बुधवार, 18 नवंबर 2020

सत्ता में हक़ मांगती भारतवंशी औरतें

सत्ता में हक़ मांगती भारतवंशी औरतें / विवेक शुक्ला 

अमेरिका में भारतीय मूल की कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति बनने और न्यूजीलैंड में केरल मूल की प्रियंका राधाकृषनन के वहां की नई कैबिनेट में जगह बना लेने के साथ ही यह तो स्पष्ट हो गया है कि अब भारतवंशी महिलाएं भी राजनीति में अपनी हिस्सेदारी चाहती हैं। वे डाक्टर, इंजीनियर,बैंकर या कोई और नौकरी करके ही संतोष नहीं कर लेना चाहती हैं। ये सात समंदर पार बसे भारतीयों में पहली बार बड़े स्तर पर देखने में आ रहा है।


आप कह सकते हैं कि जिस भारतवंशी महिला ने सबसे पहले राजनीति में अपने लिए एक खासा जगह बनाई थी वह त्रिनिडाड टोबैगो की कमला प्रसाद बिस्सेर थीं। वह किसी भी देश की राष्ट्राध्यक्ष बनने वाली पहली भारतवंशी महिला थीं। उनके पुरखे बिहार के बक्सर से त्रिनिडाड गए थे। प्रधानमंत्री श्रीमती कमला प्रसाद ने साल 2009 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए भगवत गीता की प्रतिज्ञा ली थी। 


 वैसे त्रिनिडाड में उनसे पहले बासुदेव पांडे 1995 -2001 के दौरान प्रधानमंत्री रहे थे। लेकिन कमला जी की सफलतासे भारत या दुनिया भर में फैले करोड़ों भारतवंशी नावाकिफ ही रह गए थे। तब तक सोशल मीडिया भी आज की तरह से सशक्त नहीं हुआ था।

 

प्रेरक बनेंगी कमला और प्रियंका

पर कमला हैरिस और प्रियंका राधाकृष्णन भारतवंशी महिलाओं के लिए उदाहरण के रूप में उभरेंगी। ये जरूरी भी है। आखिर सिर्फ भारतवंशीपुरुष ही क्यों सियासत करें?निश्चित रूप से किसी देश के पहले भारतवंशी राष्ट्राध्यक्ष तो कैरिबियाई देशगयाना के छेदी जगन थे। 


छेदी जगन के पिता और मां उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से गयाना ले जाए गए थे। छेदी जगन 11 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने गिरमिटिया का संघर्ष करीब से देखा था। वे 1961 में गयाना के प्रधान मंत्री चुने गये। वे 1992-1997 में गयाना के राष्ट्रपति बने। उन्होंने गयाना में पीपल्स प्रोगेसिव पार्टी (पीपीपी) का गठन किया। गयाना में उनसे प्रभावित होकर भारतवंशियों ने राजनीति में बड़े पैमाने पर आना शुरू किया। उनके बाद भरत जगदेव भी राष्ट्पति बने। छेदी जगन के राष्ट्रपति बनने से पहले त्रिनिडाड और गयाना में गोरे या अश्वेत ही राजनीति कर रहे थे।


कहां कहां राष्ट्राध्यक्ष बनते भारतवंशी

गुयाना, त्रिनिडाड टोबैगो, मारीशस,फीजी,सूरीनाम में

अंग्रेज मुख्य रूप से उत्तर प्रदेशऔर बिहार से साल 1839 से लेकर साल 1920 तक बहुत बड़ी संख्या में लोगों को  गन्ने के खेतों में काम करने के लिए लेकर जाते रहे। उनमें से कुछेक तो फिर से अपने देश लौटे, पर अधिकतर दूर देश में जाकर ही बस गए। इन देशों में  शिव सागर राम गुलाम ( मारीशस), नवीन राम गुलाम ( मारीशस),वासुदेव पांडे ( त्रिनिडाड-टोबैगो), महेन्द्र चौधरी ( फीजी), अनिरूद्ध जगन्नाथ ( मारीशस), चंद्रिका प्रसाद  संतोखी ( सूरीनाम) वगैरह राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे। पर कमला प्रसाद बिस्सेर ने पुरुषों के एकछत्र राज को तोड़ा।


 देखा जाए तो उपर्युक्त देशों में भारतवंशियों का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनना बहुत कठिन भी नहीं है क्योंकि इन सभी देशों में, जिन्हें लघु भारत या भारत के बाहर भारत कहा जा सकता है,में भारतवंशियों की आबादी खासी अधिक है।


 पर भारतवंशी एस. रंगानाथन सिंगापुर जैसे देश के भी राष्ट्रपति बन रहे हैं। सिंगापुर में चीनी लगभग 76 फीसद हैं। फिऱ मलेय भी मजे में हैं। जिधर भारतीय 10-12 फीसद हैं, उधर भी ये राष्ट्रपति बन रहे हैं। क्या इसे मामूली उपलब्धि माना जाए? कतई नहीं।

कमला हैरिस की अभूतपूर्व उपलब्धि पर चर्चा करते हुए एक बात याद रखी जाए कि  उनके साथ एक दर्जन भारतवंशी अमेरिका की राज्य विधानसभाओं के लिए हुए चुनावों में जीते हैं। इनमें पांच महिलाएं भी हैं। इनके नाम हैं जेनिफर राजकुमार ( न्यूयार्क), नीमा कुलकर्णी ( केंटकी),केशा राम ( वेरमंट), पदमा कुप्पा ( मिचीगन) और वंदना स्लेटर ( वाशिंगटन)।


 इनके अलावा चार भारतीय मूल के उम्मीदवार अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में पहुंचे हैं। इनमें एक महिला प्रमिला जयपाल भी है।ये सब नतीजे साबित कर रहे हैं कि भारतवंशी महिलाएं खुलकर राजनीति में आ रही हैं। ये अब सिर्फ समर्थक या मतदाता बन कर ही नहीं रहना चाहतीं।

अमेरिका में इंदिरा नुई और कल्पना चावला ( अब स्मृति शेष) जैसी सैकड़ों भारतीय मूल की महिलाएं अपनी मेरिट और मेहनत के बल पर सफल होती ही रही हैं। हां, राजनीति में इन्हे अब उल्लेखनीय सफलता एं मिल रही है। 


मूल रूप से  पंजाब के अमृतसर से संबंध रखने वाली निक्की हेली  अमेरिका में बसे भारतीयों के बीच अपनी पहचान बना रही थीं। वह दक्षिणी कैरोलिना की  गवर्नर भी रहीं। निक्की हेली का असली नाम निम्रता रंधावा है। निक्की  खुद को एक भारतीय माता पिता की गर्वीली बेटी और भारत को दूसरा घर मानती हैं।


अगर बात न्यूजीलैंड की लेबर   पार्टी सरकार में बनी मंत्री प्रियंका राधाकृष्णन की करें तो उन्होंने भी एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। उन्हें  प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डन सरकार में जगह मिली है। हालांकि न्यूजीलैंड में भारतीय मूल के लोग सांसद बने हैं, पर मंत्री बनना सिद्ध कर रहा है कि जेसिंडा आर्डन को उनमें बहुत उम्मीदें नजर आ रही हैं।


न्यूजीलैंड के हालिया संसद के चुनाव में लेबर पार्टी की टिकट पर  भारतीय मूल के डा. गौरव शर्मा भी विजयी हुए हैं। मतलब लेबर पार्टी के दो उम्मीदवार सत्तासीन दल  में हैं। डा. शर्मा का परिवार मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से है। 33 साल के डा. गौरव शर्मा ने नेशनल पार्टी के उम्मीदवार एम. टिम को लगभग 5 हजार मतों से हराया। पर वहां भारतीय मूल के पूर्व सांसद कंवलजीत सिंह बख्शी अपनी सीट बचा नहीं पाए। वे नेशनल पार्टी के उम्मीदवार थे। 56 साल के कंवलजीत 2008 से ही न्यूजीलैंड की संसद के सदस्य थे। उन्हें न्यूजीलैंड का पहला सिख सांसद होने का गौरव मिला था। कंवलजीत  सिंह को  2015 में प्रवासी भारतीय सम्मान भी मिला था।


 प्रियंका राधाकृष्नन और डा.गौरव शर्मा का लेबर पार्टी से लड़ना और कंवलजीत सिंह का नेशनल पार्टी का उम्मीदवार होना इस बात की गवाही है कि अब प्रवासी भारतीय किसी एक दल के साथ नहीं हैं। ये इनकी राजनीतिक समझदारी को भी दर्शाता है। अमेरिका में भारतीयों के वोट डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टियों के बीच में बंटे। हमने ब्रिटेन और कनाडा में भी भारतीयों मतदाताओं के  वोट बंटते हुए देखे हैं।


बहरहाल, अब शीशे की तरह साफ है कि भारतवंशी महिलाएं आने वाले समय में दुनिया के अलग-अलग देशों की राष्ट्राध्यक्ष बनेंगी।

 

 लेख 13 नवंबर 2020 को अमर उजाला में  पब्लिश हुआ।

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