रविवार, 20 दिसंबर 2020

अमर शहीद अशफाकुल्लाह / उपेंद्र पाण्डेय

 अमर शहीद अशफाकुल्लाह तो अक्सर मेरे कमरे में आ जाते थे🙏

मैं जब इंटरमीडियट में था, मेरा कालेज जीआईसी फ़ैज़ाबाद जेल से बिलकुल सटा हुआ था. मैं ठहरा हास्टलर. जीआईसी के बाद जेल और जेल के दूसरे छोर पर पुष्पराज चौराहा. पुष्पराज नाम था एक सिनेमाहाल का. 

बात सन १९७४ या १९७५ की है. आज का ही दिन था. सुबह फांसीघर में अमर शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित करके लौटे थे और "इंक़लाब ज़िंदाबाद " हमारे तनमन मस्तिष्क पर सवार था. 

हास्टल में वार्डन बाबू आरके सिंह सर का आतंक था और शाम को सूर्यास्त होने के बाद केवल वालीबाल फुटबाल फ़ील्ड तक ही पॉंव रखने की इजाज़त थी. रात आठ बजे गेट लॉक. हम चार इंकलाबी हास्टलर मेस की दीवार महरा जी (मेस वर्कर) की मदद से फांदकर आंधी फिल्म का नाइट शो देखने चले गए. पुष्पराज के फौवारा चौराहे पर ही फ़ैज़ाबाद जेल में फांसी चढाए गए अमर शहीदों की प्रतिमाएँ लगी थीं. अचानक हमने देखा कि वार्डन साहब रेलवे स्टेशन की ओर से तांगे पर फ़ैमिली के साथ चले आ रहे हैं. शायद रात की बरेली-वाराणसी पैसेंजर से कोई फ़ैमिली /मेहमान आया रहा होगा. साथी न्यूटन की तेज़ निगाह झट से ताड़ गई और हम छुप गए शहीद अशफाकुल्लाह की गोद में/ओट में . मैं जान भी न पाया कि अमर शहीद मेरे साथ चुपचाप दबे पॉंव हास्टल चले आए थे. मेस की खिड़की से हमने महरा को आवाज़ लगाई, उन्होंने बाउंड्री से सटाकर स्टूल से बाल्टी (औंधी) लगाई और हम चारों धमाधम अंदर. तभी अमर शहीद अशफाकुल्लाह ने मुझे धक्का मारा और मैं लड़खड़ा कर औंधी बाल्टी की धारदार पेंदी पर. 

कमरे में आया तो आँख लगते ही शहीद अश्फ़ाक मेरी आँखों के सामने आंखें तरेरते 🙄😡😾

मानों चोरीचोरी चुपके चुपके दीवार फांदकर फ़िल्म देखने जाने पर पिताश्री की तरह आँखें तरेर रहे हों. 

मेरी सिट्टीपिट्टी गुम. उस रात सपने में ही मैं अमर शहीद अश्फ़ाक का शागिर्द बन गया और आजतक ग़लत पैर बढते/पड़ते ही अशफाक चच्चा मुझे आंखें तरेरकर होशियार करते पहते हैं. 

हो न हो, शहीदों की संगत का ही असर है कि हास्टल की दीवार फाँद सिनेमाहाल की ओर बढ़े पॉंव हमेशा हमेशा के लिए सँभल गए और पैंतीस बरस की पत्रकारिता लाइफ़ में तमाम सुसंगति कुसंगति के बावजूद चाल-चरित्र ख़ान-पान कमोबेश संभला ही रहा. ...और शहीद अशफाक चच्चा!!🙏🙏🙏 इकसठ बसंत देखने के बाद ...अब क्या खाक....

काश सोलह बरस की उमर में पुष्पराज सिनेमा हाल के रंगीन फुहारे वाले चौराहे पर जैसे मुझे शहीद अशफाकुल्लाह जैसे चच्चा मिल गए, वैसे ही "दीवार फाँदने वाले हर बच्चा को उसी रात कोई न कोई चच्चा " भेंटा जाएँ 🙏🙏🙏🙏

1 टिप्पणी:

  1. क्या बात है , सच में अगर चचा का नियंत्रण बना रहे तो युवा वर्ग भटकने से बच जाए मगर आजकल के चचा लोग कहीं ज्यादा भटके हुए हैं।

    जवाब देंहटाएं