गुरुवार, 28 जनवरी 2021

किसान आंदोलन के मायने / मनोहर मनोज

 जिन्हे कृषि का क नहीं पता वह किसान आंदोलन पर दुनिया भर की बात कर रहे है। चाहे ये किसान आंदोलन के पक्षधर लोग हो या सरकार के पक्षधर लोग।


यहाँ तक की किसान आंदोलन पर अपना पोस्ट लिखने और प्रोग्राम करने वाले जिनके व्यूर्स और लाइकर्स लाखों में है उन्हें भारत की इस कृषि अर्थव्यस्था के समस्त पक्षों की जानकारी नहीं है ना ही इस मुद्दे के असलियत से वाकिफ है। 

एक पक्ष आंदोलन को ग्लोरिफ़ाई कर रहा है पर वह यह बताने में तार्कित रूप से असमर्थ है नए कानून हटाया जाना किसानो का भला कैसे करेगा वह तो उसी यथास्थितिवाद में धकेलेगा जिसमे शताब्दियों से किसान पिस रहे थे। 

आंदोलन शानदार और अभूतपूर्व है पर इसका पहला मुद्दा एमएसपी को कानूनी दर्ज़ा होना चाहिए जिसे मिलना कृषि कानूनों को सही कर देता है।  दूसरी तरफ सरकार के समर्थक  भारत के मध्यवर्गिओं को यह पता नहीं की किसान कितने घाटे में अपना यह कारोबार सदियों से  करता आ रहा  है जिस की वजह से साठ  फीसदी लोग जीडीपी में केवल पंद्रह फीसदी का योगदान कर पाते है। 

मोदी सरकार कॉर्पोरेट को कृषि कारोबार में प्रवेश के लिए कानून बनाकर लायी पर वह कृषि उत्पादों के दाम सीजन में गिरने से बचने के लिए बिना इंतज़ाम किये आ गयी, यही सबसे खतरनाक पक्ष है जो पिछले पचपन साल से चला रहा था जिस पर नए कानून ने किसानो को एक जुट आंदोलित करने का मौका दे दिया। 

 जिस तरह से मजदूरों की ओवर सप्लाई में मजदूरी कम न हो उसके लिए हम मिनिमम वेज एक्ट लाते है , उसी तरह सीजन में कृषि उत्पादों को ओवरसुप्पलाई थामने के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस एक्ट की भी जरूरत है। दरअसल बात ये है जिस बात को  हर किसान से व्यक्तिगत बात के जरिये भी पुष्टि की जा सकती है की कानून का विरोध पहली प्राथमिकता में इसी लिए आया क्योंकि शुरू की वार्ता के दौरान एमएसपी को कानूनी दर्ज़ा दिए जाने की बात को सरकार लगातार  अनसुनी करती गयी और तब फिर किसानो ने सरकार की कमजोर नस यांनी कॉर्पोरेट कानून को रद्द करने की बात कही गयी।

 अगर सरकार एमएसपी में सभी उत्पाद को शामिल कर , इनका लागत युक्त मूल्य निर्धारित कर और इन सभी को कानूनी दर्ज़ा प्रदान कर साथ साथ किसान के सभी उत्पाद के मूल्य भुगतान को समयानुसार सुनिश्चित करने की  अपनी तरफ से एकतरफा पहल कर दे तो उसके बाद  किसान नए कानून को रद्द करने की मांग करेंगे तो ये आंदोलित किसान देश भर के किसानो के नायक नहीं खलनायक कहे जायेंगे.

 पर मौजूदा स्थिति के लिए मोदी सरकार का कॉर्पोरेट फर्स्ट , जिद , अहंकार और अपने नौकरशाहों की सलाह पर एमएसपी की वैधानिक मांग नहीं माँगा जाना जिम्मेदार है। यह ऐसी मांग थी जो क़र्ज़ माफ़ी , बिजली माफ़ी और मुनाफादायक फसलों के दाम और बढ़ने की तरह नहीं थी और इससे सरकार के ख़ज़ाने पर बोझ नहीं पड़ना था। 

दूसरी ये मांग महानगरीय इलाको में जमीन  बेचकर करोडो की  अनोपार्जित आय प्राप्त करने वाले , खेती के नाम पर फार्म हाउस के बिना कर चुकाए  अय्याशी करने वाले और अमीर किसानो के हितो से नहीं जुडी है। मुझे न ही कोई किसान नेता , ना ही कोई कृषि अर्थशास्त्री , न ही कथित  कृषि विशेषज्ञ जिसमे इस समूचे कृषि मुद्दे की कोई संपूर्ण दृष्टि हो। 

न्यूज़ २४ के एंकर संदीप चौधरी द्वारा बेशक किये गए सवाल बेहद वाजिब और अंदरूनी समझ से भरपूर रहे है। किसानों के सरोकार सबसे अव्वल है पर अभी तो केवल कृषि कानूनों की राजनीती हो रही है। कई लोग महंगाई , खाद्य सुरक्षा , पर्यावरण, कॉर्पोरेट , बाजार के पक्षों को उठा रहे है , पर ये सभी दिग्भ्रमित करने वाले रहे है। एमएसपी और एमआरपी को कानूनी दर्ज़ा देना किसानो के आलावा हर उपरोक्त समस्या का समाधान अपने में समाहित किये हुए है।

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