शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

डरी हुई लड़की

ज्ञानप्रकाश विवेक की  एक कहानी “डरी हुई लड़की”


[ इस कालम के अंतर्गत मैं एक किताब को आपके साथ पढ़ने और पढ़े हुए को शेयर करने का प्रयास करती हूं । हम सभी जानते हैं कि आज हिंदी जगत में इतनी खेमेबंदी हो चुकी है कि किताब का पठन-पाठन छूट गया है, बस उन पर अपने वैचारिक फ्रेम से फतवेबाजी अधिक की जाती है । इससे पाठक दिग्भ्रमित हो जाते हैं और स्वतंत्र रूप से पुस्तक में लिखे का न तो अध्ययन कर पाते हैं, न आनंद ले पाते हैं । इसलिए मेरी तो कोशिश है कि पुस्तक में क्या है, यही सार संक्षेप में आपके सामने रखूं, अच्छा-बुरा तो आप जानें ।]


दुष्कर्म जैसे अपराधों का इतिहास नया नही है । ये सदियों से समाज में व्याप्त है, अंतर बस इतना है कि पहले इसे येन केन छिपा ही लिया जाता था और आज लोग आवाज उठाने लगे हैं । महिलायें भी शर्म संकोच त्याग कर इस विषय पर खुल कर बोलने लगी हैं । हालांकि जागरूक होने और आवाज उठाते लोगों के बीच दुष्कर्म पीड़िता किस मानसिक और शारीरिक यंत्रणा से गुजरती है, समाज उसे कैसी दृष्टि से देखता है और तब जब कई बार लडकियां या महिलायें किसी दूसरे के कुकर्म से खुद को अपराध-बोध से ग्रसित पाकर जीवन से हारने लगती हैं, कैसे उनके खोये हुए आत्मविश्वास को वापस लाया जा सकता है, इस विषय पर सोचने की फुर्सत किसी को नहीं होती है ।


जब तक मामला ताजा होता है टी वी चैनलों और अखबारों की सुर्ख़ियों में रहता है । तमाम नारीवादी संगठनों और कथित समाज सेवी संस्थाओं द्वारा भी ऐसी खबरों को प्रचारित करने के पीछे का उद्देश्य अपने नाम की चर्चा के अतिरिक्त शायद ही कुछ होता हो । तरह-तरह के धरने, हड़ताल औए मार्च होते हैं लेकिन न्याय कितनों को और कब मिलता है ये अब तब विचारणीय प्रश्न है । इस सबसे इतर उस लड़की या महिला की मानसिक अवस्था क्या होती होगी, इसी विषय को केंद्र में रखकर ज्ञानप्रकाश विवेक जी द्वारा लिखा उपन्यास है “ डरी हुई लड़की ।” उपन्यास इतना जीवंत है मानो लेखक ने पात्रों को खुद जिया हो ।


हिंदी साहित्य के जाने-माने साहित्यकार ज्ञानप्रकाश विवेक जी का जन्म हरियाणा के बहादुरगढ़ जिले में ३० जनवरी १९४९ में हुआ । ये एक गंभीर लेखक हैं जो स्वयं कम उनके शब्द ज्यादा बोलते हैं । बीमा कंपनी की नौकरी से ३३ वर्ष के पश्चात् स्वैच्छिक अवकाश लेकर ये अब पूर्णकालिक लेखन से जुड़े है । उपन्यास के अलावा कहानी, कविता, गजल और लघु कथाओं में भी ये ख़ासा चर्चित नाम हैं । इनकी अब तक प्रकाशित कृतियों में अलग-अलग दिशाएँ, पिताजी चुप रहते हैं, जोसफ चला गया, शहर गवाह है, उसकी ज़मीन, शिकारगाह, मुसाफिरखाना, सेवानगर कहाँ है, इक्कीस कहानियाँ, बदली हुई दुनिया तथा कालखंड  ( कहानी संग्रह ), धूप के हस्ताक्षर, आँखों में आसमान और इस मुश्किल वक्त में और गुफ्तगू आवाम से है (ग़ज़ल संग्रह ), दरार से झांकती रोशनी ( कविता संग्रह ) तथा दिल्ली दरवाजा, अस्तित्व, चाय का दूसरा कप,आखेट तथा तलघर ( उपन्यास ) आदि महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं । हरियाणा साहित्य अकादमी से तीन बार सम्मानित होने के अतिरिक्त भी कई सम्मान इन्हें प्राप्त हैं ।


डरी हुई लड़की दुष्कर्म पीडिता किसी एक लड़की की नहीं वरन हर उस लड़की की कथा है जो उस अनचाहे दौर का अपराध-बोध लिये मानसिक यंत्रणा और अवसाद से जूझती है । ये लड़की हमारे आपके आस-पास मिल ही जायेगी । और कहीं नहीं तो अखबारों में तो आये दिन किसी न किसी पन्ने पर उसके बारे में खबरें आम हैं । उपन्यास का उद्देश्य किसी की कहानी बताना नहीं बल्कि उस लड़की के डर, अकेलेपन और असुरक्षा की भावना पर समाज का ध्यान आकृष्ट कराना है जहाँ किसी की नज़र शायद ही पहुंचती हो । उपन्यास में एक ऐसे पक्ष की रचना की गयी है जो समाज में कम ही नजर आता है । इसके मुख्य पात्र हैं राजन और नंदिनी ।


एक सुबह अपने ख़ास मित्र के घर से लौटते हुए राजन को सुनसान सडक के किनारे झाड़ियों में अस्त-व्यस्त और नीम बेहोशी की हालत में पड़ी नंदिनी मिलती है । लाख अच्छा-बुरा सोचने पर भी राजन उसे उस हाल में मरता हुआ छोड़ कर नहीं जा पाता । पहले वह सोचता है कि पुलिस में रिपोर्ट कर दे । नंदिनी मना करती है । वह दुविधा में पड़ जाता है लेकिन घबराता भी है । इस दुविधा को शब्दों में बाँध कर लेखक समाज को जैसे आइना दिखाते हैं कि हमारे देश की आज़ादी का ये कैसा चेहरा है कि हम उनसे डरने लगे हैं, जिनके जिम्मे हमारी सुरक्षा सौंपी गयी है ।


“धौला कुआँ पुलिस स्टेशन के सामने मैंने गाड़ी रोक दी । कार में बैठे हम दोनों अपनी-अपनी दुविधा में घिरे हैं । वो क्या सोच रही है, मैं नहीं जानता । मैं क्या सोच रहा हूँ ? रिपोर्ट लिखवाने के बारे में । एक दृश्य मेरे सामने उपस्थित है – दरोगा । सिपाही । रजिस्टर । मेज और प्रश्न और जड़ता और अमानवीयता ।.....वो इस लड़की की खराब हालत को और ज्यादा ख़राब करेंगे । ऐसे-ऐसे सवाल कि जीते जी इस लड़की का पोस्टमार्टम हो जाएगा । यह भी संभव है कि वो इस लड़की को चरित्रहीन साबित कर दें । या फिर रिपोर्ट ही न दर्ज करें । पुलिस स्टेशन जाने से वो लड़की डर रही है ।


“मैंने पलट कर उसे देखा है । वो सहमकर, इंकार में सर हिला रही है ।”

ये ऐसी कडवी सच्चाई है जिससे हम चाहकर भी नज़रें नहीं चुरा सकते, यहाँ तक कि पुलिस के बुरे व्यवहार के परिणाम की कल्पना करके निडरता से आवाज भी नहीं उठाते । राजन उसे लेकर एक प्राइवेट नर्सिंग होम में जाता है कि कुछ प्राथमिक चिकित्सा हो सके । वहां डॉक्टर का लहजा बेहद बेशर्मी भरा है ।


“ रेप केस ?” पूछते हुए वह ज़रा सा मुस्कुराया है । गोया किसी युवती के साथ किया गया दुष्कर्म, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो ।”


उस डॉक्टर के इलाज से पहले मीडिया को बुलाने की बात पर मानवता के इस क्षरण से व्यथित राजन सोचता है कि-


“मैं खस्ताहाल चुप लेकर बैठा हूँ, डॉक्टर के सामने । क्या बताऊँ कि मेरा उद्देश्य क्या है ? क्या बताऊँ कि मैं क्यों लिए फिर रहा हूँ इस लड़की को ।”


यह हर उस व्यक्ति के मन का असमंजस हो सकता है जो मुसीबत में पड़े किसी व्यक्ति, विशेष कर ऐसी परिस्थिति में पड़ी किसी लड़की की मदद केलिए आगे आता हो । शायद इसलिए वास्तविक जगत में कोई हाथ बढ़ाने से हिचकता है ।

वह वहां से वापस जाना चाहता है, तभी एक लेडी डॉक्टर उसकी समस्या को समझ कर मानवीय दृष्टिकोण दिखाते हुए उसकी मदद करती है । हालांकि जब वह उसे बताता है कि नंदिनी को अपने घर ले जाएगा तब वह भी उसे शंकालु दृष्टि से देखती है । ये आज का वास्तविक समाज है जो किसी की मदद करने वाले में भी उसका स्वार्थ खोजता है । राजन नंदिनी को घर ले आता है और तब शुरू होती है संवेदनाओं की बुनावट की असली कहानी जब नंदिनी की व्यथा को महसूस कर अनजाने आकर्षण में बंधा राजन कई दिनों तक ऑफिस नहीं जाता और नंदिनी की देखभाल उसकी मानसिक अवस्था को ध्यान में रखते हुए करता है । दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं होती । डरी-सहमी नंदिनी अपने ही अवसाद की दुनिया में खुद से इतनी ज्यादा संघर्षरत है कि राजन जैसा आदर्श पुरुष उसकी कल्पना से परे है और वह चाहकर भी उस पर विश्वास नहीं कर पा रही । राजन जब उससे नहाने और कपडे धोकर साफ़ होने को कहता है तो नंदिनी कहती है –


“सर, उस आत्मा को किस डिटरजेंट पाउडर से धोऊँ जो मैली हो चुकी है - डरी हुई लड़की ने कहा है । उसकी समूची देह प्रश्नवाचक हो गई हो जैसे ।”

रेप एक तरह का इनह्यूमन एक्शन है । जिसमेंहिंसा ही हिंसा होती है । यह एक ऐसा हादसा होता है, जिसकी गवाह वह औरत होती है जिसके साथ यह घिनौना और अमानवीय काम किया जाता है – डॉक्टर ने कहा । शायद इसी लिए “यौन हिंसा से गुजरी कोई भी लड़की नहीं चाहती कि उसकी आत्मा के जख्मों पर, सवालों की जिद्दी मक्खियाँ भिनकती रहें ।” ऐसी कई पंक्तियाँ हैं जिन्हें लिखकर लेखक ने पाठकों की संवेदना के उच्चतम स्तर को छूने की कोशिश की है ।


राजन जैसे पात्र सहज ही नहीं मिलते, कम से कम भारतीय समाज में तो असंभव की हद तक मुश्किल है । तो यह लेखक की सकारात्मक सोच ही है जिसने ऐसा पात्र गढ़ा है जो न सिर्फ उस लड़की की सहायता करता है बल्किउससे सच्चा प्रेम भी कर बैठता है और उसे जीवन संगिनी बनाने के सपने भी देखता है, बस कह नहीं पाता । लेखक ने मानवीयता की तमाम परतों को खोलने का प्रयास किया है । दोनों में प्रेम है, स्वीकार्यता की चाहत है लेकिन दोनों ही उसे व्यक्त करने से डरते हैं । नंदिनी में जिजीविषा है, वह भी जीना चाहती है और अवसाद में रह कर भी वह अपना संतुलन बरकरार रखती है । लेकिन वह खुद को कमजोर और किसी की दया का पात्र नहीं समझना चाहती और स्वास्थ्य ठीक होने पर पुनः नौकरी की तलाश में जुट जाती है और यह संभव होता है राजन की निश्छल भाव से की गयी सहायता से जिसने नंदिनी को विगत भूल कर जीवन में आगे बढ़ने का साहस दिया ।


उपन्यास का अंत बेहद रोचक है जब नंदिनी बिना कुछ बताये एक दिन राजन का घर छोड़ कर चली जाती है । तो आगे क्या होता है और नंदिनी का अतीत क्या था इन सबको जानने के लिए उपन्यास को पढ़ने का विकल्प खुला है । नौकरी का नियुक्ति-पत्र लेकर घर से निकली उम्मीदों से भरी युवती के बलात्कार जैसी घटना से जूझने और जीवन जीने जी जिजीविषा के साथ ही नायक की सकारात्मक सोच ही इस उपन्यास को सबसे अलग बनाता है । मुझे भी इस किताब का अंत विशेष रूप से पसंद है क्योंकि बनी-बनाई लीक पर चलती कहानियों की तरह अंत न तो सुखान्त है न दुखांत बल्कि लेखक ने उपन्यास को बहुत रोचक मोड़ देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से निर्णय पाठकों पर छोड़ा है कि वे चाहें तो सकारात्मक मोड़ दें या नकारात्मक ।


भाषा बेहद सरल है जिसमें कोई बनावट नही है । दो कमरों के भीतर ही पात्रों का अधिकतर समय गुजरता है,लेकिन उपन्यास की रोचक और कसी हुई बुनावट इसे कतई बोझिल नहीं बनाती बल्कि रुचिकर बनाये रखती है । पिछले कुछ सालों में जिस तरह बलात्कार की घटनाओं में गुणात्मक इजाफा हो रहा है और पीड़ितों का जीवन दूभर हो रहा है, ऐसा उपन्यास लिखने और उनके लिये एक उम्मीद की किरण जगाने तथा रोशनी के सूत्र जोड़ने के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं । शेष स्वयं पढ़े ......


भारती पाठक

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