शनिवार, 22 अगस्त 2020

बाबूजी की कुश्ती कथा / नरेंद्र कुमार सिंह

 कुश्ती की कहानी, बाबूजी की जुबानी


मित्रो, मैं आपको बता दूं कि मेरे पिताजी राष्ट्रीय स्तर के पहलवान थे। बिहार पुलिस में थे। 1955-1964 तक बिहार में उनके कद के एकाध पहलवान ही थे। मैंने उनसे उनके अलावा अन्य पहलवानों की अनगिनत कहानियां सुनी हैं। आज उनकी कहानियों का मैं एक सिलसिला शुरू कर रहा हूं। इसके अंतर्गत मूल रूप से उन्हीं कुस्तीयों और पहलवानों की चर्चा करूंगा, जिनके साथ मेरे बाबूजी कुश्ती लड़े थे। मेरे मन में यह सिलसिला शुरू करने का विचार क्यों आया, यह भी एक दिलचस्प घटना है।

एक बार मैंने बाबूजी से पूछा कि आपकी नजर में आपकी सबसे कांटे की कुश्ती किसके साथ हुयी थी। बाबूजी थोड़ी देर सोचते रहे और फिर कहा कि रामधारी यादव के साथ हुयी कुस्ती को मैं सबसे कांटे की कुश्ती मानता हूं यानी सबसे कड़ा मुकाबला। हां, फिर यह भी बताया कि रामधारी यादव जी आजमगढ़ के रहनेवाले थे और हिन्द केसरी मंगला राय के सबसे काबिल शागीर्द रहे थे। हेवी वेट के पहलवान थे वे। जाहिर है कि मेरे बाबूजी भी हेवी वेट के ही पहलवान थे। इसके अलावा बाबूजी ने उनके दांव-पेंच और उनकी कुश्ती-शैली के बारे में भी बताया था। मेरे मन में रामधारी यादव के बारे में और जानने की इच्छा तो बनी रही, लेकिन उसके लिए मैंने विशेष प्रयास नहीं किया।

चंद दिनों पहले मैं फेसबुक देख रहा था, तो अचानक एक पेज दिखा, जो रामधारी यादव के नाम से था। पहले तो मुझे आश्चर्य हुआ कि वे तो कब के गुजर गये होंगे। लेकिन चूंकि पेज पर एक बहुत ही सुघर पहलवान की आईडी थी, इसलिए मैंने मैसेंजर पर मैंने मेसेज किया कि क्या ये उसी रामधारी यादव जी की तस्वीर हैं, जो मंगला राय के शागीर्द थे? यदि हां, तो इनके साथ मेरे पिताजी की कुश्ती हुई थी। वह कुश्ती मुंगेर में हुई थी. जिसमें मंगला राय स्वयं भी उपस्थित थे। मेरे पिताजी का नाम रामदेव सिंह था। जवाब आया कि मैं अपने चाचा जी से पूछकर कल बताउंगा। दो दिन बाद मेसेज आया कि हां, वही हैं और उनकी कुश्ती बाबू रामदेव सिंह पहलवान से हुयी थी। आगे यह भी बताया कि रामधारी यादव जी बताते थे कि रामदेव सिंह जैसा पहलवान इधर कोई नहीं था। जवाब देनेवाले का नाम अंकित यादव था। मैंने उनसे उनका फोन नंबर मांगा। उन्होंने मुझे अपना फोन नंबर भेज दिया। बातचीत से पता चला कि अंकित यादव महाबली रामधारी यादव के पौत्र हैं और 86 किलोग्राम कैटेगरी में उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में भाग ले चुके हैं। अभी उनकी उम्र केवल 23 वर्ष की है। अंकित उत्तर प्रदेश पुलिस में हैं औऱ अभी उनकी पोस्टिंग बरेली में है।

आइये, अब सुनाता हूं बाबूजी की जुबानी। पिताजी ने बताया –

तब मैं मुंगेर पुलिस में था औऱ मुंगेर शहर में ही पोस्टिंग थी। बाबूजी ने बताया कि मंगला राय साल में एक बार मुंगेर, बड़हिया जरूर जाते थे। (यह बात सन् 1960-61 की होगी) उस बार जब मंगला राय मुंगेर गये, तो रामधारी यादव को भी अपने साथ लेते गये थे। जाड़े के दिन थे। एक सुबह जब पिताजी अखाड़े पर दंड-बैठक लगा रहा थे, तभी तीन-चार लोग वहां आए। मंगला राय और रामधारी यादव को देखकर ही पहचाना जा सकता था कि वे पहलवान हैं, बाबूजी ने बताया। तब तक मेरे पिताजी इन दोनों लोगों से अपरिचित थे। हां, उन्होंने मंगला राय का नाम जरूर सुन रखा था।

दरअसल, वे लोग गिरी पहलवान से मिलना चाहते थे, जो मेरे पिताजी के उस्ताद थे। उनलोगों ने तब तक गिरी जी को देखा नहीं था, केवल उनके बारे में सुना था। वैसे गिरी जी कम वजन के पहलवान थे। वे 70 किलोग्राम भार वर्ग के पहलवान थे, लेकिन उनकी तैयारी ऐसी थी कि वजन उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखता था। जिस समय मंगला राय औऱ रामधारी यादव वहां पहुंचे, उस समय पिताजी कसरत कर रहे थे और गिरी जी अखाड़े के एक किनारे चादर ओढ़कर बैठे थे और खैनी बना रहे थे। वहां पहुंचकर मंगला राय ने अपना परिचय दिया और कहा कि वह गिरी पहलवान से मिलने आए हैं। गिरीजी ने मेरे पिता की ओर इशारा करते हुए कहा कि जो कसरत कर रहे हैं, वही गिरी जी हैं। मंगला राय और रामधारी ने मेरे पिता को भरपूर नजरों से देखा। देखने के बाद मंगला राय ने कहा – जैसा सुना था, वैसा ही देखा। फिर बातचीत होने लगी और तब भेद खुला कि जो कसरत कर रहे थे, वे गिरी जी नहीं, बल्कि उनके शागीर्द रामदेव सिंह पहलवान हैं।

बातों-बातों में कुश्ती लड़ने की बात होने लगी। तय हुआ कि रामधारी यादव जी से मेरे पिताजी की कुश्ती होगी। तैयारी के लि 15 दिनों का समय भी दिया गया। हमने पिताजी से पूछा कि आपने तैयारी कैसे की, तो उन्होंने बताया कि तब मैं रोज एक पाव घी, तीन किलो दूध, सौ बादाम और अन्य चीजें प्रतिदिन खाता था। लगभग तीन हजार दंड और इतना ही बैठक करता था। गिरी जी ने मेरे पिताजी को बताया कि रामधारी यादव टांग दांव का महारथी हैं। अगर उन्होंने टांग दांव लगा दिया, तो किसी भी पहलवान के लिए संभाल पाना मुश्किल होगा। पिताजी ने बताया कि रामधारी यादव के बारे में एक कहावत कही जाती थी कि उनके टांग दांव पर तो ताड़ का पेड़ भी झूक जाता है।

नियत तिथि को मेरे पिताजी औऱ रामधारी यादव जी अखाड़े में उतरे। पिताजी ने बताया कि मैं ढाक दांव लगाने का निश्चय कर चुका था। मेरे पिताजी के बारे में कहा जाता था कि यदि रामदेव सिंह ने ढाक दांव लगा दिया, तो आप बच तो सकते हैं, लेकिन तब, आपका कोई न कोई न कोई अंग जरूर भंग होगा। उस दिन कुश्ती देखनेवालों की अच्छी-खासी भीड़ जुटी हुयी थी। अखाड़े में उतरकर दोनों पहलवानों ने हाथ मिलाए। जब तक पिताजी सावधान होते, तब तक रामधारी यादव ने अपने दाहिने पैर से उनके ऊपर वही टांग दांव लगा दिया। बाबूजी ने बताया कि एक बार तो मैं सकते में ही आ गया, लेकिन गिरी जी ने कहा था कि यदि एक पांव पर अखाड़े का पूरा चक्कर लगा दोगे, तो टांग दांव विफल हो जाएगा। मैं एक पैर पर ही अखाड़े का एक चक्कर लगा दिया और रामधारी यादव का दांव विफल हो गया। जैसे ही रामधारी जी का दांव विफल हुआ, पिताजी ने बाएं पैर से वही टांग दांव रामधारी यादव पर कस दिया। लेकिन वाह रे पहलवान, उन्होंने भी अखाड़े का एक चक्कर एक पैर पर लगा दिया। अब दोनों पहलवान बाजुओं का जोर आजमाने लगे। दोनों एक-दूसरे को अपनी पहलवानी कला का परिचय देने लगे। इसी क्रम में जब एक बार पिताजी ने रामधारी यादव के कांधे पर अपना दाहिना हाथ रखा ही था कि रामधारी यादव ने एकहरी उतार लगा दिया। पिताजी जानते थे कि यदि रामधारी यादव उनके पीछे जाने में कामयाब रहे, तो मुश्किल हो सकती है। बस क्या था, पिताजी ने गदहलेट दांव का इस्तेमाल किया और रामधारी यादव जी कमर छोड़ने के लिए मजबूर हो गए। पिताजी ने बताया कि एक बार उन्हें निकास दांव लगाने का मौका मिल गया। दांव तो सही लगा, लेकिन रामधारी यादव गिरने के पहले ही पलट गए औऱ पिताजी का दांव बेकार गया। दोनों पहलवान एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो रहे थे, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था। मजे की बात यह कि दोनों पहलवान एक-दूसरे को कुश्ती के दौरान ही दाद दे रहे थे।

जब 12 मिनट बाद भी कुश्ती का फैसला नहीं हुआ, तो मंगला राय दर्शक दीर्घा से उठकर अखाड़े के पास आ गए। एकाध मिनट तक तो वे कुश्ती देखते रहे, फिर रामधारी को संबोधित करते हुए कहा – का रामधारी 15 मिनट होई गये, अबहीं कुश्ती फरियायल नाहीं। का बात हौ। रामधारी यादव ने कहा – गिरी जी इनके पक्का बना देले हउअन, बाते नइखन सुनत। सब आजमा लिहलीं, फरियाइल मुश्किल बा। 15 मिनट बीतते-बीतते दोनों पहलवान इतने थक गए थे कि अब एक-दूसरो का बांह पकड़े अखड़े में खड़े थे। कोई किसी पर दांव लगाने की कोशिश नहीं कर रहा था। तब मेरे पिताजी ने मंगला राय को कहा -  उस्ताद, अभी तो 15 मिनट ही कुश्ती हुई है, पंद्रह घंटा भी चलेगा, तो हम लड़ने के लिए तैयार हैं। इसके बाद रेफरी ने कुश्ती को बराबर की कुश्ती करार दे दिया। अखाड़ा से निकलने के बाद रामधारी यादव ने मेरे पिताजी से कहा – पहलवान, तुम ये कुश्ती गलत जगह पर लड़ गये। यदि यह कुश्ती बनारस या आसपास हुयी होती, तो आज तुम हीरो होते। उस इलाके में कोई ऐसा पहलवान नहीं, जो मुझसे बराबर की कुश्ती लड़ सके।

अब पता चला कि रामधारी यादव जी आजमगढ़ के देवपार के रहनेवाले हैं। उनके नाम पर वहां सड़क है और वहां उनकी एक खूबसूरत प्रतिमा लगायी गयी है। वहां जो भी राजनेता जाते हैं, वे रामधारी यादव जी की प्रतिमा पर फूल अवश्य चढ़ाते हैं। उनका पोता अंकित यादव उनकी इस महान विरासत का वारिस है। उसे मेरी अशेष शुभकामनाएं।

मित्रों, यह कहानी आपको कैसी लगी, यदि बताएंगे तो मुझे संतोष मिलेगा और आगे की कहानी भी लिखुंगा। अगली किश्त का इंतजार करें।

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