शनिवार, 21 नवंबर 2020

अब और सरकारी मेहमानबाजी नहीं

50 साल  सरकारी आवास में रहने के बाद बेघर हो जाएंगे बिरजू महाराज  / विवेक शुक्ला 


अब कहां जाएंगे बिरजू महाराज

भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक के शिखर पुरुष बिरजू महाराज इन दिनों परेशान हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि  वे आगामी 31 दिसंबर के बाद कहां रहेंगे। राजधानी दिल्ली के जिस सरकारी फ्लैट में गुजरे 50 वर्षों से रह रहे हैं, उसे सरकार ने खाली करने के निर्देश दे दिए हैं। 


उनके आशियाने के करीब पहुंचते ही सुनाई देने लगती घुंघुरूओं की खनक। एक अजीब सी एनर्जी महसूस होती है उनके घर में जाने पर। सारे माहौल में मिठास और आनंद को महसूस कर सकते हैं आप। ये फ्लैट है पंडारा रोड से सटे शाहजहां रोड पर ।  इधर बिरजू महाराज के शिष्यों और प्रशंसकों का आना-जाना लगा रह्ता है ।


 आप पंडित जी के घर के ड्राइंग रूप में बैठते हैं। लो, पंडित भी आ गए। आपका गर्मजोशी से स्वागत करते हैं। आपसे पूछते हैं, “ पहले बताओ क्या नाश्ता करोगे ?“ इससे पहले आप कुछ कहे,वो आवाज दे देते हैं, “अरे, मिठाई भिजवाओं। पहले मिठाई खाएंगे,उसके बाद करेंगे बात।“

कौन लाया था बिरजू महाराज को दिल्ली

सरकार ने बिरजू महाराज के अलावा कुछ और कलाकारों से भी अपने सरकारी घरों को खाली करने को कहा है। बिरजू महाराज 82 साल के हो रहे हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि अब वे अपने जीवन के अंतिम मोड़ पर है। इसलिए उन्हें यहां पर रहने दिया जाए। 


महाराज को दिल्ली का जाडा और बारिश का मौसम बड़ा दिलकश लगता है। बारिश में पहले तो वे नहाते भी थे। छप-छप पानी के बीच चलने के सुख को वे याद करते हैं। कहते हैं, “दिल्ली की हरियाली में बारिश का आनंद दोगुना बढ़ जाता है। एक दौर में वे मूसलाधार बारिश में लोधी रोड और इंडिया गेट घूमने निकल जाते थे।” 


ये दोनों स्थान उनके के घऱ से पास ही तो हैं।यूं तो वे लखनऊ में पैदा हुए और बात-बात में लखनऊ को ले आते हैं, पर दिल्ली को भी खूब चाहते हैं। इस शहर ने उन्हें शिखर पर पहुंचाया है।


 कथक से कैसे रिश्ता बना ? ड्राइंग में रखे अपने दीवान से सटी दिवार पर पीठ को टिकाते हुए बिरजू महाराज बताने लगे, “मेरा जन्म लखनऊ के एक बड़े कथक घराने में हुआ। पिता अच्छन महाराज, चाचा शंभू महाराज का ख़ासा नाम था मैं केवल नौ वर्ष का था, पिता जी गुज़र गए । एक वक़्त घर में नौकर थे, पर पिताजी के देहांत के बाद कर्ज़ और ग़रीबी का दौर झेला। उन दिनों हमारी गुरूबहन कपिला वात्स्यायन लखनऊ आईं और वह मुझे अपने साथ दिल्ली ले आईं। इसी तरह मेरी कथक यात्रा शुरू हुई”।

 कौन मिलने आता था कथक गुरू से

 बिरजू महाराज के इसी घर में सत्यजीत राय,पंडित रवि शंकर, यश चोपड़ा, संजय लीला भंसाली, कमलहासन, माधुरी दीक्षित, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और दूसरी तमाम कला की दुनिया की शख्सियतें आती रहीं हैं। बिरजू महाराज की फ़िल्मकार सत्यजीत राय से मित्रता 'शतरंज के खिलाड़ी' के निर्माण के दौरान हुई थी। इसमें गुरुजी ने दो शास्त्रीय नृत्य दृश्यों के लिये संगीत रचा और गायन भी किया।


 उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और पंडित रवि शंकर की बात छिड़ने पर पंडित जी के चेहरे पर उदासी छाने लगती है। कुछ पल वो मौत मुद्रा में आ जाते हैं।बिरजू महाराज ने `डेढ़ इश्किया` फिल्म में माधुरी दीक्षित के नृत्य का निर्देशन किया था। तब माधुरी इधर कई बार आई। बिरजू महाराज जी बताते हैं कि माधुरी में सीखने की गजब की ललक है। उन्होंने माधुरी को `देवदास` और `दिल तो पागल है` में भी ट्रेनिंग दी थी।

 

बिरजू महाराज की आंखों में यादों का सागर लहराने लगता है लखनऊ का जिक्र आते ही। उन्हें अमीनाबाद का मेहरोत्रा पान वाला याद आता है। वहां की रबड़ी मलाई भी उन्हें खूब याद आती है।


 पर अब बिरजू महाराज को दिल्ली भी खूब पसंद है।  “बेजोड़ शहर है ये। अब यहां से बाहर जाने का सवाल ही नहीं होता। दिल्ली जैसा कोई शहर हो नहीं सकता”।  एक बात जान ली जाए कि वे केवल नृत्य के क्षेत्र में ही सिद्धहस्त नहीं हैं, बल्कि 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' पर भी उनकी पकड़ है। ठुमरी, दादरा, भजन और गजल गायकी में उनका कोई सानी नहीं है। वे कई वाद्य यंत्र भी बखूबी बजाते हैं। तबले पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ है। इसके अतिरिक्त वह सितार, सरोद और सारंगी भी अच्छा प्रकार से बजा सकते हैं। ख़ास बात यह है कि उन्होंने इन वाद्य यंत्रों को बजाने की विधिवत शिक्षा नहीं ली है।


बातचीत बदस्तूर जारी है। अब गुलाब जामुन, बर्फी, नमकीन, चाय आ चुकी है। जो आएगा उनसे मिलने, उसे मिठाई का तो भोग लगाना ही होगा। इससे बचा नहीं जा सकता।

मिठाई का सेवन करते-करवाते हुए वो बताते हैं कि चूंकि ये घर राजधानी के बिल्कुल बीच में है इसलिए यहां पर शिष्यों और शैदाइयों का आना जारी रहता है। पंडितजी गुलाब जामुन लेने के लिए कहते हैं। आप गुलाब जामुन के साथ इंसाफ करते हैं। 

अब मालूम नहीं कि इस घर में बिरजू महाराज कब तक रहते हैं ।

नवभारतटाइम्स मेें 21 नवंबर 2020 को छपी रिपोर्ट के अंश।

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