सोमवार, 23 नवंबर 2020

(लघुकथा ) -बुलबुले/बलराम अग्रवाल

बुलबुले/बलराम अग्रवाल 


कामिनी की आँखों में उन्हें इज्जत देने जैसी कोई चीज कभी दिखाई नहीं  दी, वह अलग बात है; लेकिन आज तो उसने हद ही कर दी! न राम-राम न दुआ-सलाम! कमरे में उनका कदम पड़ते ही बरस पड़ी—“आप इधर मत आया करो, प्लीज़!”

वे चौंक गये। गोया कि उनके अधिकार को चेलैंज कर दिया गया हो। गले से एकाएक निकला, “क्यों?”

इस तल्ख सवाल का उसने कोई जवाब नहीं दिया। मुँह बिचकाकर रसोई की ओर बढ़ गयी। 

और दिनों की तरह वे उसके पीछे-पीछे नहीं गये। ड्राइंग रूम बना रखी लॉबी में पड़े सोफे पर पसर गये। 

चलता-फिरता मोहल्ला नहीं था, कि आते-जाते हर किसी पर पड़ोसियों की नजर गड़ती हो। सोसाइटी थी। सिक्योरिटी गार्ड्स सब पहचानते थे, सो वे बिना रोक-टोक चले भी आते थे। यह एक वन-रूम सेट था, जिसमें वह किरायेदार थी और वे मालिक मकान।

औपचारिकता के मद्देनजर, कुछ ही देर बाद वह रसोई से निकल आयी। ट्रे में कोल्ड ड्रिंक भरा एक गिलास और काजू भरी एक प्लेट साथ थी।

“ऐसा क्यों कहा तुमने?” काजू उठाकर मुँह में रखते हुए उन्होंने सवाल किया।

 “मुझे पसन्द नहीं है, इसलिए!” उसने दृढ़ता से कहा।

“पसन्द नहीं है, मतलब!” वे बोले, “मैं चला आता हूँ कि दूसरे प्रांत से आयी अकेली लड़की हो। हजार तरह के लोग सोसाइटी में रहते हैं। हजार तरह की बातें आये दिन अखबारों में और न्यूज चैनलों में आती रहती हैं। कल को कुछ ऊँच-नीच हो गया तो... आँच तो मुझ पर भी आयेगी न!”

“उस ऊँच-नीच के डर से ही आपको समझा रही हूँ, सर।” कामिनी ने कहा, “पढ़ी-लिखी कामकाजी लड़की हूँ। दूसरे प्रांत, दूसरे शहर में जाकर कैसे रहना है, सब सीख रखा है। बदन नुचवाना और कपड़े फड़वाना बिल्कुल भी पसन्द नहीं है मुझे!”

“मुझसे कह रही हो यह बात, मुझसे!” आश्चर्य के उच्च शिखर से वे चीखे, “कपड़े फाड़ने की छोड़ो, मैंने अपना एक पोर भी कभी लगाया तुम्हें?” 

“एक बार नहीं, हजार बार!” वह संयत स्वर में  बोली, “आते ही खुद को नंगा करना और मुझको नोंचना-खसोटना शुरू कर देते हो। विनय बाबू, पोर और नाखून सिर्फ उँगलियों में नहीं  होते... आँखों में भी होते हैं!”

उनके कानों की लवें धधक उठीं यह सुनकर। नजरें नहीं उठा पाये। काजूभरी प्लेट की ओर बढ़ता हाथ एकाएक रुक गया। गिलास की भीतरी सतह पर जमे कोल्ड ड्रिंक के छोटे-छोटे बुलबुले चटकने और फूटने लगे थे। एक झटके से वे उठे और...

“अगले महीने के आखीर तक... खाली कर देना यह सेट!” कहते हुए बाहर निकल गये।

(यह 'काले दिन' में संग्रहीत है। मो.:8826499116)

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