शनिवार, 25 जुलाई 2020

मैडम बहुत ईमानदार हैं' / सुभाष चंदर


जनसंदेश टाइम्स के शनिवारी व्यंग्य स्तंभ में  व्यंग्य रचना '



           
मैडम बहुत ईमानदार हैं - सुभाष चंदर

 दफ्तर में काफी टनाटन किस्म की गहमा-गहमी थी। हर कोई भाग-दौड़ में मुब्तिला था। टांगों और विचारों में जबर्दस्त कम्पीटीशन था। नए बॉस के रूप में जब से दिल्ली से मैडम के आने की खबर सुनी थी,सबका हाल खराब था। होना ही था क्योंकि सवाल नेहरू जी के सहकारिता के सिद्धान्तों के पालन का था,जब तक दीवान साहब बॉस थे,तब बड़े मज़े से सिद्धान्त पालन कार्यक्रम सम्पन्न होते थे। सब लोग मिल-बांटकर खाते थे। सीधा फार्मूला था छोटी सीट-कम खाओ,बड़ी सीट ज्यादा खाओ,लेकिन हिस्सा ऊपर तक पहुंचाओ। अच्छा-भला दफ्तर चल रहा था,पर दीवान साहब की सेवानिवृति ने सब मटियामेट कर दिया।
ऊपर से कैलाश यह खबर और उड़ा लाया कि नई बॉस मैडम देखने में जितनी सुन्दर है,अनुशासन में उतनी ही सख्त। ईमानदार इतनी की चाय तक अपने पैसों की पीती है। इस खबर से सारे दफ्तर का हाज़मा खराब हो गया,जो औरत चाय तक अपने खर्चे से पीती हो,उससे दफ्तर की व्यवस्था ठीक रखने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती थी। खबर थी भी दुरूस्त क्योंकि कैलाश बाबू का साला हैड ऑफिस में बड़े साहब का ड्राइवर था,सो उससे बेहतर कौन जान सकता था ?
 पुराने बॉस और स्टाफ में तो गज़ब का प्रेम था।ईमानदारी और प्रेम की ऐसी गंगा बह रही थी कि सब मज़े से गहराई में तैरे जा रहे थे।   नई बाॅस के आने पर ऐसा प्रेम कहां से लाया जाएगा। प्रेम की सारी फाइलें बंद करनी पडें़गी। चलो प्रेम-व्रेम तो देखा जाता । मामला सिद्धांत का था,सो सारे सिद्धांत प्रेमी चिन्तित थे। सिर जोड़कर गुत्थी का हल निकालने में जुटे थे। पर हल किसान का भारी हल बन गया,शहरी बाबुओं से नहीं उठा।
अगले दिन कार्यालय का मौसम काफी बदला-बदला सा था । सुबह ठीक नौ बजे मैडम दफ्तर पधार गईं। गोरा चिट्ट  रंग । लंबा ऊंचा कद और आंखे ,नाक ,कान सब से टप टप टपकता रुआब । स्टाफ इस रुआब के पानी में भीग गया और थर थर वाली गति से कांपने लगा। उधर मैडम ने आते ही बड़े बाबू को बुलाया । फिर उन्होंने सारे स्टाफ को बुलाकर मीटिंग की। सबकी जमकर क्लास ले ली। बड़े बाबू से चपरासी तक  सभी को  डांट की भारी वाली डोज़ पिलाई । एकाध ने बीच-बीच में चमचागिरी द बैस्ट पाॅलिसी के तहत मक्खन लगाने की कोशिश की थी तो उसे लताड़ चखनी पड़ी। सब के अरमान शांत हो गये।  यानी कल की सारी योजनाएं टांय-टांय फिस्स हो गयी और डरावनी फिल्मों का ‘हाय राम अब क्या होगा’जैसा दृश्य उपस्थित होने लगा।
दोपहर के बाद तो एक और क्रांतिकारी टाइप की घटना घटी। मैडम ने कमाई वाली सीटों के सभी कर्मचारी तलब किये और उन्हें हिदायत दे दी कि भविष्य में सारे ठेकेदारों को सीधे उनसे मिलाया जाए। लोग सिर्फ फाइल प्रस्तुत करें। मैडीकल,छुट्टी आदि की फाइलें चैक कीं। निर्देश दिए। स्टोर और रख-रखाव विभाग की फाइलों की भी जांच की। कई जगह लाल निशान लगाए। ताक़ीद कर दी कि उनकी परमीशन के बिना दस पैसे की खरीद भी न की जाये। सब हतप्रभ थे।  पर यहीं पर बस कहां हुई ।
अगले दिन मैडम ने चैक की हुई फाइलों पर नोट लगाये और तीन लोगों को ‘मेमो’जारी कर दिए। मेमो का प्रसाद पाने वालों में बड़े बाबू भी थे। पूरा दफ़्तर सकते ही हालत में था। मेमो भी काफी अलग किस्म के थे। स्टोरकीपर रावतजी  के मेमो में अनियमितताओं का उल्लेख था। मसलन एक ही फर्म में खरीदारी क्यों की गयी,बाकी फर्मों से सम्पर्क क्यों नहीं किया गया?फर्नीचर की खरीद की मंजूरी अन्तिम दिन पुराने बाॅस से क्यों ली गयी आदि। बड़े बाबू के मेमो में ठेकेदारों से मिलकर दफ़्तर को आर्थिक हानि पहुंचने का छिपा आरोप था। मैडिकल वाले  राजन बाबू के मेमो में भी कुछ ऐसे ही आरोप थे। सभी मेमो के आखिरी पैरा चेतावनी भरे,उसमें भविष्य में ऐसा पाये जाने पर मुअत्तिल करने की धमकी थी। मेमों का जवाब सात दिन के भीतर देना था।
पूरे दफ्तर में भयानक किस्म की खामोशी विराजमान थी। आंखों में डर और होठों पर हाय राम,वाहे गुरु,या अल्लाह अब क्या होगा किस्म केक सवाल। सारा सहकारिता सिद्धान्त खतरे में था। पूरा दफ्तर इसी सिद्धान्त के सहारे चलता था। अब दफ्तर कैसे चलेगा?
अधिकांश सरकारी दफ्तरों की तरह यहां भी सहकारिता के तीन स्तर चलते थे। ठेकेेदारों से सीधे सम्पर्क वाली सहकारिता प्रथम श्रेणी की थी तो भंडार और खरीद विभाग वाली दूसरे नम्बर पर। तीसरे नम्बर पर आपसी सहकारिता यानी मैडीकल बिल,छुट्टी नकदीकरण,एल.टी.सी. आदि के मामलों वाली। प्रत्येक प्रकार की सहकारिता की कमीशन दें निश्चित थीं। मसलन एकाउन्ट्स में चैक मिलने की कमीशन एक परसेंट था तो प्रशासन विभाग में फाइल क्लीपर करने का डेढ़ परसेंट। चपरासी बड़े साहब से मिलाने में पार्टी का वजन देखकर रेट तय करता था। यानी सब कुछ आदर्श सरकारी कार्यालय की तर्ज़ पर था। आदर्श टूटने का खतरा था। सिद्धान्तों की इज्जत खतरे में थी।पैंतीस हजार के वेतन में होंडा सिटी कार के खर्च मैन्टेन करने का खतरा था। चपरासी की नई मोबाइक शक के घेरे में थी। बड़े बाबू की तिमंजिला कोठी की मैंटेनेंस खटाई में आ गयी थी। यानी सारे दफ़्तर वासियों पर,मुसीबत के जो भी बादल होते हैं,तबियत से गहरा गये थे।
कुल जमा एक हफ़्ते में आॅफिस का रंग-ढंग बदल गया। वर्मा जी कार की जगह बस से दफ़्तर आने लगे। बड़े बाबू ने नया प्लाॅट खरीदने का बयाना वापस ले लिया। चपरासी फिर से खटारा साईकिल पर आने लगा। यहां तक कि अपने पन्द्रह साल की नौकरी में हमेशा लेट आने वाले शर्मा जी तक ठीक दस बजे कार्यालय की सीढ़ियां चढ़ते पाये गये। लंच का टाइम दो घन्टे से एक घन्टे का हो गया। छाया मैडम शाम को ठीक पांच बजे दफ़्तर छोड़ने लगी। अंजना जी ने स्वेटर के डिजाइन की जगह टाइपराइटर पर अक्षरों के डिजाइन टाइप करने को तरज़ीह दी। यानी पूरा आॅफिस प्राइवेट दफ्तर सा नज़र आने लगा।
अब ठेकेदार लोग सीधे मैडम के कमरे में जाते। चर्चा करते। काम करते। टाइम पर भुगतान पाते। बड़े बाबू से लेकर एकाउन्टेंट तक सब उन्हें देखकर कल्पना करते काश उनके माथे पर शंकरजी की तरह एक नेत्र और होता तो वे उन्हें और मैडम को एक साथ भस्म कर देते। स्टोर से लेकर मैंटनैंस तक की सारी पार्टियों तक मैडम खुद चुनती। पुराने सभी ठेकेदारों की जगह नए ठेकेदारों ने ले ली। यानी अब सारा काम मैडम के कुशल हाथों में था। पार्टियां भी अब काफी खुश नज़र आती थीं। मैडम हर हफ्ते में मंगलवार को व्रत रखती और खुद कुछ न खाकर मीटिंग में उन्हें ईमानदारी का भाषण खिलातीं। अनुशासन बद्धता की चाय और सदाचार के बिस्कुट परोसे जाते। यानी अब दफ्तर वासियों की हालत यह थी कि वो ईमानदारी और सदाचार के तालाब में गले तक डूब गये। थोड़ा पानी और बढ़ जाता तो वे शायद जल समाधि ही ले लेते। दो लोगों को सस्पेंशन,एक को टर्मिनेशन और सभी को दो-चार मेमो का प्रसाद मिल चुका था। इससे भी ईमानदारी और अनुशासन बद्धता में गुणात्मक वृद्धि हुई। हृदय परिवर्तन कार्यक्रम जोर पकड़ गया।
मात्र छह महीनों में मैडम की ईमानदारी के चर्चे पूरे शहर में फैल गए। उनकी सख्ती और ईमानदारी की नज़ीर दी जाने लगीं। कहा जाता कि अफ़सर हो तो तोलानी मैडम जैसा जिसने इतने भ्रष्ट विभाग को सुधार दिया। मज़ाल है कि उनके होते हुए भ्रष्टाचार वहां पर भी मर सके। उनके लिये रिश्वत का पैसा हराम का पैसा है। वह तो कलियुग की देवी हैं वगैरहा... वगैरहा...
अखबारों के दफ़्तरों में भी यह खबर पहुंची। मीडिया ने भी उन्हें जल्दी ही मसीहा का दर्जा दे दिया। उनके बारे में हर हफ़्ते खबरें छपने लगीं। सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में उन्हें मुख्य अतिथि,अध्यक्ष आदि बनाकर लोग गौरवान्वित होने लगे। एक स्वयंसेवी संस्था ने तो उन्हें ऑनेस्ट पर्सन ऑफ द ईअर’के सम्मान के लिए चुन लिया। बाकायदा इसकी घोषणा हो गयी। इसकी सूचना बाहर के अखबारों में भी छपी। उन पर बाकायदा लेख तक लिखे गए।
इसी समय में निकट के जिले के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने अपने एक खोजी रिपोर्टर को मैडम का इन्टरव्यू करने का जिम्मा दिया। कार्यक्रम बना कि इन्टरव्यू को रविवारीय पृष्ठ पर मैन लीड के रूप में छापा जाए। सो रिपोर्टर विजय ने मामले की महत्ता को देखते हुए पूरी तैयारी के साथ प्रस्थान किया। विजय ने सोचा कि चूंकि वह खोजी पत्रकार है सो उसका इंटरव्यू यूनीक तो होना ही चाहिए। इसके लिए मैडम संबंधित सभी लोगों के उनके विषय मे विचार भी लिए जाएं।
इसलिए सबसे पहले वह मैडम के दफ्तर पहुंचे। वहां सभी लोग हृदय की बाईपास सर्जरी करा चुके। सबके दिल मैडम की ईमानदारी के किस्सों की ताक़त से ही धड़क रहे थे। सबने एक से बढ़कर एक किस्से सुनाए। उनकी ईमानदारी के आगे खैरनार जैसों को फीका कर दिया। हरीश ने तो उनकी तुलना गाँधीजी तक से करने की कोशिश की। मार्च का महीना था,गोपनीय रिपोर्ट (सी.आर.) लिखी जानी थी और प्रसंगवश हरीश को सस्पैंड होने की धमकी कल ही मिली थी। उसका ऐसी तुलना करने का पूरा हक बनता था। मैडम चूंकि शहर से बाहर थीं। इसलिए आज कार्यालय में उनकी सैंडिल-धूलि नहीं पड़ी थी। शाम को उन्हें लौटना था। ज़ाहिर है कि उनसे सीधे घर पर ही मिला जा सकता था। सो विजय ने उनके घर का पता मांगा। आश्चर्य?किसी को भी उनके घर का पता नहीं मालूम था। बड़े बाबू तक को नहीं। कोई भी उस मंदिर के दर्शन करने का सौभाग्य न पा सका था। किसी तरह फाइल में से ढूंढ़-ढांढ़ कर पता दिया गया। लगे हाथों विजय ने पार्टियों और ठेकेदारों के पते भी मांग लिए। पत्रकार जानकर बड़े बाबू ने वे भी उपलब्ध करा दिए। विदाई के समय बाबू लोग अपने नाम बता-बताकर मैडम की तारीफ़े करना फिर नहीं भूले। विजय बाबू भयंकर रूप से प्रभावित थे,उन्हें भी इस सबको सुनकर मैडम पर श्रद्धा हो आई।
बाहर आने के बाद उन्होंने सोचा कि अभी तो काफ़ी समय है,क्यों ना पहले ठेकेदारों और स्पलायरों की भी मैडम के बारे में राय ले ली जाए। इण्टरव्यू में और जान पड़ जाएगी। फिर सोचा कि कहीं ऐसा ना हो कि पत्रकार जानकर वे लोग बिदक जाएं,बात करने से इंकार कर दें। सो हुलिया बदलकर आम आदमी बनकर पायजामा उतारा। टी-शर्ट और जीन्स धारण की। फटीचर चश्में की जगह पाॅवर वाला फैशनेबुल फोटो क्रोमिक चश्मा लगाया। पाॅवर वाला लगाना मज़बूरी थी,वरना ठेकेदारों की जगह चूहे नज़र आने लगते। तैयार होकर आइने के सामने खुद का निरीक्षण किया। दुरूस्त पाकर ठेकेदारों की दिशा में प्रस्थान भए।
सबसे पहले मुख्य ठेकेदारों के यहां पदधूलि दी। ठेकेदारों का दफ़्तर नया-नया बना लगता था। सब कुछ आलीशान था। फर्नीचर से लेकर रिसेप्शनिस्ट तक सारा सामान कीमती लग रहा था। रिसेप्शनिस्ट से एक मीठी मुस्कान और परमीशन लेकर ठेकेदार साहब तक पहुंचे। इतनी देर में सोच भी लिया कि ठेकेदार जी से क्या बात की जायेगी। ठेकेदार साहब का केबिन बड़ा शानदार था। सात-आठ फोन करीने से सजे थे। फोना वाला भी सजा-धजा था। बाते शुरू हुई। रिपोर्टर महाशय ने अपना एक फर्जी दफ़्तर बता कर माल की सप्लाई की बात की। रेट-वेट तय हुए। बातों-बातों मंे मैडम की ईमानदारी की बात छेड़ दी। ठेकेदार जी ने रस ले-लेकर इस चर्चा में अपना योगदान दिया। पत्रकार महोदय ने पूछ लिया,“वहां कितना कमीशन देते हंै,थोड़ा बहुत तो देना ही पड़ता होगा।’ठेकेदार जी हंसे,“अरे वो हमसे भला क्या कमीशन लेगी?”विजय बाबू सकपकाये,बोले-क्यों क्या आपसे बहुत अच्छे संबंध हैं?ठेकेदार जी मुस्कराए बोले,“हां इतने अच्छे कि ऐसे रिलेशन किसी से नहीं है और न हो सकते हैं।”फिर न जाने क्या याद आया कि एकदम चुप्पी लगा गये। उनकी विदाई तक यह चुप्पी होठों पर जड़ी रही। विजय बाबू के माथे ने ठनकने के अभ्यास को प्राथमिकता दी। शक़ के कीड़े को खाद-पानी दिया। फिर चल दिए दूसरे ठेकेदार के पते पर। लेकिन दूसरे से लेकर चैथे ठेकेदारों तक के पते उन्हें नहीं मिले। बगैर जान-पहचान का शहर था,सोचा छोड़ा जाए। पांचवे और छठे ठेकेदार के कार्यालय जरूर मिले। पर वे एक ही बिल्डिंग में आमने-सामने थे। बमुश्किल पन्द्रह सोलह गज की दूरी पर। वहां बीस-बाईस साल के दो लड़के धूम्रपान का आनंद ले रहे थे। उनसे बात करने में उन्हें शर्म लगी। ऐसे ही कई कार्यालय तलाशे पर बात किसी से न हो पायी। हां ये जरूर हुआ कि एक कार्यालय पर वही दोनों धूम्रपानी जवान निदेशक केबिन में मुख्य सीट पर बैठे मिले। अब विजय बाबू को यह अहसास जरूर सताने लगा कि मैडम कितनी भोली हैं,उस बेचारी को इन फ्राडों के बारे में पता ही नहीं लगा होगा। वह अकेली जान दफ़्तर में ही भ्रष्ट कर्मचारियों के बीच फंसी है,इन फर्जी फर्मो वाली की तहकीकात किससे कराएगी। इस अभियान से वापस लौटते-लौटते यह इतना तो तय कर ही चुके थे कि शाम को जब मैडम से मिलेंगे तो इन लोगों का पर्दाफास करना नहीं भूलेंगे। पहले यह काम करेंगे,उसके महानता की उस मूर्ति का इन्टरव्यू लेंगे।
अब तक शाम हो चुकी थी सो विजय बाबू ने होटल पहुंचक पहले अपना हुलिया बदला। अपने ओरिजिनल रूप में आए। कुर्ता-पायजामा और इन्टेलीजेंट दर्शाने वाला नज़र का चश्मा धारण किया। पत्रकार की गति को प्राप्त होने के बाद मैडम के घर की ओर चले। घर क्या था?शानदार बंगला था। बंगले के बाहर बंधे अल्सेशियन कुत्ते तक शानदार थे। पत्रकार जी शानदार मैडम के शानदार आवास से खासे प्रभावित हुए। प्रभाव के इस दौर में ही उन्होंने काॅलबेल बजाई। काॅल-बेल का बजना और कुत्तों का भौंकना दोनों क्रियाएं एक साथ संपन्न हुईं। इससे पहले कि वह इन्टरव्यू का विचार त्यागकर उल्टे पैरों भाग लेतें। एक नौकर टाइप के प्राणी ने दरवाज़ा खोला। परिचय प्राप्त करने के बाद अन्दर मैडम से पूछने चला गया। थोड़ी देर बाद लौटकर आया तो मैडम साक्षात उसके साथ चली आईं। काफी गर्मजोशी से स्वागत के बाद घर में ले गयीं।
ड्राइंगरूम मे पहले से ही तीन व्यक्ति विद्यमान थे। वे भी उनका स्वागत करने के लिए खड़े हो गए। पत्रकार महोदय को उनकी शक्ले काफी जानी सी लगीं। चश्मे का लैंस थोड और फोकस किया। समझदारी के दरवाजे पर दस्तक दी तो सब समझ में आ गया। समझते ही वह उछल पड़े। मूंछधारी शत प्रतिशत मुख्य ठेकेदार और वे दोनों क्लीन शेब्ड लड़के ठेकेदार नं 5 और 6 थे। पत्रकार जी उन्हें इंगित करके मैडम से कुछ कहना ही चाहते थे कि तभी मैडम मूंछधारी की ओर इशारा करके बोल पड़ी,“विजय जी ये हैं मेरे पति मि. तोलानी। बहुत बड़े कान्ट्रेक्टर हैं।”फिर उन्हें संभालने का मौका दिए बिना लड़कों का परिचय कराने लगीं-यह है मेरे भाई के लड़के अजय और विजय। आजकल इसी शहर में बिजनेस कर रहे हैं।”
पता नहीं मैडम ने आगे क्या कहा,रिपोर्टर महोदय को जाता नहीं क्योंकि वह गश खाकर वहीं गिर पड़े। गिरते समय उन्हें सिर्फ़ यह याद था कि यह फर्श शहर की सबसे ईमानदार अधिकारी का है।
           
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