रविवार, 8 नवंबर 2020

इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!*

इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!*/ अनाम  कवि 


*जाने क्यू*,

*अब शर्म से*,

*चेहरे गुलाब नहीं होते।*


*जाने क्यूँ*,

*अब मस्त मौला* *मिजाज नहीं होते।*


*पहले बता दिया करते थे*, 

*दिल की बातें*,


*जाने क्यूँ,अब चेहरे*,

*खुली किताब नहीं होते।*


*सुना है,बिन कहे*,

*दिल की बात, समझ लेते थे*


*गले लगते ही*,

*दोस्त*,

*हालात समझ लेते थे।*


*तब ना फेस बुक था*,

*ना स्मार्ट फ़ोन*,

*ना ट्विटर अकाउंट*,


*एक चिट्टी से ही*,

*दिलों के जज्बात, समझ लेते थे।*


*सोचता हूँ*,

*हम कहाँ से कहाँ*

*आ गए*,


*व्यावहारिकता सोचते सोचत*,

*भावनाओं को खा गये।*


*अब भाई भाई से*,

*समस्या का* *समाधान,कहाँ पूछता है,*


*अब बेटा बाप से*,

*उलझनों का निदान,*

*कहाँ पूछता है*


*बेटी नहीं पूछती*,

*माँ से गृहस्थी के सलीके,*


*अब कौन गुरु के*,

*चरणों में बैठकर*,

*ज्ञान की परिभाषा सीखता है।*


*परियों की बात*,

*अब किसे भाती है,*


*अपनों की याद*,

*अब किसे रुलाती है,*


*अब कौन*,

*गरीब को सखा बताता है,*


*अब कहाँ*,

*कृष्ण सुदामा को गले लगाता है*


*जिन्दगी में*,

*हम केवल* *व्यावहारिक हो गये हैं,*


*मशीन बन गए हैं हम सब,*


*इंसान जाने कहाँ खो गये हैं!*


*इंसान जाने कहां खो गये हैं*....! 🙏🏻

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