मंगलवार, 26 जनवरी 2021

जन विद्रोह के एक दशक बाद

दस साल में अरब स्प्रिंग का हासिल क्या 

छोटे से उत्तर-पश्चिमी अफ्रीकी मुल्क ट्यूनीशिया को अरब दुनिया का पिछवाड़ा ही कहा जाएगा। यहीं के एक अनजाने शहर सीदी बूअजीद में दस साल पहले एक ऐसी घटना घटी, जो तमाम प्रगतिशील देशों में खबर बनाने लायक भी नहीं समझी जाती। सड़कों पर फल बेचने वाले बेरोजगार नौजवान मोहम्मद बूअजीजी का ठेला एक म्युनिसिपल इंस्पेक्टर ने जब्त कर लिया। ऐसा उसने क्यों किया, इसकी कोई जांच नहीं हो पाई। दुनिया इस बारे में जो भी जानती है, मोहम्मद बूअजीजी के फेसबुक पर जारी बयान से ही जानती है, जिसमें उसने कहा था- ‘मेहनत करके पेट पालना भी ट्यूनीशिया में कहां हो पाता है? सरकारी अमला कदम-कदम पर आपसे घूस मांगता है। न देने पर मारता-पीटता है, रोजी का जरिया छीन लेता है सो अलग। ऐसे जीने से तो मरना ही अच्छा!’ 


सीमित दायरे में लोगों ने उसकी बात सुनी, तेल छिड़ककर आग लगाते, खाक होते उसकी तस्वीरें देखीं और चर्चा को यूं पंख लगे कि अगले ही दिन सारा ट्यूनीशिया सड़क पर उतर आया। यह 18 दिसंबर 2010 की बात है। तब तक पूरी अरब दुनिया खानदानी शाहों और फौजी तानाशाहों की गिरफ्त में थी। ऐसे ही एक शासक जैनुल आबिदीन बेन अली की हुकूमत ट्यूनीशिया में 24 साल से चल रही थी। जाहिर है, लोगों का गुस्सा शांत करने की कोई जरूरत उसे नहीं महसूस हुई। सीधा बयान जारी किया कि मरने वाले के साथ इंसाफ होगा, लेकिन हल्ला मचाने वाले ठंडे होकर जल्दी घर में न बैठे तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। शायद उसकी मशीनरी को सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा नहीं था। न ही इसका कि 2008 की मंदी ने लोगों का जीना इस कदर हराम कर रखा है कि लाठी-गोली से डरने के बजाय अब वे निजाम से लड़ते हुए मर जाना ही ज्यादा पसंद करेंगे। 


सिर्फ 27 दिन में हालात इस कदर बेकाबू हुए कि 14 जनवरी को बेन अली ट्यूनीशिया को अपने हाल पर छोड़कर अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ रातोंरात सऊदी अरब के लिए फरार हो गया। ध्यान रहे, इस आंदोलन से जुड़े सारे संदेश सोशल मीडिया पर अरबी भाषा में ही जारी हो रहे थे। पहली बार दुनिया में एक ऐसे संचार माध्यम का खेल दिखाई पड़ रहा था, जो काफी हद तक सरकार के काबू से बाहर था और भाषा के अलावा जिसकी और कोई हद नहीं थी। ऐसे में इसका असर बाकी अरब देशों पर पड़ना लाजमी था। इसका पहला झटका इजिप्ट को लगा, जहां होस्नी मुबारक बेन अली के भी पहले से, पूरे तीस वर्षों से सत्ता पर काबिज था। वहां राजधानी काहिरा के विशाल मैदान तहरीर चौक पर 25 जनवरी 2011 को जनता का इतना बड़ा जमावड़ा लगा कि मुबारक की विदाई उसी दिन तय हो गई। 


अरब देशों के इस जन-विद्रोह को ‘अरब स्प्रिंग’ का नाम इसी दिन दिया गया और दुनिया भर के संचार माध्यमों में इसे भरपूर कवरेज भी तभी से मिलनी शुरू हुई। इसके ग्लोबल प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि अप्रैल 2011 में भारत में शुरू हुए जन लोकपाल आंदोलन में जंतर-मंतर की तुलना तहरीर चौक से अक्सर की जाती थी। देखते-देखते अरब के इस राजनीतिक वसंत का असर लीबिया, अल्जीरिया, मोरक्को, सूडान, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन, फलस्तीन, इराक, कुवैत, सऊदी अरब, बहरीन, ओमान और यमन तक दिखने लगा, हालांकि इसकी जमीनी शक्ल हर जगह अलग थी। 


लगातार 18 दिन के उग्र प्रदर्शन के बाद 11 फरवरी 2010 को इजिप्ट के तानाशाह होस्नी मुबारक ने गद्दी छोड़ी। लीबिया में 38 साल से कायम मुअम्मर गद्दाफी की सत्ता का आधार कबीलाई स्वामिभक्ति वाला था, लिहाजा वहां बाकी कबीलों ने बगावत की और छह महीने चले गृहयुद्ध के बाद 23 अगस्त 2011 को उसे सत्ता से हटाने में कामयाबी हासिल की। इसके भी तीन महीने बाद उसके गृहनगर सिर्ते में उसे भेस बदलकर भागते हुए पकड़ा गया और बड़ी बुरी मौत मारा गया। अफसोस कि लीबिया में अरब स्प्रिंग के साथ शुरू हुआ गृहयुद्ध अबतक जारी है। यमन में 22 साल से सत्तासीन अली अब्दुल्ला सालेह ने सत्ता छोड़ने में देर की और फरवरी 2012 में शिया-सुन्नी टकराव अपने पीछे छोड़ गया।


बाकी अरब देशों में से कुछेक में शासकों ने जल्द ही सत्ता छोड़ने की बात कहकर अपनी जान बचाई। 22 साल से सत्ता पर काबिज सूडान के राष्ट्रपति उमर अल बशीर ने घोषणा की कि वह 2015 में होने वाला अगला चुनाव नहीं लड़ेगा। बाद में वह अपनी बात से पलट गया और कुल 30 साल राज करने के बाद 2019 में फौजी तख्तापलट के जरिये सत्ता से हटाया गया। इराक के प्रो-अमेरिकन प्रधानमंत्री  नूरी अल-मलिकी को वहीं के वहीं इस्तीफा दिलवाने के लिए कई उग्र आंदोलन 2011 में चले जबकि वह 2014 का चुनाव न लड़ने की बात कहता रहा। जॉर्डन में सरकार विरोधी आंदोलनों के प्रभाव में कुल चार सरकारें किंग अब्दुल्ला ने बर्खास्त कीं और कुवैत में प्रधानमंत्री नासिर अल सबाह को अपनी कैबिनेट समेत इस्तीफा देना पड़ा। इतने सारे सर्वसत्तावादी शासकों को धूल चटाने में कामयाबी इतने कम समय और इतने बड़े भूगोल में शायद ही किसी स्वतःस्फूर्त जन आंदोलन को हासिल हुई हो।


बहरहाल, अरब स्प्रिंग की नाकामियां इन कामयाबियों से काफी बड़ी हैं। सीरिया और इराक, दोनों देशों की शिया बहुल सत्ताओं के खिलाफ 2011 में जाहिर आक्रोश में एक सुन्नी रंग भी मौजूद था, जिसके लिए बदलाव का अर्थ कुछ और था। समाज के इस हिस्से ने कहीं अलकायदा तो कहीं इस्लामिक स्टेट के झंडे के नीचे बगावत की और 2015 आते-आते इसका हत्यारा, सांप्रदायिक चेहरा जगजाहिर होने लगा। इससे भी अफसोसनाक बात यह कि सऊदी अरब, तुर्की और बराक ओबामा की अमेरिकी सत्ता ने लगातार किसी न किसी स्तर पर इस्लामिक स्टेट को अपना समर्थन दिया। इस गिरोह ने पूरे अरब विश्व में गैर-सुन्नी आबादी के खिलाफ कई बर्बर जनसंहारों को अंजाम दिया और सिर्फ पांच साल में अरब स्प्रिंग की भावना को सुदूर अतीत की चीज बना दिया। 


यह सिलसिला आगे भी जारी रहता, लेकिन 2016 में रूसी हस्तक्षेप से इस्लामिक स्टेट के मददगारों की पोलपट्टी खुल गई। सबक यह कि बड़े दायरे का कोई भी जन आंदोलन चाहे कितनी भी वाजिब मांगों और पवित्र इरादों के साथ शुरू किया गया हो, उसे लोगों के धार्मिक पूर्वाग्रहों को लेकर हमेशा सतर्क रहना चाहिए। बाहर खड़ी ताकतें, चाहे वे कितनी भी पाक-साफ क्यों न लगती हों, अपने छोटे-मोटे फायदों के लिए भी उनके सारे किए-धरे पर पानी फेर सकती हैं, इस बात को लेकर भी ऐसे आंदोलनों को हमेशा सजग रहना चाहिए। अतीत के उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन या अन्य लोकतांत्रिक आंदोलनों की तरह कोई संगठित वैचारिक नेतृत्व नए जन आंदोलनों में नहीं दिखाई पड़ता। यह शुरू में भले ही इनकी ताकत लगता हो लेकिन बाद में इनकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित होता है। जाहिर है, विचारधारा और सांगठनिक नेतृत्व से इनकी एलर्जी का समाधान समय रहते खोज लिया जाना चाहिए।

लेख आज 27 जनवरी को नव भारत टाइम्स में  में छपा है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें