शनिवार, 1 अगस्त 2020

रवि अरोड़ा की नजर से

रसोई में ताँक झाँक


रवि अरोड़ा

ईद उल अजहा का दिन हो और मुस्लिमों की धार्मिक परम्परा क़ुर्बानी को लेकर कुछ लोगों द्वारा ज़हरीले तीर न चलाये जाएँ,  एसा हो नहीं सकता । इस बार भी मुस्लिमों को निशाना बनाने के लिए शाकाहार बनाम मांसाहार की बहस छेड़ी जा रही है और ख़ून व माँस के लोथड़ों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साँझा की जा रही हैं। मांसाहार का पैरोकर मैं भी नहीं मगर इतना ज़रूर जानता हूँ कि हर बार आज ही के दिन यह बहस क्यों छेड़ी जाती है ? हो सकता है कि इस तरह की बहस करने वाले लोग शाकाहारी हों मगर वे लोग शाकाहारी हैं भी, यह कैसे स्पष्ट हो ? तमाम सर्वे तो यही कह रहे हैं कि सत्तर फ़ीसदी हम भारतीय माँसाहारी हैं मगर सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार करते हुए शर्माते हैं । अब मुल्क में मुस्लिम तो केवल 14 फ़ीसदी हैं फिर ये बाक़ी के 56 पटसेंट माँसाहारी कौन हैं ? अब जहाँ तक धर्म का सवाल है तो दुनिया का कोई भी धर्म मांसाहार की पैरवी नहीं करता , जी हाँ इस्लाम भी नहीं । हर धर्म में तमाम जीवों से प्रेम करने की सलाह दी गई है मगर फिर भी कोई एसा धर्म नहीं जिसके अनुयायी माँसाहारी न हों । यूँ भी भोजन तो सदैव से ही पोषण और स्वाद का मामला रहा है , इसे धर्म से जोड़ कर भला देखा भी क्यों जाये ? 

क़ुरान शरीफ़ में तमाम सूरा हैं जो जानवरों से प्रेम करने की बात करती हैं । धरती से लेकर जन्नत तक हर जगह स्वादिष्ट भोजन का ज़िक्र खुदा द्वारा जब होता है तो फलों की ही बात होती है । स्वयं पैग़म्बर मोहम्मद साहब भी शाकाहार पसंद करते थे और बहुत कम अवसरों पर मांसाहार खाते थे । क़ुरबानी की इब्राहिम वाली कहानी भी इस्लाम में अरब संस्कृति के चलते आई । उधर, एसा भी नहीं है कि सभी मुस्लिम माँसाहारी हैं और बक़रीद पर क़ुर्बानी करते ही हों । दुनिया भर में शाकाहारी मुस्लिमों की अनेक संस्थाएँ हैं और हज के दौरान भी उनके लिए क़ुरबानी की रस्म ख़ास तरीक़े से सम्पन्न होती है । 

इंसान को माँसाहारी होना चाहिए अथवा शाकाहारी यह इंसानी शारीरिक संरचना से अधिक नैतिकता अथवा प्रकृति से जुड़ा सवाल है मगर इसे धर्म से जोड़ कर देखना तो सरासर एक क़िस्म की राजनीति ही है । ग़ौर से देखने वाली बात यह है कि नैतिकता के ही तक़ाज़े से दुनिया भर में लोगबाग़ अब शाकाहार की ओर आकर्षित हो रहे हैं । हालाँकि माँस का उत्पादन बढ़ रहा है मगर प्रतिशत के हिसाब से देखें तो शाकाहारियों की तादाद बढ़ी है । दरअसल दुनिया भर में मांसाहार सम्पन्नता की निशानी के तौर पर भी देखा जाता है अतः 1960 के मुक़ाबले माँस का उत्पादन पाँच गुना बढ़ा है । वैसे इस दौरान दुनिया की आबादी भी दोगुनी से अधिक हुई है । उधर, भारत में भी शाकाहारियों का प्रतिशत बढ़ा है । 2004 में ये 25 प्रतिशत थे जो अब 30 फ़ीसदी हो गये हैं । अनेक सर्वे इस मिथ की भी पोल खोलते हैं कि जैसा तन वैसा मन। फ़ौज में बहादुरी की मिसाल क़ायम करने वाले पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के लोग सर्वाधिक शाकाहारी हैं जबकि आम तौर पर दब्बू माने जाने वाले पश्चिमी बंगाल, तेलंगाना, आन्ध्र और उड़ीसा के लोग सर्वाधिक माँसाहारी हैं । भोजन और स्वभाव का कोई मेल नहीं यह साबित करने को यह बताना ही काफ़ी है कि हिटलर शाकाहारी था मगर स्वामी विवेकानंद को भोजन में मछली बहुत पसंद थी । अहिंसा के घोर पुजारी और ज़िमीक़न्द भी न खाने वाले जैन रुपया पैसा कमाने में पूरे आक्रामक हैं मगर परमार्थ की बात करने वाले बंगाली साधू-सन्यासी गंगा फल यानि मछली के बड़े प्रेमी हैं । बहुत साल पहले कहीं पढ़ा था कि अधिकांश माँसाहारी व्यक्ति भी अपने सामने जानवर कटते नहीं देख सकते । एसे में तमाम सरकारों को जो शाकाहार को बढ़ावा देना चाहती हैं उन्हें सभी वधशालाओं की दीवारें शीशे की बना देनी चाहिये । यह विचार मुझे सटीक लगता है । सचमुच यदि शाकाहार को बढ़ावा देने की हमारी मंशा है तो हमें एसे ही कुछ अभिनव प्रयोग करने चाहिये । मगर साथ ही साथ उनकी भी नकेल कसनी चाहिये जो धर्म के नाम पर दूसरों की रसोईयों मे ताँकाझाँकी करते हैं ।

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