला लखनौर, मिडिल स्कूल फतेहपुर, शहीद इंटर कॉलेज मधुबन से होते हुए गोरखपुर विशवविधाल्य से अंग्रेजी में स्नात्तकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएट) होने में सफल हुए और फिर सन 1960 से सन 1994 तक इंटरमीडिएट कॉलेज, उरुवा बाज़ार गोरखपुर में अंग्रेजी के प्राध्यापक और फिर प्रधानाचार्य के रूप में जिन्होंने न सिर्फ अपने परिवार के लोगों में, अपितु सैंकडो-हजारों अन्य की जिन्दगी में, शिक्षा को एक केन्द्रीय स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त की |

 गोरखपुर शहर से करीब 43 किमि दक्षिण में कस्बाई चरित्र  वाला एक गाँव है उरुवा बाजार | बाबूजी वहां पर आध्यापक थे और हमारा जुलाई से मार्च का शिक्षा सत्र  उरुवा में ही गुजरता था | पर मार्च का अंत आते-आते इंटरमीडिएट कॉलेज में परीक्षायें  समाप्त हो जाती थीं  और हम सब लखनौर के लिए प्रस्थान करते थे | फिर मार्च के अंत से कॉलेज खुलने तक, अर्थात जुलाई के प्रथम सप्ताह तक, लखनौर का घर-आंगन, खेत-खलिहान, ताल-तलैया, बाग-बगीचे, हाहा (घाघरा की एक उपशाखा) हमारे संगी-साथी हो जाते |

 गांव  में प्रवेश करते ही वो अभिवादन सुनाई देता जो लखनौर की सोच और संस्कृति दोनों का बयान करता है | अगर बाबूजी साथ हुए तो गांव के बड़ों को देखकर  बोलते थे – “काका सलाम” “चाचा सलाम” “सलाम बाबा” और अगर आम्मा साथ होती थी तो गाँव के बाबूजी के हमउम्र अभिवादन करते हुए बोलते थे “भौजी सलाम” और हमारे हमउम्र बोलते थे “ चाची सलाम” “काकी सलाम” | पता नहीं लखनौर में सलाम कहने और करने की यह परम्परा कब और कैसे आयी पर घाघरा के उस देहात में गंगा-जमुनी तहजीब का यह अकेला उदाहरण नहीं था | अपने बचपन में लखनौर की इस परम्परा पर मुझे बहुत गर्व होता था और आज, गांव से इतनी दूर बैठकर लिखते हुए, मन में घबराहट हो रही है कि पता नहीं आज के दूषित माहौल में यह परम्परा अब जीवित बची है कि नहीं |

 लखनौर के दो कोस उतर (करीब 6-7 कि मी) सोनाडीह नामक जगह है जहाँ पर हमारे गांव  के लोगों की सिद्ध देवी का मंदिर है और मुंडन इत्यादि  अनुष्ठान वहीँ पर संपन्न किये जाते हैं | (मेरे दो बेटों का मुण्डन तो अहमदाबाद और बड़ौदा में बिना किसी अनुष्ठान के सम्पन्न हुआ पर अम्मा ने बाद में उनके बाल को सोनाडीह में अनुष्ठापूर्वक चढ़ाया) | हमारे बचपन में हर वर्ष नवरात्रि के समय सोनाडीह में माह भर चलने वाला मेला लगता था | जब हम मार्च के अंत में उरुवा बाजार से लखनौर पहुँचते तो यह मेला अपने अंतिम चरण में होता | गांव पहुँचते ही सबसे पहले तो अपने चचेरे भाइयों-बहनों और यार-दोस्तों से उस साल के मेले की कहानियां इकट्ठी की जातीं और रात में सोने से पहले ही यह निर्णय भी ले लिया जाता कि सोनाडीह कब जाना है | सोनाडीह के मेले का महत्व सबकी जिन्दगी में ऐसा था कि गांव के बुजुर्ग भी पहला प्रश्न यही करते थे कि हम लोग सोनाडीह गये कि नहीं | इतना ही नहीं, गांव के बुजुर्ग मेले के लिए हम बच्चों को अपनी-अपनी  क्षमतानुसार पैसे भी देते थे- दसपैसे, चार आना, आठ आना | और,  फिर अगले दो-चार दिन हमारी जिन्दगी मेले में ख़रीदे गये खिलौनों के साथ व्यतीत होती | वैसे तो इस मेले में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं ख़रीदा जिससे मेरी सोच “ईदगाह” कहानी के हामिद जैसी लगे पर आजभी यह सोच कर शर्म और फक्र (और हसीं भी) का मिला जुला भाव आता है कि एकबार मेले में एक दुकान से चंदन की लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा बिना पैसे दिये उठा लेने में मैंने अपने चचेरे भाइयों का साथ दिया था- यह सोचकर कि मेरी बड़ी मां, जिसे हम लोग माई कहते थे, शुक्रवार के दिन संतोषी माता का व्रत और पाठ करती है और उसे चंदन की लकड़ी का भी इस्तेमाल करना होता है |

 मार्च के अंत में, जब हम गांव पहुँचते थे, आम के पेड़ों पर बौर आ चुके रहते थे- अकसर पेड़ों पर बौर के बाद छोटे-छोटे टिकोरे भी आ चुके होते थे | गाँव पहुंचते ही दोस्तों से यह भी ब्योरा लिया जाता था कि इस बार आम की फसल कैसी है, कि इसबार लंगडू बाबा के बारहमासी पेड़ों पर फल लगे हैं कि नहीं, कि बुढ़िया की बारी (एक बड़ा सा बगीचा जिसकी रखवाली एक बुढ़िया करती थी और जिसके होते हुए आम तोड़ना नामुमकिन था) की बुढ़िया अभी जिन्दा है की मर गई, कि कालीमाई के मंदिर के पास वाले बुदबुदहवा पेड़ पर आम हैं कि नहीं, कि भीते के पास सिनुरहवा ( सिन्दूर जैसे आम ) पर फसल आई है कि नहीं, कि “मियां की बागी” (बागीचे में) में इसबार आम हैं कि नहीं |

 गांव के जिस हिस्से में हमारा घर था उसको “पूरब” टोला बोलते थे | गांव के ठीक पूर्व तीन पोखरे थे- नौका पोखरा (जिसमें दो तरफ पक्के घाट बने हुए थे और जिसका प्रयोग सिर्फ नहाने के लिए होता था), पुराना पोखरा (या पुरनका पोखरा जिसके पानी का इस्तेमाल नित्य कर्म के लिए होता था) और धोबियों का पोखरा (जिसका प्रयोग गांव के धोबी कपडे धोने के लिए करते थे) | इन पोखरों के ईर्द-गिर्द और इनके बाद एक विस्तृत क्षेत्र था- कम से कम दो वर्ग किमी का-जिसमें गांव के सभी लोगों के सम्मिलित बाग-बगीचे-बंसवारी थे | इनमें अधितकर पेड़ आम के थे और इन पेड़ों और बगीचों को हम इनके रखवालों के नाम से जानते थे, मालिकों की चिन्ता हमें नहीं थी | मेरे जैसे सभी बच्चों का सुबह के शाम तक का लगभग सम्पूर्ण समय बगीचे में आम बीनते या तोड़ते, पोखरे में नहाते या खेलते हुए व्यतीत होता | सुबह की शुरुआत मुहं अंधेरे बगीचे में पहुँचने से होती – रात के गिरे हुए आम बटोरने के लिए | दिन में एक बार पोखरे में नहाने की अनुमति होती थी जो सुबह आठ-नौ बजे ही पुरी हो जाती | फिर दिन में तीन- चार बार बिना घर में बताये नहाने का दौर होता था और फिर गीले कपड़ों में ही बाग में घूमना होता था जब तक कि गीले कपड़े सूख न जायें | इकट्ठा  किये और तोड़े हुए आमों को दिनभर ट्राफियों की तरह प्रदर्शित करने के बाद शाम को उनके यथोचित उपयोग का निर्णय होता था- कच्चे हुए तो खट्मीठवा, अचार, मुरब्बा इत्यादि और पके हुए तो गादा, अमावट  इत्यादि | दिनभर बगीचे में तरह तरह के खेल भी होते रहते थे- ओल्हा-पाती (पेड़ पर), लट्ठा दौड़ (पोखरे में), कबड्डी, चिक्का, ऊ़़ढा़ कूद (एक ऊँचे प्लेटफॉर्म से अखाड़े में कूदना), कुश्ती, खुन्टेलवा, गिल्ली-डंडा इत्यादि | गरज कि दिन का एक-एक लम्हा किसी न किसी सक्रिय काम में ही गुजरता | घर पर सिर्फ नाश्ता और खाने के लिए आना होता | हमारे गाँव के घर पर मेरी बड़ी मां (माई) हमारी चचेरी बहन के साथ रहती थी | घर की मलिकाइन का दर्जा माई को ही प्राप्त था | पुरे गरमी की छुट्टी जब तक हम गांव  में रहते हमारी सारी जरूरतें माई द्वारा ही पूरी होतीं ए माई खाना दो !, ए माई  ! पैसा दो, ए माई ! क्या बना है, गरमी  ये बनाओ इत्यादि । पूरीगरमी भर माई ही हमारी दात्री होती, साथ ही वह अम्मा, भाई और बहनों के हाथों डांट और पिटाई में भी हमारे रक्षक का काम करती । 

   गांव में बड़े और बुजुर्गों के भी अड्डे थे जहाँ रुचि अनुसार लोग इकट्ठे होते थे अपने अपने शौक पूरा करने के लिए । इनमें एक अड्डा था हमारे घर की चहारदीवारी से लगा हुआ “बरदौर” जहाँ पर लोगों के बैल-गाय रखे जाते थे और अनाज और पशुओं का चारा संग्रहीत होता था | उसी बरदौर में, एक छप्पर के नीचे, हर दोपहर तीन-चार बजे के आस-पास गांव के कुछ बुजुर्ग जुटते थे- ताश खेलने के लिए |   भीड़ में तीन पीढ़ियों के लोग होते थे- बाबा भी और नाती भी | बीच में बाबूजी की पीढ़ी थी | दो-तीन टीमें अलग-अलग,  पर एक ही छप्पर के नीचे,  ट्वेंटी नाइन खेलने में व्यस्त रहती | मेरी पीढ़ी के बहुत सारे बच्चे अपने दादाजी-चाचाजी को सलाह देने में लगे रहते कि “पनवा का इक्कवा चलीं” | फिर अचानक राम लाल बाबा की कान के पर्दे चीरने वाले तेज़ आवाज़ सुनाई देती की “ हई पेवर (यानी पेयर) ह पेवर !”


दूसरा अड्डा था “बिन्सरी बाबा का हाता” यानी विन्देश्वरी पंडित का हाता । यहाँ की बैठकों का चरित्र अलग होता था । यहाँ पर गाँव के विवेकशील  और कुछ विवादशील  लोग सम सामयिक घटनाओं पर, इतिहास और साहित्य पर बहस (और कभी-कभी विवाद) करते थे- सयंत और असयंत | ऐसे में मुझ जैसे बच्चों का काम था बगल में पनहारिन के घर से बाबा-चाचाजी लोगों के लिए उनकी पसंद का पान  लाना। इन्हीं अड्डों पर एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को बुजुर्गों और माटी का इतिहास सौंपा जाता था, किस्से-कहानियों और गल्पों के साथ। इन परंपरागत कहानियों में कितना सच होता है और कितना झूठ या रोमांस, कहना मुश्किल है। पर, लिखित इतिहास तो सिर्फ राजाओं-महाराजओं का होता है। आम आदमी की गाथायें तो ऐसे किस्सों कहानियों के माध्यम से ही जीवित रह पाती हैं | ऐसी ही चौपाल की कहानियों से मैंने बचपन में ही जान लिया था कि -

बाबर की सेना अफगानों से लड़ाई के पश्चात वापस लौटते हुए हमारे गाँव के सिवान में रुकी थी और इसलिए हमारे गाँव के उस हिस्से के खेत आज भी “खेमहुआं” कहलाते हैं (खेमा शब्द से व्युत्पति)

अठारह सौ सत्तावन के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे गाँव के लोगों ने हिस्सा लिया था और कुँवरसिंह की सेना को खाना खिलाया था। मैंने ये भी सुना है की विजयशंकर बाबा के हाते के निर्माण के लिए नींव की खुदाई करते समय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की बंदूकें जमीन के अंदर गड़ी हुई मिलीं। 

जमीन के स्थायी बंदोबस्त के अपने आखिरी चरण में लॉर्ड कार्नवालिस मधुबन क्षेत्र में था और उसी क्षेत्र में वह बीमार पड़ गया और फिर गाजीपुर पहुँचकर उसकी मृत्यु हो गई। चूंकि कार्नवालिस अपने दौरे के लिए ऊंट का प्रयोग कर रहा था जिसे स्थानीय लोग “डंकिनी” कह कर बुलाते थे इसलिए स्थायी बंदोबस्त वाले इलाके को मल्लान के लोग लंबे दौर तक “डंकिनी” ही के नाम से जानते थे। 

शेरशाह सूरी की पहली संतान, उसकी बेटी मानु बेगम, रौजा दरगाह (मधुबन के पास) के पीर के आशीर्वाद स्वरूप पैदा हुई और मन्नत स्वरूप शेरशाह ने मानुबेगम को दरगाह को सौंप दिया। दरगाह की आमदनी के लिए शेरशाह ने बावन गावों की मालगुजारी भी दरगाह को सौंप दी। इसलिए, सदियों तक उन बावन गांवों के समूह को “चकमानो”कहा जाता था। 

गांव के दक्षिण-पश्चिम में एक “मंगलहिया” गाड़ही भी थी जिसके बारे में प्रसिद्ध था की बाबर की सेना ने ही उसकी खुदाई की थी। लखनौर में “मटन” को, जिसे गोरखपुर में “गोश्त’ के नाम से जाना जाता था, “कालिया” कहते थे (बबरनामा के हिन्दी अनुवाद में भी मैंने मटन के लिए “कालिया” शब्द पढ़ा है)। जाहिर है की गंगा-जमुनी तहजीब मेरे गांव की मिट्टी में रची बसी है। वहाँ के खान-पान, संस्कृति और शब्द-व्यवहार हमारे संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मूर्त रूप देते हैं। बचपन में लंबे समय तक गर्मी की छुट्टियाँ लखनौर में गुजारने के दौरान इन बातों ने मुझे छुआ भी होगा और आकार भी दिया होगा, इसमें कोई शक नहीं है। इसमें भी कोई शक नहीं कि मेरे शरीर और मन मस्तिष्क को रूप और आकार देने वाले और मेरे सबसे बड़े आदर्श मेरे बाबूजी के विशालमना व्यक्तित्व को भी सबसे मजबूत आधार इसी मिट्टी और इसकी संस्कृति से मिला होगा। 

 गांव से इतने लंबे समय तक दूर रहने के बावजूद आज भी जब शहर की भौतिकता और कृत्रिमता मन को अवसादग्रस्त करने लगती है तो उस गांव की और बचपन की यादें ही सहारा देती हैं। मेरे शहर के अंदर अगर मेरा गांव नहीं होता तो जीवन का संतुलन निश्चित ही बिगड़ जाता। इसलिए मैं हमेशा सलाम करता हूँ गाँव के उस खु़लूस को, उस जिन्दादिली और नेकदिली को जिससे शहरी ज़िन्दगी की कलुषताओं का सामना करने की एक सहज सामर्थ्य मुझे मिली है। 

 सुनील कुमार मल्ल                                                         

प्रस्तुति सुनील दत्ता कबीर ,

 स्वतंत्र पत्रकार , दस्तावेजी प्रेस छायाकार

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