सोमवार, 28 सितंबर 2020

शहीदेआजम की संसद में तस्वीर

संसद भवन - भगत सिंह का चित्र किसने बनाया

संसद भवन में एक चित्र  शहीद भगत सिंह और उनके साथी कामरेड बटुकेश्वर दत्त का भी लगा हुआ है। इसे महाराष्ट्र के चित्रकार ए.बी. मणकपुरे ने बनाया था। इस 36x28  साइज के चित्र में दोनों के चेहरे के भावों को मणकपुरे जी ने बेहद शानदार तरीके से उभारा है।


 हरेक शख्स इस चित्र को कुछ पल देखने के बाद नमन करके ही आगे निकलता है। इसी संसद में, इन दोनों क्रातिकारियों ने 8 अप्रैल 1929 को बम फेंका था। तब इसे सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली कहा जाता था। ये बम फेंकने के बाद इंनकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे थे। इस चित्र को संसद सदस्य श्री सुरेंद्र मोहन ने सोनीपत की भारतीय स्वतंत्र स्मारक समिति की ओर से भेंट किया था। 


ये दोनों सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में सेफ़्टी बिल पेश होने से दो दिन पहले 6 अप्रैल, 1929 को गए थे। दरअसल येसेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली को कायदे से देखने गए थे ताकि ये जाने लें कि कि पब्लिक गैलरी किस तरफ़ हैं और किस जगह से वहाँ बम फेंके जाएंगे।

 भगत सिंह, कश्मीरी गेट, 4 अप्रैल, 1929

शहीद भगत सिंह ने कश्मीरी गेट के  रामनाथ स्टुडियो से 4 अप्रैल, 1929 को फोटो खिंचवाया था। वह उन्होंने हैट पहनकर खिंचवाया था। तब उनके साथ बटुकेश्वर दत्त भी थे। 


उन्होंने भी फोटो खिंचवाया था।  भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपबल्किन आर्मी ( एचएसआरए) के सदस्य जयदेव कपूर भी रामनाथ फोटो स्टुडियो गए थे। कपूर ने ही संसद पर हमले की सारी योजना की रणनीति बनाई थी। 


रामनाथ फोटो स्टुडियो  कश्मीरी गेट में सेंट जेम्स चर्च के पास  खैबर  रेस्तरां के पास से चलता था।रामनाथ स्टुडियो सन 1990 के आसपास बंद हो गया था। भगत सिंह पर लंबे समय से शोध कर रहे श्री Rajshekhar Vyas बताते हैं कि रामनाथ स्टुडियो में भगत सिंह की बड़ी सी फोटो लगी हुई थी।

 बहरहाल, बम फेंकने की घटना के बाद रामनाथ फोटो स्टुडियों पर भी पुलिस बार-बार पूछताछ के लिए आने लगी थी। जयदेव कपूर ने भगत सिंह और दत्त के फोटो और नेगेटिव बाद में रामनाथ फोटो स्टुडियो में जाकर लिए थे।


 कश्मीरी गेट में एक ए.आर.दत्त नाम का भी बेहद खास फोटो स्टुडियो हुआ करता था। वह अब गुरुग्राम चला गया है।

 दिल्ली में भगत सिंह की पहली प्रतिमा कौन सी

भगत सिंह ने इसी दिल्ली में अपनी भारत नौजवान सभा का  हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में विलय किया और काफी विचार-विमर्श के बाद आम सहमति से एसोसिएशन को एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।


 ये अहम बैठक 8- 9 अक्तूबर 1928 को फिरोजशाह कोटला मैदान से सटे मैदान थी। इसमें चंद्रशेखर आजाद, बिजय कुमार सिन्हा,भगवती चरण वोहरा,शिव वर्मा जैसे क्रांतिकारियों ने भाग लिया था।  यहां 2005 में भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव की एक बड़ी आदमकद मूर्ति  लग गई है।


 कम से कम अब ये तो पता चल जाता है कि इस स्थान का भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन से क्या संबंध था। इससे पहले तो यहां एक मिटता हुआ स्मृति चिन्ह लगा हुआ था।इसे मूर्तिशिल्पी राम सुतार जी ने बनाया था।  ये प्रतिमा 9 फीट ऊंची है।  राजधानी में संभवत: पहली भगत सिंह की प्रतिमा सन 1995 में स्थापित हुई। ये अष्टधातु की प्रतिमा है।

कैसी-कैसी प्रतिमाएं भगत सिंह की

शहीद भगत सिंह की संसद भवन और दिल्ली विधान सभा में प्रतिमाएं लगी हैं। संसद भवन में उन्हें पगड़ी में दिखाया गया है, जबकि विधानसभा में वे हैट पहने हैं। दोनों से कुछ जानकर अलग-अलग कारणों से नाखुश रहे हैं। 


उन्हें संसद भवन में लगी 18 फीट ऊंची कांस्य की प्रतिमा में पगड़ी में दिखाया गया हैं। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल,1929 को केन्द्रीय असेम्बली ( अब संसद भवन) में बम फेंका था। उस घटना के लगभग 80 वर्षों के बाद भगत सिंह की प्रतिमा संसद भवन में सन 2008 स्थापित की गई थी। इसके लगते ही बवाल चालू हो गया था। कहते हैं कि भगत सिंह ने सन 1928 से 23 मार्च, 1931 को फांसी दिए जाने तक पगड़ी नहीं पहनी। 


कुछ इतिहासकारों और भगत सिंह के संबंधी मानते रहे हैं कि संसद भवन में लगी प्रतिमा में उन्हें सही से नहीं दिखाया गया। भगत सिंह यूरोपियन स्टाइल की हैट पहनते थे,तो फिर उन्हें पगड़ी में क्यों दिखाया गया? भगत सिंह पर शोध करने वाले प्रो.चमनलाल तो यहां तक कहते हैं कि उन्हें हैट में ना दिखाना अक्षम्य है। 


हालांकि संसद भवन में लगी भगत सिंह की प्रतिमा के शिल्पकार राम सुतार कहते हैं कि उन्हें जैसी भगत सिंह की मूर्ति हुसैनीवाला में लगी है, उसी तरह की मूर्ति तैयार करने के लिए कहा गया था। उसमें वे हैट में नहीं है। उधर, दिल्ली विधानसभा में सन 2016 में स्थापित अर्धप्रतिमा में भगत सिंह हैट पहने है। इस पर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (डीएसजीसी) ने विरोध जताया था। इसका कहना था कि भगत सिंह सिख थे और उनकी प्रतिमा में उन्हें सिख के रूप में दिखाया जाना चाहिए था।

 

 

नव भारत टाइम्स में प्रकाशित लेख के अंश

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