सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

घर से दूर क्यों गालिब / विवेक शुक्ला

 घर से दूर क्यों गालिब / विवेक शुक्ला


 

‘गालिब हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यूँ न गर्क़-ए-दरिया न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता।’ मिर्जा गालिब ने इस बेहतरीन शेर को लिखते हुए सोचा भी नहीं होगा कि उन्हें प्राण त्यागने के बाद अपने घर यानी पुरानी दिल्ली के किसी कब्रिस्तान में जगह नहीं मिलेगी। वे तो यहां की गलियों की ही खाक छानते थे।

 इधर ही दोस्तों-यारों के बीच महफिलें सजतीं। वे कभी-कभार ही इन गलियों से बाहर निकलते। फिर ये बात भी है कि उनके दौर में दिल्ली कमोबेश उधर ही बसी थी, जिसे हम अब दिल्ली-6 या शाहजहांबाद कहते हैं। हां, दिल्ली के गांवों में भी आबादी की बसावट तो थी।


पर बड़ा सवाल ये है कि सदियों में पैदा होने वाले गालिब को 15 फरवरी,1869 को मृत्यु के बाद उनके अपने घर से इतनी दूर क्यों दफनाया गया? गालिब को दफनाने के लिए लेकर जाया गया उनके बल्लीमरान स्थित घर से करीब आठ-नौ मील दूर बस्ती निजामउद्दीन में। 

उनके घर के करीब तीन कब्रिस्तान थे, हैं। पहला, कब्रिस्तान कदम शरीफ। ये कुतुब रोड पर है। दूसरा, आईटीओ में प्रेस एऱिया के ठीक पीछे है। इसका नाम है कब्रिस्तान एहले- इस्लाम। इसे राजधानी के सबसे पुराने कब्रिस्तानों में से एक माना जाता है। तीसरा, आसफ अली रोड के पास है। इसे कहते हैं कब्रिस्तान मेंहदियान। इधर कई सूफी पीर, शायर और बड़ी सियासी हस्तियों की संगमरमर और लाल पत्थरों से सजी कब्रें हैं। वे इन तीनों में से किसी में भी दफन हो सकते थे।


बहरहाल,गालिब साहब को दफन किया गया बस्ती निजामउद्दीन में। हालांकि कुछ जानकार दावा करते हैं कि चूंकि चचा गालिब की हजरत निजामउद्दीन के प्रति गालिब आस्था थी, इसलिए उनके परिवार वाले उन्हें दफनाने के लिए बस्ती निजामउद्दीन ले गए होंगे। शायद घर वालों ने सोचा हो कि सारी ज़िंदगी तो ग़ालिब ने मस्जिद और नमाज़ से परहेज़ करने में ही निकाल दी तो क्यूँ ना उन्हें संसार से विदा होने के बाद सूफी की मजार के पास ही दफन कर दिया जाए।


एक राय ये भी है कि उस दौर में नामवर- असरदार लोगों के अपने निजी कब्रिस्तान होते थे। चूंकि गालिब तो मूल रूप से आगरा से थे, इसलिए उनके परिवार का यहां पर कोई कब्रिस्तान होने का सवाल ही नहीं था। वे तो किराए के घर में रहते थे। उनकी जेब  में कभी पैसा रहा ही नहीं। पर निजामउदीन में उनके ससुराल वालों का कब्रिस्तान था। कहते हैं, गालिब साहब की आरजू थी कि उसी में उन्हें दफन कर दिया जाए। गालिब की पत्नी लोहारू से थी। उनका दिल्ली में हाजी बख्तियार काकी और निजामउद्दीन क्षेत्र में अपने कब्रिस्तान थे। निजाम उद्दीन वाले कब्रिस्तान में ही उनकी पत्नी और ससुर भी दफन हैं।


 बहरहाल,  गालिब की शायरी के शैदाई उनकी मजार के पास चंद लम्हें गुजारने के लिए आते रहते हैं। मोहम्मद इकबाल जब भी दिल्ली आए तो गालिब की दरगाह में अवश्य हाजिरी देने के लिए पहुंचे। इकबाल 2 सितंबर,1905 को इंग्लैंड जाने से पहले पहली बार इधर आए थे। वे तब ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा...’ गीत लिख चुके थे।  उन पर गालिब की शायरी  और विचारों का खासा असर था। वे मानते थे कि गालिब की मजार पर आना शायरों के लिए हज करने के समान है।


मिर्जा गालिब, अमीर खुसरो और रहीम के कालखंड में भारी अंतर हैं। तीनों कलम के धनी। इन सबका लेखन अब भी प्रासंगिक है। संयोग देखिए कि राजधानी के निजामउद्दीन क्षेत्र के कोलाहल से दूर तीनों चिरनिद्रा में हैं बहुत कम फांसले पर। शायद ही किसी और स्थान पर आपको तीन विभूतियां मिलें।  


उर्दू शायरी गालिब के बिना अधूरी है। “उनके  देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है...” अब भी गालिब की शायरी के शैदाई  उनके कलामों को बार-बार पढ़ते हैं। उनका एक और शेर पढ़ें। “रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए...धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए...”गालिब के कुल 11 हजार से अधिक शेर जमा किये जा सके हैं। उनके खतों की तादाद 800 के करीब थी। और गालिब का जब-जब जिक्र होगा तो उनके इस शेर को जरूर सुनाया जाएगा। “हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले...बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...”।  गालिब के हर शेर और शायरी में कुछ अपना सा दर्द उभरता है। “ हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन... दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है...” इतने नामवर शायर की कब्र को कुछ दशक पहले तक कोई देखने वाला भी नहीं था। हाल-बेहाल पड़ी थी। फिर दिल्ली में जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी के संस्थापक हकीम अब्दुल हामिद साहब ने अजीम शायर की कब्र को नए सिरे से विकसित करवाया ताकि उनके चाहने वाले वहां पर जाकर कुछ देर उनकी शायरी के माध्यम से उनका स्मरण कर सके ।

 

दिल्ली से गालिब जब कलकत्ता गए थे

मिर्जा मोहम्मद असादुल्लाह बेग खान यानी चचा गालिब (दिसंबर 1797 – 15 फरवरी 1869) के दौर की दिल्ली को जानने –समझने के लिए ये जरूरी है कि हम तब की दिल्ली को दो भागों में बांट लें। पहली, 1857 से पहले की दिल्ली और फिर गदर के दौरान और उसके बाद की दिल्ली। तब दिल्ली की आबादी करीब डेढ़ लाख से कुछ अधिक ही थी। गालिब जब 15 या 16 के ही थे, वे तब दिल्ली आ गए थे। तब तक दिल्ली में गोरों का राज स्थापित हो चुका था। उसके बाद वे ताउम्र दिल्ली में ही रहे हैं। हां, वे सन 1827-29 के दरम्यान कलकत्ता ( जिसे अब हम कोलकाता कहते हैं) कुछ काम-धंधे की तलाश में चले जाते हैं। वे वहां तीन बरस तक रहते हैं। वे दो बार रामपुर भी जाते हैं। वे रामपुर में कुछ ही दिनों के लिए जाते हैं।

गालिब और मुगल राज का संध्याकाल

गालिब के समय की दिल्ली किस तरह की थी? यहां की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां किस तरह की थी? देखा जाए तो गालिब के यहां आने के शुरूआती सालों में दिल्ली में  हालात कोई बहुत सुकून भरे नहीं थे क्योंकि मुगल राज कमजोर हो रहा था। उस दौर में दिल्ली में अव्यवस्था और अराजकता फैली हुई थी। अभी हम आगे बढ़ने से पहले चंदेक कदम पीछे चलना चाहेंगे। दिल्ली सन 1781-82 के दौरान भयंकर भूखमरी के दौर से गुजरी थी। उस भूखमरी ने दिल्ली को बुरी तरह से प्रभावित किया था। लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए थे। बहुत बड़ी संख्या में लोग भूखमरी का शिकार भी हुए। महान लेखक पर्सिवल स्पीयर एक जगह लिखते है- “  उस भूखमरी के कारण दिल्ली के गांवों में सैकड़ों लोगों की जानें चली गईं थीं। उस आपदा का असर यहां के जीवन पर लंबे समय तक रहा।”

चिराग दिल्ली,  महरौली, निजामउद्दीन थे आबाद

गालिब साहब के दौर में चिराग दिल्ली,  महरौली, निजामउद्दीन जैसे इलाके और गांव आबाद थे। कुछ आबादी पुराना किला में भी थी। वहां पर बसे लोगों को सन 1918 में मौजूदा सराए काले के आसपास बसाया गया था।महरौली में कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह और योगमाया का मंदिर था ही। उनमें लोग जाते थे। कुछ पुराने दिल्ली वाले इसे जोगमाया मंदिर भी कहते हैं।  इसे निश्चित रूप से राजधानी का सबसे प्राचीन मंदिर माना जा सकता है। काकी की दरगाह परिसर में ही बहादुर शाह जफर दफन भी होना चाहते थे। पर अफसोस ये हो ना सका। हस्ती निजामउद्दीन  में हजरत निजामउद्दीन औलिया और अमीर खुसरो थे ही। इधर उनके होने के चलते गहमागहमी रहती थी। वैसे, इसी इ लाके में अकबर के नव रत्न  रहम खान भी चिर निद्रा में थे। तो माना जा सकता है कि निजामउद्दीन में पहले भी रौनक रहती होगी।

 महरौली में एक सूफी फकीर की दरगाह और  योगमाया का मंदिर लगभग का साथ-साथ होना इस बात की गवाही है कि तब य़हां पर हिन्दू-मुसलमान मिल-जुलकर रहते थे।


 VIVEK Shukla


Navbharatimes और Haribhoomi में छपे लेखों के  अंश।


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