बुधवार, 16 दिसंबर 2020

अधिकतम समर्थन मूल्य

 आज के जनवाणी में मेरा व्यंग्य पढिए।कुछ कटौती हुई है।मूल पाठ जरूर पढ़ें।

अधिकतम समर्थन  मूल्य


 कोलंबस ने भारत को खोजते खोजते अमेरिका को ढूंढ निकाला था ।सरकार और भक्तों ने अच्छे दिन और आत्मनिर्भर भारत को खोजते खोजते क्रांतिकारी कृषि विधेयकों के समर्थकों को ढूंढ निकाला है ।एक नहीं बल्कि पूरे पंद्रह  किसान संगठन इनके समर्थन में आ गए हैं ।आप भी इनका समर्थन कर मंत्री जी से मुलाकात का अवसर इस आपदा में भी पा सकते हैं ।यह भी अच्छा है कि कम से कम कानून बनने के कुछ महीनों के भीतर ही समर्थकों को ढूंढ निकाला  गया है। सरकार यह बताने में असमर्थ है कि किन किसानों या किसान संगठन ने इन कृषि सुधारों की मांग या सिफारिश की थी ।इन क्रांतिकारी सुधारों के पैरोकार यह जरूर बताते हैं कि इस आंदोलन में बड़े किसान और बिचौलिए शामिल हैं और इसे अर्बन नक्सली,खालिस्तानी  और विदेशी शक्तियों द्वारा चलाया जा रहा है ।इन विधेयकों के प्रावधानों पर वे कोई भी बात नहीं कर रहे हैं। गतिरोध खत्म करने के प्रयास किए जा रहे हैं। किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य चाहते हैं। तभी किसी बिचौलिए ने अपना प्रस्ताव दिया -क्यों न किसानों को इन विधेयकों  के समर्थन के लिए अधिकतम समर्थन मूल्य दिया जाए। आप भी विचार कीजिए कि क्या इस पर विचार किया जाना चाहिए। हम गलतियों से ही सीखते हैं और सरकार भी इसमें पीछे नहीं है ।भूमि अधिग्रहण विधेयक कुछ भले और विश्वस्त साथियों की खातिर लाया गया था परंतु इसका पुरजोर विरोध हुआ और इसे वापस लेना पड़ा । दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है।इस बार सोच समझकर कोरोना आपदा  को अवसर बनाकर अध्यादेश लाया गया और बाद में घोर विरोध के बाद भी संसद द्वारा पारित करवाया गया। इस फैसले को केवल अवसरवादिता कहना शायद ठीक नहीं है क्योंकि इसमें  उनकी दूरदृष्टि भी थी ।कानून बनने के पहले ही भंडारण की व्यवस्था साथियों द्वारा कर ली गई थी। कहा जाता है "एवरी क्लाउड हैज़ सिल्वर लाइनिंग ",इन विधेयकों में सब कुछ बुरा नहीं है। देश की संपत्ति को दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाने वाले कारपोरेट  का भी लोग गुणगान करने लगे हैं। फिलहाल देश की केवल 21% संपत्ति इन  एक प्रतिशत भले लोगों के पास ही है और वे उतनी भलाई नहीं कर पा रहे हैं। हो सकता है इन विधेयकों  के पश्चात इनकी संपत्ति 21% से बढ़कर 50% हो जाए और हमारे महान देश का कुछ भला हो  जाए। यह भी बताया जाता है  कि किसान पूरे देश में कहीं भी अपनी  फसल बेच  सकेगा। क्या पहले वह ऐसा नहीं कर सकता था ? यह भी वे नहीं  बताते हैं कि बिहार में पिछले 14 वर्षों से यह व्यवस्था लागू है ।बिहार के किसानों की खुशहाली को उजागर किया जाना चाहिए। किसान को छोड़कर बाकी सभी लोग इन विधेयकों के समर्थन  में कूद पड़े हैं ।बासमती चखने वाले गुरमटिया का फायदा गिना रहे हैं ।इसी तरह इन कृषि सुधारों पर एक किसान और एक जनप्रतिनिधि में चर्चा हो रही है। किसान- क्यों नहीं सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दे देती। जनप्रतिनिधि- जब हमारे जैसे लोग पाला बदलकर दूसरे पक्ष को समर्थन देते हैं तो हमें भी न्यूनतम समर्थन मूल्य कभी कभार ही मिलता है ।तुम यह जान लो जिस दिन हमारा अधिकतम समर्थन मूल्य निर्धारित हो जाएगा उसी दिन तुम्हें भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मिलेगी अन्यथा नहीं। विरोधियों का मानना है की ये कृषि विधेयक सरकार की दाढ़ी में तिनका है परंतु इसके समर्थक इन्हें सरकार के चेहरे पर काला  टीका या तिल मानते हैं और सोचते हैं कि इस जन कल्याणकारी सरकार को किसी की नजर न  लगे ।आप जानते हैं कि तिल का ताड़ बनने में देर नहीं लगती और ताड़ अधिक होने से बरसात भी अच्छी होती है, अधिक बरसात से सैलाब भी आएगा ही और यह सैलाब सब कुछ बहा ले जाएगा ।अतः अहम  छोड़कर इन विधेयकों  को वापस लेना चाहिए ताकि अन्नदाता व देश का कम नुकसान हो।

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