शनिवार, 26 दिसंबर 2020

व्यंग्य शाला के कहकहे

 टीका टिप्पणी


 तीनों छोटे-छोटे व्यंग्य बेशक हैं, लेकिन कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह गए हैं। आपका चुनाव सचमुच बहुत बढिय़ा है। 

अच्छे लोगों को भगवान जल्दी बुला लेता है,... फिर भी लोग बड़ी उम्र की दुआ मांगते हैं।

जो लोग रिश्ता पक्का होने पर नहीं तोड़ पा रहे..।सगाई होने पर कैसे तोड़ेगें। हमारे देश की विडंबना ही है , लोग क्या कहेंगे... झूठी शान की खातिर औलाद की बलि दे देते हैं।

तीसरी रचना तो है ही जोरदार, रेशमी फंदे में झूलते मूर्ख लोग।लालच ने हमेंशा राज किया है।

एक अंतिम रचना भी सच्चाई है बहुत बड़ी। कभी-कभी सच पर झूठ इस कदर हावी हो जाता है कि स्वाभिमान को खो देता है, फिर झूठ ही सच मान लिया जाता है।

बहुत बधाई जैनेन्द्र जी। आशा है और पढने को सीखने को मिलता रहेगा।


किसान बनाम राजा


बात बहुत पुरानी है जितनी पुरानी है अब उतनी नई हो चुकी है.

एक राजा हुआ, राजा था तो शिकार पर अमले के साथ जाना ठहरा, वहां रास्ता भूलना ठहरा, वहां एक किसान की झोपड़ी होनी हुई.

राजा पहुंचा झोपड़ी तक आवाज़ दी, किसान निकला, पहचान लिया राजा हुज़ूर हैं. आदर सत्कार से बैठाया, हाथ पाँव धुलाये, बिस्तर लगाया, खाने का पुछा.

राजा ठहरा राजा, गरीब के घर नाक भौन्ह सिकोड़ी, मोटा अनाज कैसे गले उतरेगा, बोला दूध पिला दो खाने की इच्छा नहीं है. किसान ने बेटी को बुलाया गाय दोह कर दूध लाने को कहा. लड़की पतीला ले गई दूध लाकर राजा को पेश किया. शुद्ध ताज़ा गाढ़ा गाय का दूध पीकर राजा तृप्त हुआ. ऐसा दूध राजा ने कभी नहीं पिया था. सोया तो सोचने लगा मेरा देश, मेरी ज़मीन, मेरी प्रजा ये अच्छा दूध पिएं, जाते ही दूध पर टैक्स लगाऊंगा, सोच कर राजा सो गया.सुबह उठा तो किसान ने सेवा की पुछा क्या पेश करूँ. राजा बोला दूध. किसान की बेटी दूध दोहने गई, गाय ने दूध दिया ही नहीं.

बेटी ने पिता को बुलाया, पिता जी राजा की नियत में खोट है, गाय दूध नहीं दे रही. उधर राजा ने छुप कर बातें सुन लीं थी. राजा बहुत शर्मिंदा हुआ किसान की बेटी से बोला मैं रात को दूध पर टैक्स लगाने की सोच रहा था पर तुम्हारी बात सुनकर वायदा करता हूं दूध पर कभी टैक्स नहीं लगाया जायेगा. जाओ दूध निकाल लाओ.

किसान की बेटी गयी गाय ने दूध दे दिया, राजा ने दूध पिया, तब तक राजा का अमला भी आ गया. राजा अपनी राजधानी चला गया, अपने वायदे के अनुसार कभी दूध पर टैक्स नहीं लगाया.

ताजी कहानी में रहा वोट पाने के चक्कर में किसान की झोपड़ी में गया, किसान ने उसे खाना खिलाया, खाना खाकर राजा अफर गया. किसान को तो अनाज, दालें, सब्ज़ी, दूध तो खरीदने ही नहीं पड़ते. इसकी ज़मीन पर मेरा और दोस्तों हक़ है. राजधानी में लौट कर उसने किसान कानून बनाया और लागू कर दिया. किसान को पता चला तो उसने विरोध किया.


 सुप्रभात

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आज की सुबह

 बेहद सुकून लेकर आई है

तुम्हारे सुप्रभात के

उत्तर के साथ

उम्मीदों की कोपलें 

 अभी भी हैं वैसी ही नरम

प्रेम की नमी 

सूखने से बच गई 

कल रात हुये उल्कापात से

हमारे भीतर बहते हुए 

रिश्तों के झरने 

बेआवाज बहकर भी

मचाते रहते हैं

एक शोर

जिसे महसूस करती है धरती 

अपने सीने में 

तुमने बीती और बीती से भी बीती रात को

रोपा था जो 

बांध के रिसते पानी को 

अपने हाथों से भरकर 

जो मुठ्ठी मुट्ठी रेत से 

और चाँद के गाल पर

लगाया था 

जो काला टीका

नदी में फेंके थे जो कंकड़

और फटते हुए आसमान की 

नीली चादर में

डाली थी जो सीवन

चटक रंगों को घोलकर

बनाया था जो 

अलग रंग 

सब कुछ दिख रहा 

सुबह के इस उजाले में 

साफ साफ 

ये भी 

कि दिनों की शुरुआतें 

इसी तरह बनती हैं

खुशगवार


व्यंग्य. आज अमर उजाला में👇


आंदोलनः मेरा आत्मज्ञान



’’सरकार ने वादा किया था पांचवें दिन का, किसी से सुन लिया होगा कि दुनिया चार दिनों की है।‘‘ कदाचित इसी फलसफे की वजह से, बीते दिनों आंदोलनों का आलम पुरजोर रहा। कोविड की तरह इसके भी आगे के आसार अच्छे नज़र नहीं आ रहे हैं। आवाम बेज़ार है, उसके पास इसके प्रतिकार की कोई राह नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने कभी निर्णय दिया था कि विरोध प्रदर्शन के तरीके प्रजातांत्रिक और अहिंसक हों। उनसे जनता को कष्ट न पहुंचे। लेकिन उस फैसले की तामील कौन कराये? सवाल बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा हो गया है।

बहरहाल, इस खाकसार ने इस मुद्धे पर भारी चिंतन-मनन किया है और जो आत्मज्ञान इस नाचीज़ को प्राप्त हुआ है, उसका सारभूत यह है कि मुझे विरोध प्रदर्शनों, हड़तालों, धरनों, बंद आदि से हो रही हानि के प्रति आंख मूंद लेनी चाहिए और पाठकों  को इसके लाभ बता देने चाहिए। फ़िलवक्त, मैंने कुछ लाभ खोज लिए हैं और उन्हें निम्नवत् पेश कर रहा हूं, गर आप चिंतन करेंगे तो कुछ मोती आपको भी हाथ लग सकते हैंः-

- जनता को यह जानकारी हो जाती है कि देश में सरकार से इतर भी ताकतवर शख्सियतों का कोई वजूद है।

-प्रदर्शनों के दौरान लगाये जा रहे नारों से यह विदित होता है कि संबोधित सरकार कतई नाकारा है और वह उनकी आशाओं के अनुरूप सिद्ध नहीं हुई। मुझे आंदोलनों के इतिहास के अध्ययन से यह जानकारी मिली है कि पूर्ववर्ती सरकारों के विरूद्व भी ऐसे ही नारे लगते रहे और अगामी के लिए भी लगते रहेंगे। 

-भय, भूख, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मंहगाई से त्रस्त आमजन को उथल-पुथल के समाचार प्राप्त होते हैं और उसका मन बहल जाता है।

-दंगाग्रस्त इलाकों में कफर््यू लग जाने से छोटा से छोटा कस्बा या गांव भी मीडिया के प्रचार प्रसार के जरिए नाम कमा जाता है। लोगों को सुकून की प्रतीति होती है कि घर तो फुंका पर चर्चा तो हुआ। - हाशिए पर हो गये पुराने नेताओं को छा जाने का अवसर मिलता है। उन्हें वक्तव्य झाड़ने तथा प्रेस-कांफ्रेंस करने के मौके मिलते हैं। जिनकी प्रतिष्ठाएं गुड़गोबर हो चुकी हैं गुड़ के साथ गुलगुले खाने का अवसर भी मिल जाता है। आमजन में से कुछ लोगों को युवा हिरदे सम्राट के रूप में उभरने का मौका मिलता है।

-पत्रकारों और छायाकारों को बेवज़ह भटकना नहीं पड़ता। एक स्थान से ही लीड-न्यूज उपलब्ध हो जाती है।

-भाषणबाजों को भाषण झाड़ने तथा पुलिसियों को लाठी भांजने के असीमित अवसर मिलते हैं। गलाफाड़ नारेबाजी से कंठादि में जमा बलगम तो बाहर आता ही है, संग में फेफड़ों की कसरत भी मुफ्त में हो जाती है। धरनाधारियों को खुली हवा की ऑक्सीजन का लाभ प्राप्त होता है। अनशन और नृत्यादि से बदन में बर्षों से जमी फालतू चर्बी छंट जाती है। प्रिंट तथा इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर दिखाई देने का अवसर मिलता है।

-लाउड स्पीकर वालों, पुतला निर्माताओं, टेंट वालों, पेंटरों तथा जाम या धरना स्थल के निकटवर्ती फुटकर विक्रेताओं की चंादी हो जाती है। यदा कदा बैंड-बाजे वालों की बन आती है।

अब, बताइये कि क्या आप मेरे आत्मज्ञान से सहमत हैं? 


-प्रभाशंकर उपाध्याय

193,महाराणा प्रताप कॉलोनी,

सवाईमाधोपुर (राज.)

पिन-322001


मोदी जी के कालीन पर बैठकर कूड़ा बीने जाने को लेकर एक व्यंग्य


दैनिक भास्कर पत्र में प्रकाशित व्यंग्य "कालीन का राज"


--- कालीन का जलवा हमेशा से कायम रहा है। कालीन पर चलना, उठना, बैठना हमेशा से ही एक स्टेटेट्स सिम्बल रहा है। कालीन पर चलने की हमेशा से ही लोगों की हसरत रही है। पर सबका नसीब एक जैसा कहाँ होता है। जिसके लिए रेड कार्पेट बिछी होती है, वह सबके आकर्षण का केंद्र होता है। यह कालीन ही है जो व्यक्ति को अतिविशिष्ट बनाती है अन्यथा बग़ैर कालीन के क्या राजा और क्या प्रजा सब बराबर। भई, राजा के कोई चार मुँह और चार हाथ तो होते नहीं है जो उसकी अलग से पहचान कराए। वह तो कालीन पर शाही अंदाज़ में चलने से ही पता चलेगा कि कौन राजा है?? कालीन पर चलने का अपना तरीका होता है, एक शऊर होता है। यह नहीं कि जब चाहा, जैसे चाहा, कालीन पर चल लिए। उसके लिए आपके पांव कालीन पर चलने लायक होने चाहिए। दुष्यंत कुमार इस चीज़ को समझते थे तभी तो उन्होंने खुलेआम घोषणा की कि "आपके कालीन देखेंगे किसी दिन, इस समय तो पाँव कीचड़ में सने हैं।" कोई भी भला आदमी कीचड़ में सने पावों को लेकर किसी की साफ-सुथरी कालीन को देखने कैसे जा सकता है ?? 


 हालांकि यह सामन्तवादी प्रवृत्ति थी कि कालीन पर एलीट क्लास ही चल सकता है। उस समय तक आम आदमी कालीन को सिर्फ़ बिछते हुए देखभर सकता था। कालीन पर चलने की उस बेचारे की हिम्मत कहाँ?  ज़्यादा से ज़्यादा वह कालीन पर बैठ सकता है, बशर्ते उसका जिस्म कालीन की रूह को गंदा न करे। पर समय बदला और बहुत कुछ बदल गया। लोकतंत्र की हवा लगी तो बहुतेरे, कालीन को चटाई की तरह इस्तेमाल करके सामन्ती ठसक को जूते की नोक पर रखने का हौसला रखने लगे। कालीन का कालीनपना झाड़ दिया गया।

लोकतंत्र में वोट की राजनीति ने विशिष्टता के मायने बदल दिए। कल तक दलित-कुचलित जनता अब जनता से 'जनता-जनार्दन' हो गयी .... कहने का मतलब अब कालीन पर सिर्फ़ विशिष्ट वर्ग का ही एकाधिकार न रहा; अब विशेष अवसरों पर जनसाधारण वर्ग को भी कालीन पर बैठने की अनुमति दी जाने लगी। यह समय की माँग है। यह एक तरह से जनता रूपी पितरों के श्राद्धपक्ष के विशिष्ट अवसर हैं। श्रद्धा के अभाव में क्या हम श्राद्धपक्ष मनाना छोड़ देते हैं नहीं न !!!! वह तो इसलिए भी मनाते हैं ताकि कोई पितृ-आत्मा बेवज़ह प्रेस्टीज-इश्यू न बना ले।

 लेकिन इन सबके बीच कालीन से उसका कालीनत्व छीन लिया गया।

कालीन को कालीन न रहने दिया गया। 

अब दुष्यंत जी की बात बीते दिनों की हो गई!! अब आत्मविश्वास सर चढ़कर बोल रहा है। अब अंदाज-ए-बयां कुछ इस जबर अंदाज में होगा..... "आपके कालीन देखेंगे उसी दिन, जिस दिन पाँव कीचड़-युक्त होंगे"

  यह राही मासूम रज़ा के 'नीम का पेड़' के बुधई से सुखीराम तक की यात्रा का बदलाव है। कहना न होगा कि 'सबका साथ सबका विकास' की अवधारणा ने समाजवाद को किताबों से निकालकर कालीन पर उतार दिया। कालीन बुर्जुआ वर्ग का प्रतीक है, सो अब उससे चुन-चुनकर बदला लिया जा रहा है।

अब कालीन को उसकी औकात दिखाने के लिए कालीन की छाती पर कचरा रखा जाता है और न केवल रखा जाता है बल्कि अब उसे साधारण जनों के साथ माननीयों द्वारा बीना भी जाता है। किसी का दुर्भाग्य हो तो हो, पर कचरे का तो सौभाग्य ही है। और फ़िर जिस कचरे को अतिविशिष्ट व्यक्ति के करकमलों का स्पर्श मिल जाए, उसका क्या कहना!!!!  रेड कार्पेट पर बैठकर कूड़े-कचरे को बीनना अपने आप में एक अद्भुत कला है !!! इस कलाबाजी पर कौन न मर मिटे!!!

फिर भी यह सन्तोषजनक बात है कि कालीन अब जनसाधारण के लिए सुलभ हो गयी। भले ही विशिष्ट वर्ग कालीन से अपने पुराने आत्मीय संबंधों को लेकर वर्तमान परिस्थितियों पर अंदर ही अंदर कुढ़ रहा हो।   भाई यह सामान्य स्वीकृत सिद्धांत है कि एक का उठान दूसरे के गिरान की वजह बनता है। जैसे अंग्रेजों का जब उठान हुआ हम लोग गर्त में गिरे। जब भाजपा ऊपर उठी तब कांग्रेस गड्ढे में गिरी। भई, यह शाश्वत है कि, जब एक की हार होगी तभी तो दूसरे की जीत होगी। अतः इसे खेल भावना के तौर पर लेना चाहिए। अतः हम सभी को जनसाधारण के साथ-साथ कूड़े-कचरे के सम्मान में हुई अतिशय वृद्धि को सद्भाव के रूप में लेना चाहिए। 'जैसे उसके दिन बहुरे ऐसे सभी के दिन बहुरे' की लोकमंगल भावना के साथ अपने दिन बहुरने की प्रार्थना करनी चाहिए ताकि हम भी किसी दिन कालीन पर बैठकर कूड़ा-कचरा बीन सके।

                               - संजीव शुक्ल


: बुड्ढी भटीयारिन व काग मंजरी की


एक था गाँव गाँव के बाहर थी एक धर्मशाला याने कि सराय रोहिल्ला जो सराय काले खां के बग़ल में थीं जहां आते जाते बटोही रात को ठहरते ओर सुबह उठ कर चले जाते धंधा चौखा चल रहा था

ऐसे ही एक दिन भटका हुआ यात्री आयाभटियरिन ने उसे ठहराया खा पीकर ज़तरू सोने से पहले हुक्का पीने भटियरिन के पास

आया हुक्के का कश खिंचा ओर बोला

हे शहर की मल्लिका कोई ताज़ा क़िस्सा बयान कर ताकि रात कटे कुछ थकान मिटे

भटियारिन खूब खेली खाई थी बोली

हे राजा आज में तुम्हें काग मंजरी की कथा सुनाती हूँ

समय पर हुंकारा भरना तुमने हुंकारा बंद किया तो क़िस्सा कथा कहानी सब बंद

सो प्रेम से सुन

फिरशुरू हुईं कथा काग मंजरी

की जो बड़ों बच्चों सब को बहुत पसंद आइ

ज़ारी...

फेसबुक के कारण कुछ बहुत ही लाजवाब हजरात को जानने, पढ़ने का मौका मिला है. इस सूची में जैनेन्द्र कुमार झाम्ब का नाम सबसे ऊपर है.

आदरणीय बुलाकी शर्मा ने सही लिखा है कि शब्दों के प्रयोग में झाम्ब जी मितव्ययी हैं. उनकी रचनाएँ मुझ जैसे साधारण पाठक तक तुरंत नहीं पहुँचती, पुनः पुनः पढ़ना पड़ता है. लेकिन जब इनकी रचना के मर्म तक पहुँचे, तब अजीब सी तृप्ति मिलती है. 

इनकी  टिप्पणियाँ अद्धभुत होती हैं. कई बार तो इनकी टिप्प्णी सिर्फ एक शब्द की होती है.  शिष्टतापूर्ण अशिष्टता से लैस होती है  इनकी टिप्पणियाँ. 

बहरहाल तीन बेहतरीन रचना  उपलब्ध करवाने के लिए आदरणीय बुलाकी शर्मा जी का आभार. 💐💐


सादर, 🙏🙏

अभिजित दूबे

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