शनिवार, 19 दिसंबर 2020

गड्ढा / नदीम

 गड्ढा ,,,,, / नदीम 


 मोटरसाइकिल का अगला पहिया जैसे ही पानी में उतरा खटाक से आधा पहिया गड्ढे में धंस गया ।

 बड़ी मुश्किल से बाइक संभाली लेकिन फिर भी सड़क पर गिर गई ।

तभी कहीं से हंसने की धीमी सी आवाज आई ,

 मैंने चौंक कर चारों तरफ देखा

 कौन असामाजिक तत्व मेरी बदतर हालत पर हंस रहा है ?

 तभी ध्यान गड्ढे की तरफ गया हंसी गड्ढे में से आ रही थी मैंने मोटरसाइकिल खड़ी करते हुए आग बबूला होकर गड्ढे की तरफ देखा ।


अबे तू हंस रहा है ?


 क्यों अब हम अपने देश में हंसे भी नहीं 

गड्ढे ने संबित पात्रा के अंदाज में कहा ।


 शर्म नहीं आती तुम्हें लोगों को चोट पहुंचाते हुए

 जान भी ले लेते हो ,

 और फिर बेशर्म बनकर हंस रहे हो 

 नगर पालिका की नाजायज औलादों ।


 गड्ढा आंखें तरेर कर बोला देखो जी औलाद तो हम नगरपालिका की ही है 

लेकिन एकदम जायज , वह हमें माता पिता की तरहं पाल पोस कर बड़ा करते हैं , सर्दी गर्मियों में हम देश के विकास की तरह छोटे होते हैं ।

लेकिन संसद का मानसून सत्र आते आते हैं हम जवान हो जाते हैं

 और फिर तुम विपक्ष की तरह हम को दोष क्यों दे रहे हो बे ,  हम कोई देश की बेरोजगारी महंगाई और भ्रष्टाचार थोड़ी है जो खत्म ही ना हों

 जरा हिंदू मुसलमान , गाय , तलाक , पाकिस्तान ,मंदिर मस्जिद से ध्यान हटा कर सड़कों पर भी दो तो हम जैसे खतपतवार उगें ही क्यों बे।

 अच्छा सुन बदहवास से इंसान तेरा नाम क्या है गड्ढा बोला

 मैंने गुस्से में कहा क्यों मेरा नाम जानकर क्या करना है तुझे मामूली से गड्ढे ।


 यह सुनकर गड्ढा चिढ़ गया और बोला  देखो हमें मामूली कहकर लालकृष्ण आडवाणी मत समझो 

बहुत सी सड़कों के गड्ढों के साथ हमारा गठबंधन है ।


 हां तो क्या नाम है तुम्हारा ?


अरे नदीम नाम है मेरा , अब बोल 


 अच्छा तो मुल्ले हो ,, अब बोलने के लिए बचा ही क्या है तुम तो पहले से ही हाशिए पर हो 

तुम्हें गिराने की तो देश में पहले से ही कितनी वजह  हैं हम गड्ढों  की क्या जरूरत है ?


 देखो  बे ढीठ गड्ढे  , तुम में और देशद्रोही में कोई फर्क नहीं , तुम भी इस मुल्क की सड़कों पर एक नासूर हो ।


यह सुनते ही गड्ढे का पानी उबलने लगा ,, देखो ख़ां साहब अब बहुत हो गया

 मैंने तो तुम्हें बक़्श दिया , लेकिन आगे रास्ते में हमारी बिरादरी के और भी खौफनाक गड्ढे पसरे पड़े हैं 

तुम तो क्या तुम्हारी आत्मा भी उनके अंदर से बाहर नहीं निकल पाएगी ।

 और यह सारा दोष हमें क्यों दे रहे हो दोष तुम्हारे सिस्टम का है जाओ पहले उसे सुधारो।

 तुम्हारा तो पूरा देश ही एक गड्ढे में पड़ा है जब कभी भी बोतल में से नेहरू का जिन्न निकाल कर  आरोप मढ़ते रहोगे या पुरानी सरकार को कोसते रहोगे 

अबे देश मैं हम गड्ढों की जनसंख्या ज्यादा है तुम्हारे काग़ज़ी विकास से।

 हमें देश पर नासूर कहने से पहले जाओ उस भीड़ के पास , जो एक निर्दोष को गौरक्षा के नाम पर मार देती है


 जाओ पहले उन झूठे राष्ट्रवादी नेताओं के पास जो देश की फिज़ाओं में धर्म जाति और नफरत का जहर घोल रहे हैं ।

 जाओ पहले उनके पास जो मानसून के लिए मेंढक मेंढकी की शादी करवाते हैं ।

 जाओ पहले उस डॉक्टर के पास जो पत्थर की मूर्तियों में धड़कन सुनता है ।

 जाओ पहले उन बलात्कारियों के पास जो मासूम जिंदगी को खिलने से पहले ही उजाड़ देते हैं ।

 जाओ पहले उन्हें धर्म और मज़हब के ठेकेदारों के पास जो मासूमों के हाथ में हथियार पकड़ा कर इंसानियत को शर्मसार करते हैं ।


 मेरे भाई पहले देश की छाती पर बने इन विशाल गड्ढों को भरो ।

 हम सड़क के गड्ढों का क्या है जनाब यह तो जरा सी मिट्टी डालने से ही भर जाएंगे ।

दोष हम गड्ढों का नहीं है गड्ढे करने वालों का है भाई ।


गड्ढे का पानी शांत हो चुका था ,,

मैंने अपने आत्म गिलानी से भीगे शरीर को देखा , और मोटरसाइकिल पर किक मारी

 परंतु उसने भी जैसे देश की अर्थव्यवस्था की तरह आगे ना बढ़ने की कसम खा रखी थी ।


मैं बाइक को धक्का मार सरकार की तरह घसीटते हुए आगे बढ़ा , यह कहते हुए ,,

चल मेरी धन्नो ,,

 अभी विकास का रास्ता बहुत लंबा है ।


नदीम ,, ,, 


 मोटरसाइकिल का अगला पहिया जैसे ही पानी में उतरा खटाक से आधा पहिया गड्ढे में धंस गया ।

 बड़ी मुश्किल से बाइक संभाली लेकिन फिर भी सड़क पर गिर गई ।

तभी कहीं से हंसने की धीमी सी आवाज आई ,

 मैंने चौंक कर चारों तरफ देखा

 कौन असामाजिक तत्व मेरी बदतर हालत पर हंस रहा है ?

 तभी ध्यान गड्ढे की तरफ गया हंसी गड्ढे में से आ रही थी मैंने मोटरसाइकिल खड़ी करते हुए आग बबूला होकर गड्ढे की तरफ देखा ।


अबे तू हंस रहा है ?


 क्यों अब हम अपने देश में हंसे भी नहीं 

गड्ढे ने संबित पात्रा के अंदाज में कहा ।


 शर्म नहीं आती तुम्हें लोगों को चोट पहुंचाते हुए

 जान भी ले लेते हो ,

 और फिर बेशर्म बनकर हंस रहे हो 

 नगर पालिका की नाजायज औलादों ।


 गड्ढा आंखें तरेर कर बोला देखो जी औलाद तो हम नगरपालिका की ही है 

लेकिन एकदम जायज , वह हमें माता पिता की तरहं पाल पोस कर बड़ा करते हैं , सर्दी गर्मियों में हम देश के विकास की तरह छोटे होते हैं ।

लेकिन संसद का मानसून सत्र आते आते हैं हम जवान हो जाते हैं

 और फिर तुम विपक्ष की तरह हम को दोष क्यों दे रहे हो बे ,  हम कोई देश की बेरोजगारी महंगाई और भ्रष्टाचार थोड़ी है जो खत्म ही ना हों

 जरा हिंदू मुसलमान , गाय , तलाक , पाकिस्तान ,मंदिर मस्जिद से ध्यान हटा कर सड़कों पर भी दो तो हम जैसे खतपतवार उगें ही क्यों बे।

 अच्छा सुन बदहवास से इंसान तेरा नाम क्या है गड्ढा बोला

 मैंने गुस्से में कहा क्यों मेरा नाम जानकर क्या करना है तुझे मामूली से गड्ढे ।


 यह सुनकर गड्ढा चिढ़ गया और बोला  देखो हमें मामूली कहकर लालकृष्ण आडवाणी मत समझो 

बहुत सी सड़कों के गड्ढों के साथ हमारा गठबंधन है ।


 हां तो क्या नाम है तुम्हारा ?


अरे नदीम नाम है मेरा , अब बोल 


 अच्छा तो मुल्ले हो ,, अब बोलने के लिए बचा ही क्या है तुम तो पहले से ही हाशिए पर हो 

तुम्हें गिराने की तो देश में पहले से ही कितनी वजह  हैं हम गड्ढों  की क्या जरूरत है ?


 देखो  बे ढीठ गड्ढे  , तुम में और देशद्रोही में कोई फर्क नहीं , तुम भी इस मुल्क की सड़कों पर एक नासूर हो ।


यह सुनते ही गड्ढे का पानी उबलने लगा ,, देखो ख़ां साहब अब बहुत हो गया

 मैंने तो तुम्हें बक़्श दिया , लेकिन आगे रास्ते में हमारी बिरादरी के और भी खौफनाक गड्ढे पसरे पड़े हैं 

तुम तो क्या तुम्हारी आत्मा भी उनके अंदर से बाहर नहीं निकल पाएगी ।

 और यह सारा दोष हमें क्यों दे रहे हो दोष तुम्हारे सिस्टम का है जाओ पहले उसे सुधारो।

 तुम्हारा तो पूरा देश ही एक गड्ढे में पड़ा है जब कभी भी बोतल में से नेहरू का जिन्न निकाल कर  आरोप मढ़ते रहोगे या पुरानी सरकार को कोसते रहोगे 

अबे देश मैं हम गड्ढों की जनसंख्या ज्यादा है तुम्हारे काग़ज़ी विकास से।

 हमें देश पर नासूर कहने से पहले जाओ उस भीड़ के पास , जो एक निर्दोष को गौरक्षा के नाम पर मार देती है


 जाओ पहले उन झूठे राष्ट्रवादी नेताओं के पास जो देश की फिज़ाओं में धर्म जाति और नफरत का जहर घोल रहे हैं ।

 जाओ पहले उनके पास जो मानसून के लिए मेंढक मेंढकी की शादी करवाते हैं ।

 जाओ पहले उस डॉक्टर के पास जो पत्थर की मूर्तियों में धड़कन सुनता है ।

 जाओ पहले उन बलात्कारियों के पास जो मासूम जिंदगी को खिलने से पहले ही उजाड़ देते हैं ।

 जाओ पहले उन्हें धर्म और मज़हब के ठेकेदारों के पास जो मासूमों के हाथ में हथियार पकड़ा कर इंसानियत को शर्मसार करते हैं ।


 मेरे भाई पहले देश की छाती पर बने इन विशाल गड्ढों को भरो ।

 हम सड़क के गड्ढों का क्या है जनाब यह तो जरा सी मिट्टी डालने से ही भर जाएंगे ।

दोष हम गड्ढों का नहीं है गड्ढे करने वालों का है भाई ।


गड्ढे का पानी शांत हो चुका था ,,

मैंने अपने आत्म गिलानी से भीगे शरीर को देखा , और मोटरसाइकिल पर किक मारी

 परंतु उसने भी जैसे देश की अर्थव्यवस्था की तरह आगे ना बढ़ने की कसम खा रखी थी ।


मैं बाइक को धक्का मार सरकार की तरह घसीटते हुए आगे बढ़ा , यह कहते हुए ,,

चल मेरी धन्नो ,,

 अभी विकास का रास्ता बहुत लंबा है ।


नदीम ,,

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