गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

जोधपुर ले मेहरानगढ़ का तोपखाना

 प्रत्येक दुर्ग की सामरिक शक्ति की परिचायक होती थी तोपें।जिस प्रकार प्रत्येक राजवंश का अपना इतिहास होता है, उस शौर्य के इतिहास में तोपों का भी अपना विशिष्ट स्थान रहा है। 


जिस किले पर तोपों के गोलों के हस्ताक्षर नहीं होते, वह किला कभी भी उच्च श्रेणी का नहीं माना जाता।

जोधपुर के मेहरानगढ़ की भव्य प्राचीर पर ऐसी विशाल तोपों का प्रदर्षन किया हुआ है जिन्हें देख देशी-विदेशी पर्यटक आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि इस भारी भरकम तोपों को चार सौ फीट ऊंची इस पहाड़ी पर कैसे चढ़ाया होगा ?


ऐतिहासिक दस्तावेजों से प्रत्येंक तोप के नामकरण के अलावा उसके उद्गम स्थल तथा खरीद का भी विस्तृत विवरण मिलता है। इन विशाल तोपों का नामरकण भी इन्हें ढालने वाले सिद्धहस्त निर्माताओं ने इनका रोद्र रूप देखकर ही किया होगा। 


वैसे इन तोपों के नाम से ही इस अनुमान लगा सकते है कि वो शत्रु पर कैसे कहर बरपाती होगी। जैसे धुड़धाणी, कड़क बिजली, किलकिला, बिच्छुबाण, चाबुक, नुसरत, शम्भूबाण, गजनाल, इन्द्रगाज, नागण, मीराबग्स, रामबाण, चामुण्डा इत्यादि।


मेहरानगढ में संग्रहीत तोपें चार प्रकार की हैं- गढ़ पर रखी जाने वाली अचल तोपें, युद्ध में ले जाने वाली चल तोपें, ऊंटों पर रख कर चलाई जाने वाले जुजरबा व हाथियों पर रखकर चलने वाली गजनाल तोपें तथा चैथी गुबारा तोपें।


भारी व जंगी तोपे जो दो चार या छः पहियों पर रखी थी, उन तोपों को युद्ध में ले जाते समय चार से 16 बैल, कई घोडे़ व हाथी उन्हें खींचते थे।


इसके अलावा दुर्ग की प्राचीर पर रखी भारी तोपों को चलाने के सम्बन्ध में दस्तावेजो से पता चलता है कि इन तोपों को चलाने के लिए 8 आदमियों की जरूरत होती थी तथा ये तोपें 250 तथा 300 गोले दाग सकती थी।


इन आठ आदमियों के कार्य भी बंटे हुए होते थे यथा- पहले व्यक्ति को सुबा वाला, दूसरे को थैली वाला, तीसरे को सोपसा वाला-इसे प्रेमी वाला भी कहते हैं, ये सुर को पकड़कर कान में बारूद डालता था।


चौथा बती बतावण वालो (आग लगाने वाला), पाँचवा व छठा दोनों तोप के दोनों तरफ खड़े रहते थे, तथा तोप छूटने के बाद उसके आगे-पीछे होने पर यथास्थिति पर रखते थे।


सातवें को डाक वाल कहते हैं जो बारूद की पेटी से बारूद की थैली लाकर दो नम्बर वाले को देता था और आठवाँ पेटी से बारूद की थैली सातवें को देने का कार्य करता था।


गाड़ी पर रखकर छोड़ी जाने वाली तोपों के लिए चार आदमियों की जरूरत होती थी तथा ऊंटों पर रखी जाने वाली जुजरबा को चलाने के लिए एक आदमी होता था। हाथियों पर रखने वाली गजनाल के लिए भी एक आदमी ही होता था तथा इन तोपों को निशाने के हिसाब से घुमाया जा सकता था। 


चौथी गुबारा तोपें थी, जिनका मुँह आगे से चौड़ा तथा पीछे से पतला होता है। गुबारा तोप का उपयोग नीचे से ऊपर की तरफ तथा गढ़ के महलों की छत को तोड़ने के लिए अधिक सैनिकों को हताहत करने के लिए किया जाता था।


यह तोप दूसरी प्रकार की तोपों से दस गुणा अधिक काम करती है तथा इसमें लोहे गोले नहीं लगते, गुबारा में बारूद डालने के पश्चात् उसके आगे सीण (घास) का डाटा देते हैं।


उसके बाद लगड़ी (पेड़ का मजबूत तना) डालते हैं जो आगे जाकर अनेक प्रकार की पतली-पतली तीखी लकड़ियों में बंट पाता है, जिससे अनेक लोगों को चपेट में लेता है। गढ़ की छत फोड़ने के लिए इसमें मोगरी डाल कर चलाते थे


मेहरानगढ़ की प्राचीन पर रखी तोपों पर लगे विशेष प्रकार के निशान से समझा जा सकता है कि किस तोप में कितना बारूद डाला जायेगा तथा अभिलेखों से भी पता चलता है कि तोपखाना विभाग द्वारा प्रत्येक तोप के हिसाब से पेटी दी जाती थी, जिसमें बारूद नाप से एक कपड़े की थैली में डालकर दिया जाता था।


युद्ध में नापने तथा यथाषीघ्र उसका नाप करना आसान नहीं होता था, इस कारण पहले से ही प्रत्येक तोप के गोले के आकार, तोप की मारक क्षमता के हिसाब से अलग-अलग वनज की थैलियां बनती थी।


युद्ध में सबसे अग्रशक्ति में हाथियों की पीठ पर विशाल बन्दूकनुमा तोपें होती थी, जिन्हें गजनाल कहा जाता था, ऐसी हल्की तोपें मोर्चा बदल-बदल कर शत्रु सेना को आघात पहुंचाने वाली होती थी।


गजनाल जैसी छोटी तोपें जो ’जुजरबा’ कहलाती है, ऊंटों की पीठ यह बांधी जाती थी। ऊंट पर सवार इन ’जुजरबा’ तोपों के छर्रे बरसाकर दूर तक शत्रु सेना को धराशायी कर सकता था, ऊंट को वो इच्छानुकूल नियंत्रित भी कर सकता था।


दस फीट लम्बी किलकिला अपने नाम को सार्थक करती हुई तीन-चार मील तक के लक्ष्य को भेद सकती थी तथा किसी भी सुदृढ गढ़ की प्राचीर अथवा लौह द्वारा को भीषण प्रहारों से पलक झपकते ही ढहा देने की क्षमता रखती थी। जब किलकिला से गोला छोड़ा जाता था, उस समय शहर में स्थित गुलाब सागर का पानी छितर जाता था।


अष्ट धातु की बनी तोप शम्भूबाण साढे़ सात फीट लम्बी, दस इंच व्यास के गोले को एक डेढ़ मीटर दूर फेंकने में सक्षम थी।


इन भारी भरकम तोपों के अतिरिक्त एक मील तक मार करने वाली मंझली नागफली, व्याघ्री, मीरक, चंग, मीरबगस, रहस्यकला, चामुण्डा आदि तोपें एक सेर में सात सेर बारूद के विस्फोट से पांच छः इंच व्यास के गोले फेंककर शत्रु सेना में त्राहि-त्राहि मचा देती थी।


बीसवीं सदी के उतरार्द्ध में जोधपुर के सिद्धहस्त कारीगरों ने मशीनगन नुमा एक तोप का आविष्कार किया,

जिससे एक साथ दर्जन नाले जुड़ी हुई है तथा प्रत्येक नाल पर तोपों की भाँति छेद है, जिसमें से बारूद को आग लगाई जाती थी, पीछे की तरफ से उन छेदों को बंद करने के लिए एक लोहे की ’पेटीका’ से ढके हुए हैं। इसका आविष्कार मशीन से बहुत पहले किया जा चुका था।


डाँ. महेन्द्रसिंह तँवर

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