मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

व्यंग्य शाला-2 / टीका टिप्पणी

टीका टिप्पणी 

बिल्कुल सही सही बात सिर्फ इतनी है की किसी भी रचना में चाहे वह कविता हो या कहानी विधा में या निबंध में जब व्यंग प्रधान अभिव्यक्ति होती है तो वह व्यंग कहलाता है हास्य विनोद उसके सहायक के रूप में है कोई शर्त नहीं रखी जा सकती कि इस फॉर्मेट के अनुसार ही व्यंग होगा व्यंग के मामले व्यंगशाला  teekमें दंड प्रक्रिया संहिता या इंडियन पीनल कोड या ट्रेजरी कोड ऐसे प्रावधान लागू नहीं होते और मान लीजिए के होते भी हो तो उनमें भी किंतु परंतु जुड़े रहते हैं वही व्यंग के साथ है बस बात इतनी सी है कि मूल स्वर व्यंग का होना चाहिए परसाई जी शरद जोशी और रवीना त्यागी जी ने अविस्मरणीय व्यंग लिखे हैं सबसे अधिक तीखापन और चुटीलापन पैनापन परसाई जी रचनाओं में रहा है परंतु अन्य मूर्धन्य लेखकों की रचनाएं भी व्यंग की ही श्रेणी में आती है! प्रधान तत्व या मूल तत्व हास्य है कि व्यंग है और उसका उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन है तो वह व्यंग नहीं होगा इसी कसौटी पर देखना होगा!

-श्रीकांत चौधरी

व्यंग्यशाला पेज पर आयी टिप्पणी


व्यंग्यशाला  पेज पर आयी टिप्पणी


 बहुत ही उत्कृष्ट विवेचना


क्षमा सहित ग्रुप से मुक्ति चाहता हूँ 🙏



व्यंग्य में हास्य अनायास आ जाए तो वह व्यंग्य की ताकत बनता है और व्यंग्य की चमक में सहायक होता है जबकि सायास ठूंसा गया हास्य व्यंग्य को कमजोर करता है।हास्य साधन हो सकता है लेकिन व्यंग्य का वह साध्य नहीं हो सकता।व्यंग्य में हास्य से परहेज़ की जरूरत नहीं लेकिन उस बैसाखी के रूप में इस्तेमाल कर भी जरूरत नहीं।हास्य गंभीरता की परिणति भी हो सकता है जो व्यंग्य की अर्थवत्ता को बढ़ाता है।मनोरंजक का सामाजिक मूल्य भले न लेकिन रोचकता और दिलचस्पी का सामाजिक मूल्य हो सकता है।सरसता गंभीरता की मूल भावना को नष्ट नहीं करती बल्कि उसकी संप्रेषण क्षमता में इजाफा करती है।


 व्यंग्य में हास्य का तड़का रचना को सहज और सुपाठ्य बनाता है बशर्ते थोपा न गया हो। किन्तु यह बात निर्मूल है कि बगैर हास्य के अच्छा व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता ।बस एक विचार।

 सहमत।


 खेमेंबाजी दुनिया का शगल है। खोज के लिए तोड़ना जरूरी है। तोड़कर देखना मानव प्रवृत्ति है। यही बात हास्य और व्यंग्य को लेकर है। मैं ऐसा मानता हूं कि हास्य पहले आया फिर बुद्धिजीवियों ने हास्य को व्यंग्य की शक्ल में ढाला। व्यंग्य हास्य के ऊपर वाली पायदान है। गुदगुदाते हुए कहने का उपक्रम। सामने वाले को उसकी गलतियों कमियों को बताने का सुरक्षित तरीका है। विसंगतियों और विद्रूपता ऊपर चोट करने का सुरक्षित औजार है व्यंग्य। इन दिनों व्यंग्यकार कुमार सुरेश जी का एक व्यंग्य जरा धीरे-धीरे उड़ो मेरे साजना पढ़ रहा था। लिखा है - एक रात मैं उड़ने लगा। लोग मुझे पत्थर मारने लगे। मैं डरा नहीं। अगले दिन पाए जाने की जेब में पत्थर भर लिए और उड़ने लगा। मैंने ऊपर से पत्थर बरसाना आरंभ कर दिया। अब लोग मुझे झुक झुक कर सलाम करने लगे। ऊंचाई के साथ दूसरों को नुकसान पहुंचाने की ताकत भी होनी चाहिए तभी लोग सफलता को स्वीकार करते हैं।' 

@ *राकेश सोहम्*


 व्यंग्य में हास्य की भूमिका और समावेश का संतुलन देखना हो तो  एक बार  M M Chandra का लघु  उपन्यास  ' प्रोस्तोर ' जरूर पढ़ें !



देशी कुत्तों की नसबंदी और उसकी अमानवीय स्थितियों का बहुत ही अच्छा चित्रण किया है, जय प्रकाश पांडेय जी ने। यथार्थ पर जब कल्पना का रंग चढ़ता है, तो बहुत चोखा हो जाता है। श्री पांडेय जी को शानदार व्यंग्य के लिए बधाई।


 तो यह उदाहरण हास्य हुआ या व्यंग्य? अगर हास्य, तो किस तरह, और अगर व्यंग्य, तो किस तरह? यह नहीं बताएँगे तो बात कैसे स्पष्ट होगी  l 


 जी, अवश्य, लेकिन सत्र-काल में केवल सत्र के विषय पर ही चर्चा शाला की गंभीरता कायम रखने में सहायक होती है।



 अशोक जी, विषयेतर बातें सत्र-काल के बाद।



 व्यंग्य संग हास्य :दोहों में 

ब्रजेश कानूनगो 


चले जो चक्की व्यंग की

बहुत मचाए शोर।  

सरस होय रचना तनिक,

कथ्य न हो कमजोर।


चढ़ विसंगति पीठ पर,

मारे कोड़े व्यंग।

चोट लगे रो न सके,

पा विनोद का रंग।


तंज ना हो बेबस पर,

बने ना स्तुति गान।

अन्तस् भीगे करुणा से,    

रचना वही महान।


★ ब्रजेश कानूनगो



 हर विधा की अपनी मूल प्रवृत्ति होती है जिससे उसे पहचाना जाता है। व्यंग्य का भी एक मूल स्वर होता है, एक शैली होती है, अभिव्यक्ति का एक अलहदा अंदाज़ होता है। लेखन को दायरे में नहीं बांधा जा सकता। हाँ विधा के मूल स्वर को बचाने और संवर्धन की जिम्मेदारी जरूर बनती है जिससे लेखक भाग नहीं सकता। जब कविता के इतने विविध रूप हो सकते हैं जिनमें छन्दबद्ध और छंदमुक्त के  भी अलग-अलग स्वर हैं और सबको स्वीकार किया गया। व्यंग्य में हास्य की उपस्थिति कोई दुर्लभ चीज नहीं है और न ही अनैतिक चीज। हास्य अगर व्यंग्य को धारदार बनाने में सहायक है तो उस व्यंग्य-विशेष को उसी रूप में लेने में क्या दिक्कत है? हाँ मुख्य स्वर व्यंग्य का ही होना चाहिए। हास्य अगर स्वाभाविक रूप में उपस्थित है, अगर उसे जबर्दस्ती थोपा नहीं गया है तो उसे उदारतापूर्वक स्वीकार किया जाना चाहिए। व्यंग्य की सम्प्रेषणीयता का निर्वाह निर्बाध होना चाहिए। फिर चाहे व्यंग्य हास्य के साथ हो या हास्य के बगैर

यह सही है कि जब हास्य और व्यंग्य की  बात चलती है,तो व्यंंग्यकार दो खेमों में बंटा दिखता है, अपनी ढपली अपना राग..... 

पर यह भी सही है कि हास्य की दुनिया में आसानी है, सीधी सड़क है, सुरक्षा है, सवालों से बचने की गैर जिम्मेदार हंसी है, दायित्व से मुंह मोड़ने की गुंजाइश है,पर व्यंंग्य लेखन गंभीर कर्म है,यह मानवीय और सामाजिक विद्रूपताओं, असंगति पर आक्रमण करता है इसीलिए व्यंग्य कभी हथियार बनकर प्रगट होता है तो कभी वंचित के प्रति करुणा बनकर उभरता है ऐसे में जबरदस्ती हास्य घुसेड़ने से वह हास्य गैरजिम्मेदार हास्य बन जाता है। किसी व्यंग्य में हास्य अपने आप आ सकता है उसे लाया नहीं जा सकता।

*जय प्रकाश पाण्डेय


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