सोमवार, 7 सितंबर 2020

हिन्दी वर्णमाला का क्रम से कवितामय प्रयोग

हिन्दी वर्णमाला का क्रम से कवितामय प्रयोग


*अ* चानक

*आ* कर मुझसे

*इ* ठलाता हुआ पंछी बोला


*ई* श्वर ने मानव को तो

*उ* त्तम ज्ञान-दान से तौला


*ऊ* पर हो तुम सब जीवों में

*ऋ* ष्य तुल्य अनमोल

*ए* क अकेली जात अनोखी


*ऐ* सी क्या मजबूरी तुमको

*ओ* ट रहे होंठों की शोख़ी


*औ* र सताकर कमज़ोरों को

*अं* ग तुम्हारा खिल जाता है

*अ:* तुम्हें क्या मिल जाता है.?


*क* हा मैंने- कि कहो

*ख* ग आज सम्पूर्ण

*ग* र्व से कि- हर अभाव में भी

*घ* र तुम्हारा बड़े मजे से

*च* ल रहा है


*छो* टी सी- टहनी के सिरे की

*ज* गह में, बिना किसी

*झ* गड़े के, ना ही किसी

*ट* कराव के पूरा कुनबा पल रहा है


*ठौ* र यहीं है उसमें

*डा* ली-डाली, पत्ते-पत्ते

*ढ* लता सूरज

*त* रावट देता है


*थ* कावट सारी, पूरे

*दि* वस की-तारों की लड़ियों से

*ध* न-धान्य की लिखावट लेता है


*ना* दान-नियति से अनजान अरे

*प्र* गतिशील मानव

*फ़* रेब के पुतलो

*ब* न बैठे हो समर्थ

*भ* ला याद कहाँ तुम्हें

*म* नुष्यता का अर्थ.?


*य* ह जो थी, प्रभु की

*र* चना अनुपम...


*ला* लच-लोभ के 

*व* शीभूत होकर

*श* र्म-धर्म सब तजकर

*ष* ड्यंत्रों के खेतों में

*स* दा पाप-बीजों को बोकर

*हो* कर स्वयं से दूर

*क्ष* णभंगुर सुख में अटक चुके हो

*त्रा* स को आमंत्रित करते

*ज्ञा* न-पथ से भटक चुके हो.!!


👍👍👍👌👌👌👌👌

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें