रविवार, 31 जनवरी 2021

अभिव्यक्ति की आज़ादी असीम नहीं! / ऋषभदेव शर्मा

अभिव्यक्ति की आज़ादी असीम नहीं! / ऋषभदेव  शर्मा  


बजट सत्र आरंभ हो गया। गणतंत्र दिवस पर किसानों की ट्रैक्टर परेड के हिंसक होने के बाद के नाटकीय घटनाक्रम को देखते हुए, जैसी कि उम्मीद थी, कांग्रेस/ विपक्ष ने बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण का  बहिष्कार किया।


देश के सामने पेश असामान्य हालात के दौरान विपक्ष की इस गतिविधि के औचित्य-अनौचित्य की बात बाद में। आखिर उसे भी तो अपनी राजनीति चमकाने का अधिकार है! लेकिन फिलहाल विचारणीय यह है कि राष्ट्रपति महोदय ने अपने अभिभाषण में किसान आंदोलन के हवाले से जहाँ यह दोहराया कि विरोध और प्रदर्शन लोकतंत्र में हर नागरिक को मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी का संवैधानिक हिस्सा है, वहीं यह भी इशारा किया कि यह आज़ादी असीम और अबाध नहीं हो सकती; खास तौर से तब जब इसका दुरुपयोग देश की गरिमा भंग करने और शांति-व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के लिए किया जाने लगे। किसी भी आज़ादी का उद्देश्य अराजकता फैलाना नहीं हो सकता न? इसीलिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने यह स्पष्ट करना ज़रूरी समझा कि " जो संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार देता है, वही संविधान हमें सिखाता है कि कानून और नियम का भी उतनी ही गंभीरता से पालन करना चाहिए।" 


दो महीने से अधिक से चल रहे किसान आंदोलन को नजदीक से देखने वालों का खयाल है कि देश का आम किसान  देश और संविधान के प्रति इस जिम्मेदारी को समझता और इसका सम्मान करता है। इतने दिन तक आंदोलन का अनुशासित और अहिंसक बने रहना इसका जीता जागता प्रमाण है। इसीलिए हर किसान ने लाल किले पर तिरंगे के अतिरिक्त कोई अन्य झंडा फहराने की अवांछित घटना पर खुद को शर्मिंदा महसूस किया और  अनेक प्रदर्शनकारी अपने घरों को लौट गए। 


यहाँ ठहर कर यह विचारना भी ज़रूरी है कि इस आंदोलन का सियासी फायदा उठाने को उत्सुक विपक्ष को शायद किसानों का दिल्ली से लौटना हाथ आई बटेर के उड़ जाने जैसा लगा। इसीलिए  उसने राष्ट्रपति के अभिभाषण से ज़्यादा रुचि आंदोलनकारियों को डटे रहने की पुकार लगाने में दिखाई। सीधे सादे भावुक किसानों को ऐसी किसी पुकार के झाँसे में नहीं आना चाहिए और एक बार सारे प्रदर्शनकारी किसानों को अपने घरों को लौट जाना चाहिए। उनकी आवाज़ संसद और न्यायपालिका तक पहुँच गई है। अब कुछ समय उन्हें प्रतीक्षा करनी चाहिए और संसद को अपना काम करने देना चाहिए। विपक्ष को भी इस मुद्दे को संसद में उठाना चाहिए, न कि सड़कों पर घसीट कर लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ानी चाहिए।


गौरतलब है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस आंदोलन का मूल कारण बताए जाने वाले विवादास्पद कृषि कानूनों का उल्लेख करते हुए अपनी सरकार के दृष्टिकोण की भी व्याख्या की और कहा कि,  ‘व्यापक विमर्श के बाद संसद ने सात महीने पूर्व तीन महत्वपूर्ण कृषि सुधार, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, कृषि (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, और आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक पारित किए हैं।’ उन्होंने ध्यान दिलाया कि, ‘इन कृषि सुधारों का सबसे बड़ा लाभ भी 10 करोड़ से अधिक छोटे किसानों को तुरंत मिलना शुरू हुआ। छोटे किसानों को होने वाले इन लाभों को समझते हुए ही अनेक राजनीतिक दलों ने समय-समय पर इन सुधारों को अपना भरपूर समर्थन दिया था।’ साथ ही, राष्ट्रपति महोदय ने ज़ोर देकर कहा कि वर्तमान में इन कानूनों के क्रियान्वयन को देश की सर्वोच्च अदालत ने स्थगित किया हुआ है और सरकार उच्चतम न्यायालय के निर्णय का पूरा सम्मान करते हुए उसका पालन करेगी। संसद में राष्ट्रपति की  इस घोषणा के बाद अब यही उचित होगा कि फिलहाल सभी किसान अपने घरों को लौट जाएँ। हाँ, विवादित कानूनों के स्थगित रहने की अवधि में इनके हर पहलू पर व्यापक बहस होनी  ही चाहिए।

000

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें