बुधवार, 19 अगस्त 2020

लजीज दक्षिण भारतीय थाली का आनंद / विवेक shukla

खाते रहोआंध्र भवन की थाली 


आप कभी खुद आजमा के देख लें कि थ्रीव्हीलर ड्राइवर आपको आंध्र भवन चलने के लिए मना नहीं करेंगे। पर, वे हां करने से पहले प्यार से पूछ सकते हैं, “जहां की थाली मशहूर है।“ हर समय स्वादिष्ट भोजन करने या उसकी योजना बनाने वाली दिल्ली के लिए आंध्र भवन में बार-बार जाकर भरपेट सुस्वादु भोजन करना कमजोऱी बन चुका है। 

इसकी मोटा-मोटी दो वजहें हैं। पहली, आंध्र भवन की वेज या नान वेज थाली जेब पर भारी नहीं पड़ती है। दूसरी, यहां पर आप जितना चाहें भोजन कर सकते हैं। आपको बढ़ते बिल का डर परेशान नहीं करेगा। एक बार थाली ले ली तो खाते रहिए। कौन सा दिल्ली वाला होगा जो यहां पर कम से कम एक बार पेट पूजा के लिए नहीं आया होगा।


दरअसल आंध्र भवन कैंटीन को दिल्ली वालों के लिए शुरू करने का श्रेय जाता है एनटी रामाराव को। आंध्र प्रदेश का 1983 में मुख्यमंत्री बनने के बाद वे इधर आकर ठहरने लगे। तब तक इधर की कैंटीन से यहां आने वाले सांसदों, विधायकों और दूसरे अफसरों के लिए भोजन परोसा जाता था। जब रामाराव ने इधर के शेफ के हाथों के बनी इडली, वड़ा,डोसा, दम चिकन बिरयानी,गर्मा-गर्म पूड़ी, गाढ़ी पीली दाल,दो सब्जियों को मिलाकर बनी डिश का भोग लगाया तो उन्होंने तुरंत आदेश जारी कर दिया कि इस लजीज भोजन से दिल्ली वालों को वंचित ना रखा जाए। उसके बाद आंध्र भवन कैंटीन के दरवाजे खुल गए।


 आजकल के मनहूस कोरोना काल की बात ना करें तो सामान्य दिनों में इधर असंख्य भोजन भट्ट लजीज थाली पर रोज टूट पड़ते हैं। एक बार आपको इधर बैठने की जगह मिल जाए तो फिर आप तबीयत से खाते रहिए।


 सच में यहां पर भोजन बड़े ही प्यार से खिलाया जाता है। अगर आप जल्दी भोजन खाकर उठ गए तो खिलाने वाला कर्मी अपराध बोध की स्थिति में आ जाता है। वह एक बार आपसे पूछ लेता है, “ सर,इतनी जल्दी क्यों उठ गए?“ अगर सामान्य दिनों में यहां पर नौकरी पेशा लोगों से लेकर कॉलेजों में पढ़ने वाले और दूसरे चटोरे आते हैं, तो रविवार को आंध्र भवन में दिल्ली सपरिवार आती हैं। 


उस दिन यहां पर खास तौर पर उपलब्ध रहता है दिव्य हैदराबादी दम चिकन। हालांकि इसमें थोड़ी सी मिर्च की मात्रा अधिक रहती है। पर अपनी प्लेट को कोई नहीं छोड़ता। आखिर यहां दिल्ली आती हैं। दिल्ली वालों ने स्वादिष्ट और रुचिकर भोजन छोड़ना नहीं सीखा है। आंध्र भवन में फ्राई मटन का जायका भी लिया सकता है। इधर कस कर भोजन करने के बाद आपकी मिष्ठान खाए बिना तृप्ति नहीं होगी।


 इधर मिष्ठान रोज बदलता है। कभी खीर, कभी हलवा। पर  हलवे का स्वाद अपने हलवे से उन्नीस ही माना जाएगा।   

अगर आप सुबह का नाश्ता करना चाहते है, तो आप यहां आकर चाय-कॉफी के साथ इडली, वड़ा और डोसा खाइये। सुबह से ही यहां खाना खाने वाले टूटने लगते हैं।


 कनॉट प्लेस के मद्रास होटल के असमय बंद होने के बाद लगा था कि अब दिल्ली में उत्तम दक्षिण भारतीय भोजन कहां नसीब होगा। पर आंध्र भवन ने उस कमी को खलने नहीं दिया।

ये लेख कुछ हफ्ते पहले NBT के मेरे कॉलम S addi  Dilli में पब्लिश हुआ था।


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