मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

व्यंग्य लेखन / विवेक रंजन श्रीवास्तव i

 : वाकई किसी चीज के सीखने की कोई उम्र नहीं होती. खासकर व्यंग्य.


आज का स्वाल बिलकुल ग्रुप के नाम के माफिक और हम हमेशा आपसे और समूह के बाकी साथियो से सीखने के लिए तत्पर हैं. साथी इसलिए क्योंकि जंग में कोई छोटा और बड़ा नहीं होता सबकी भूमिका बराबर होती है. अब बात करते हैं व्यंग्य की. जहाँ तक मेरी समझ है. व्यंग्य समाज में व्याप्त विसंगतियों पर आलोचनात्मक प्रहार है. व्यंग्य में ही इतनी ताकत है जो बड़ी से बड़ी तानाशाही सत्ता का तख्ता पलट सकती है. यह अवाम की चेतना उन्नत कर सकती है. कम शब्दों में कहें तो व्यंग्य की काम उस सुई की तरह है जहां तलवार काम नहीं आती. हर रचना लिखने का अपना एक मकसद होता है और अपना पक्ष. हम किसके पक्ष में खड़े हैं वही माइने रखता है. आरिफा एविस [12/15, 18:14] +91 99814 11097: व्यंग्य हमारे चारों तरफ के निजी , सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक और धर्मिक ,सांस्कृतिक परिदृश्य में व्याप्त मानव निर्मित विसंगतियों की सूक्ष्म पड़ताल करते हुए उन पर इस तरह से वैचारिक प्रहार की रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करना है , जिससे जनमानस उन विसंगतियों और उनके लिए जिमेदार लोगों के प्रति एक वितृष्णा से भर उठे और लोगों में उनमें परिवर्तन की चेतना जागृत हो । व्यंग्य एक सोद्देश्य परिवर्तनकामी लेखन है । व्यंग्य लेखक की जनपक्षधरता तय होनी चाहिए । उसे हर हाल में समाज के शोषित पीड़ित वर्ग के साथ खुद को खड़ा करना होगा । व्यंग्य किसी भी तरह की सत्ता चाहे वह ईश्वरीय ही क्यों न हो , अगर वह शोषण का औजर बनती है तो उससे टकराने और उससे मुठभेड़ करने का रचनात्मक उपक्रम है । [12/15, 19:08] +91 95822 73875: ‘व्यंग्य क्या होता है’ प्रश्न पर चार-पाँच प्रतिक्रियाएँ आईं, जो उम्मीद से ज्यादा रहीं. असल में व्यंग्य लिखना और व्यंग्य के बारे में लिखना दो अलग-अलग बातें हैं, जिन्हें एक ही व्यक्ति द्वारा लिखे जाने की उम्मीद करना ज्यादती है. मुर्गी अंडे दे दे, यही बहुत है, वह अंडे के बारे में जानती भी हो, आवश्यक नहीं—यह एक आम मान्यता है. लेकिन सच यह है कि अंडे के बारे में मुर्गी से अधिक कोई नहीं जानता और न ही उसे देने की प्रक्रिया में. और जो जानता है, वह बता भी सकता है. बता सिर्फ वह नहीं सकता, जो नहीं जानता. मुर्गी भी अपनी भाषा और व्यवहार से बताती है, बशर्ते आप समझ सकें. खैर, व्यंग्य के बारे में चर्चा करने का यह लाभ है कि अगर आप उसके बारे में जानते हों, तो आप बेहतर व्यंग्य लिख सकेंगे. वैसे ही, जैसे वाहन का चालक अगर मैकेनिक भी हो, तो उसे बेहतर ढंग से चलाता है. पेट्रोल कम खर्च होता है, कल-पुर्जे व्यर्थ नहीं घिसते और दुर्घटना होने की सभावना नहीं रहती. आप सही-सलामत मंजिल पर पहुंच जाते हैं. बहरहाल, उन पाँच-छह प्रतितिक्रियाओं में से दो तो ब्रजेश कानूनगो और कमलेश पांडेय जी द्वारा पहले से लिखे हुए विस्तृत लेख थे. उन्होंने हनुमान जी द्वारा पूरा द्रोणागिरि पर्वत उठा लाने का एहसास कराया, जिस पर हर मर्ज की दवा मौजूद है. सुनीता शानू जी ने व्यंग्य के बारे में बताया कि वह गाली या कीचड़ नहीं है, लेकिन व्यंग्य में तो गाली खूब आ रही है और कुछ व्यंग्यकार तो प्रसिद्ध ही इस बात के लिए हैं. व्यंग्य के नाम पर दूसरों पर कीचड़ भी खूब पोता जा रहा है, एक-दो व्यंग्यकार तो काम ही यही करते हैं. आज उनका किसी व्यंग्यकार से मनमुटाव हुआ, कल उस पर कीचड़ पोतता उनका व्यंग्य फेसबुक पर हाजिर! इसी को व्यक्तिगत व्यंग्य कहते हैं, हालाँकि भुवनेश्वर उपाध्याय ने जिस व्यक्तिगत व्यंग्य की तारीफ में लिखा है, वह शायद इससे अलग है. लेकिन फिर, अगर व्यंग्य गाली या कीचड़ नहीं है, तो क्या कहानी, कविता, नाटक आदि गाली और कीचड़ हैं? और अगर कहानी, कविता, नाटक आदि भी गाली और कीचड़ नहीं हैं और वे भी टूटे रिश्तों को जोड़ते हैं और अँधेरी राहों में रोशनी दिखाते हैं, जो कि दिखाते ही हैं, तो व्यंग्य जरूर इनसे किसी अन्य बात में अलग है. सबसे बढ़िया प्रतिक्रिया रही हरदिल अजीज जैनेंद्र कुमार झांब जी की, जिन्होंने बताया कि “विसंगतियों को नंगा कर लैंप पोस्ट के नीचे ला पटकने को व्यंग्य कहते हैं।” इसमें सिर्फ यही समस्या है कि यदि विसंगतियों ने इसमें सहयोग न किया, तो? पूरी मान-मनौवल लल्लो-चप्पो के बाद भी उन्होंने नंगा होने से मना कर दिया, तो? जोर-जबरदस्ती करने पर दुत्कारकर भगा दिया, तो? और तो और, यदि विसंगतियाँ व्यंग्यकार पर ही भारी पडीं और उन्होंने उलटा व्यंग्यकार को ही नंगा कर दिया, तो? और अगर किसी तरह से व्यंग्यकार विसंतियों को नंगा करने में कामयाब हो भी गया, पर आसपास कोई लैंपपोस्ट न मिला, तो? और मान लो, लैंपपोस्ट भी मिल गया, लेकिन अगर व्यंग्यकार विसंगतियों को उठाकर पटक न पाया, तो? और भी खराब बात, कि अगर विसंगतियों ने ही उसे उठाकर पटक दिया, तो? और अंतिम बात यह, कि व्यंग्यकार अगर विसंगतियों को नंगा करने, उन्हें उसी हालत में लैंपपोस्ट तक घसीटकर लाने और उसके नीचे उठाकर पटकने में कामयाब तो हो जाए, पर बाद में पता चले कि जिन्हें वह विसंगतियाँ समझ रहा था, वे विसंगतियाँ थीं ही नहीं? या विसंगतियाँ थीं भी, तो पेड़ की पत्तियों की तरह थीं, जड़ की तरह नहीं? तो इस परिभाषा में कुछ ‘क्लू’ छिपे हैं. पहली बात, विसंगति की सही पहचान. विसंगति यानी क्या? एकदम ताजा उदाहरण लें, तो क्या बीसियों दिन से दिल्ली को घेरे बैठे किसान विसंगति हैं? या उन्हें इसके लिए मजबूर कर देने वाले विसंगति हैं? क्योंकि व्यंग्यकारों में से कुछ किसानों को विसंगति मान रहे हैं, तो कुछ उन्हें इस हालत में पहुँचाने वालों को. और दोनों तो विसंगति हो नहीं सकते, हालाँकि कुछ व्यंग्यकार दोनों को ही विसंगति मान रहे हों, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. तो कैसे पहचानें कि विसंगति क्या है? यह पहचान दृष्टि देती है. दृष्टि, जो बताती है कि सही क्या है और गलत क्या? जो पत्तियों पर ही नहीं अटकाती, बल्कि समस्या के मूल तक ले जाती है. और जिसके पास दृष्टि नहीं होती, उसे क्या कहा जाता है? जिस व्यंग्यकार के पास यह दृष्टि नहीं होती, वह कितना भी बड़ा ‘लड़ैया’ क्यों न हो, अंधे की तरह उलटी तरफ ही वार करता रहता है, अपने पक्ष को ही हानि पहुँचाता रहता है, और अज्ञानतावश उस पर गर्व भी करता रहता है. यह दृष्टि ही व्यंग्यकार को विसगतियों का एक अलग तरह से नजारा करने का, एक अलग तरह से देखने का कौशल प्रदान करती है, जिस तरह से किसी भी अन्य विधा का लेखक नहीं कर पाता, और जिसे वक्र दृष्टि या टेढ़ी नजर कहा जाता है; और यह दृष्टि ही उसे वह नजरिया प्रदान करती है, जिससे वह सही-गलत की पहचान कर पाता है, सही विसंगति की पहचान कर पाता है, अपना पक्ष तय कर पाता है. और एक बार विसंगति का पता चल जाने पर उसे उठाकर पटकना कौन-सा मुश्किल है? यह ‘पटकना’ व्यंग्य के सौष्ठव यानी कला-पक्ष से ताल्लुक रखता है, जिसके बारे में फिर कभी. सुरेश कांत [12/15, 19:18] +91 70003 75798: "मेरे लिये व्यंग्य वैचारिक यज्ञ है ... "व से वैचारिक य से यज्ञ" , अभिव्यक्ति की समिधा पर शाब्दिक आहुतियां ". जिनका ताप समाज को किंचित परिष्कार दे सके यह सोच होनी चाहिए । आहुति की सुगंध कुछ मधुरता पाठकीय वातावरण में घोल सके । पर दुख है कि आज हो यह रहा है कि लिखने वाले केवल छपने के लिए औऱ पढ़ने वाले केवल मनोरंजन के लिए व्यंग्य का प्रयोग करते दिखते हैं। ...🙏🙏🙏✌️👌

 विवेक रंजन श्रीवास्तव

🙏🙏🙏🙏🙏✌️✌️✌️✌️✌️✌️👌👌👌👌😀😀

1 टिप्पणी:

  1. यह संचयन अच्छा कर दिया आपने वरना व्हाट्सएप पोस्ट तो जल्दी ही मिटा दी जातीं हैं ।

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