रविवार, 6 दिसंबर 2020

रणेद्र के बहाने झारखण्ड के साहित्य जगत का अवलोकन / उदय वर्मा

कवि, कथाकार और उपन्यासकार रणेंद्र को श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मान


कवि, कथाकार और उपन्यासकार रणेंद्र को श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको सम्मानमिलना न केवल एक रचनाकार का बल्कि पूरे झारखंड के साहित्य जगत का सम्मान है। रणेंद्र झारखंड के उन चंद साहित्यकारों में एक हैं, जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर भी अच्छी पहचान है। रणेंद्र के साहित्य लेखन के केन्द्र में मूलत: आदिवासी जीवन का संघर्ष, हर्ष-विषाद और आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश की टूटती-जुड़ती श्रृंखला रहीं है, जिसे उन्होंने बड़े ही मनोयोग से शब्दाकार दिया है। उनकी रचनाओं के माध्यम से आधुनिक समय में आदिवासी जीवन में आ रहे बदलाव के तत्वों को भी समझा जा सकता है। 

रणेंद्र की साहित्य साधना मूलत: मानव मूल्यों की साधना है। वह अपनी रचनाओं  में बेमतलब की उष्मा पैदा करने में विश्वास नहीं रखते। सामपर्याढ़ंग से अपनी बात कहते हैं, और उसे विशिष्ट बनाने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते।

यही कारण है कि उनकी कहानियों और उपन्यासों के कथ्य वस्तुत: भव्य अर्थों के प्रलोभन में नहीं फंसते और नदी के स्वाभाविक प्रवाह की तरह आगे बढ़ते है। रणेंद्र के लेखन की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि विषयों के चुनाव में बेहद वह चौकन्ना नजर आते हैं,और उन्हें समकालीन या आधुनिक मूल्यों की कसौटी पर कसते हैं। नयापन और खुलापन उनके लेखन को पुष्ट करता है और उनके शब्द एक ऐसा संसार रचते हैं जिससे पाठक बिना झिझक जुड़ जाते हैं। वास्तव में उनकी यही विशेषता उन्हें बड़ा बनाता था।

  रणेंद्र आदिवासी जीवन के मूल्यों, संस्कारों और सांस्कृतिक परिवेश को नजदीक से देखाने और समझने वाले रचनाकार हैं। यही कारण है कि उनके लेखन में एक ओर आदिवासी जीवन की सरलता , निश्चलता और निष्कपटता के दर्शन होते हैं तो दूसरी ओर आम जीवन की  जटिल और तनावपूर्ण परिवेश भी रूपाकार होता है । वास्तव में रणेन्द्र की रचनाओं के माध्यम से न केवल आम भारतीय आदिवासी जीवन को समझने में आसानी होती है, बल्कि नगरीय संस्कृति की जटिल परतों को खोलने का सरल रास्ता भी मिल जाता है।

आमतौर पर लेखक अपनी कथा सृजन यात्रा में अपने पात्रों के साथ जुड़ जाता है और बहुत बार तो उसी की तरह जीने लगता है।लेकिन ऐसा बहुत कम बार होता है जब पाठक किसी कृति को पढ़ते हुए उसके कथ्य और पात्रों से एकाकार हो जाता है और उसे जीने लगता है। रणेंद्र की अधिकतर कृतियों की यह विशेषता है कि वे अपने तथ्य, कथ्य, वातावरण और प्रस्तुति के वैशिष्ठ के बलबूते पाठकों को अपनी ओर खींचती है और उसे पूरी सहजता के साथ अपने से जोड़ लेती हैं और एक ऐसी दुनिया में ले जाती हैं जिसे लेखक अपने पाठकों को दिखलाना, समझाना चाहता है।

लेखन को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानने वाले रणेंद्र अपनी लेखन यात्रा में हर नयी कृति के साथ अपनी उपलब्धियों में एक नया आयाम जोड़ते रहे हैं। ग्लोबल गांव के देवता, गायब होता देश, गूंगी रु लाई दा कोरस, रात बाकी, छप्पन छुरी, बृहत्तर पेंच और थोड़ा सा स्री होना चाहता हूं आदि कृतियों के माध्यम से साहित्य परिसर में  जो वौद्धिक हलचल और सामाजिक एवं नैतिक बहसें पैदा की हैं, उनकी थपथपाहट लंबे समय  तक सुनाई देती रहेगी।

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