शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

कथाकार सुभाष नीरव से डॉ भावना शुक्ला की बातचीत



कथाकार, कवि व अनुवादक सुभाष नीरव से डॉ. भावना शुक्ल का साक्षात्कार
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प्रश्न  : हिन्दी में मौलिक लेखन और पंजाबी से हिन्दी में अनुवाद की आपकी यात्रा लगभग एक साथ ही प्रारंभ हुई। करीब चालीस वर्ष की इस लंबी यात्रा में आपने पंजाबी साहित्य का हिन्दी में प्रचुर मात्रा में अनुवाद किया है। क्यों न आपसे पहला प्रश्न अनुवाद को लेकर ही करें? आप बताएं कि क्या अनुवाद किसी रचना के दोषों को बढ़ा देता है अथवा उसके गुणों में निखार लाता है?

उत्तर  : अनुवाद और अच्छे अनुवाद में अन्तर होता है, ऐसा मैं समझता हूँ। खराब अनुवाद श्रेष्ठ रचना को भी खराब कर देता है। वहीं एक अच्छा अनुवाद रचना के दोषों को बड़ी खूबसूरती के साथ छिपा कर उसमें अद्भुत निखार ला देता है।

प्रश्न  : किसी दूसरी भाषा में अभिव्यक्त कथानक को यथावत अनुवाद करके अभिव्यक्त करने में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?

उत्तर  :  जब हम किसी दूसरी भाषा के साहित्य को अपनी भाषा में अनुवाद करते हैं तो वह केवल शब्दों का अनुवाद नहीं होता। हमें उस भाषा की संस्कृति को भी बहुत बारीकी से समझना होता है। उसके अन्दर के अनकहे की ध्वनियों, उसकी गूंजों को भी कई बार अपने अनुवाद के घेरे में लाना पड़ता है। यथावत अनुवाद कोई श्रेष्ठ अनुवाद नहीं होता, सर्जनात्मक अनुवाद ही उत्तम अनुवाद होता है जिसमें उस भाषा की खुशबू भी होती है। मैं इसी सर्जनात्मक अनुवाद की बात करूंगा जो इतना सरल नहीं होता, जितना इसे समझा जाता है। इस सर्जनात्मक अनुवाद में अनुवादक को अनेक प्रकार की कठिनाइयों से मुठभेड़ करनी पड़ती है। जैसे उस भाषा की संस्कृति और उसकी खुशबू को कैसे पकड़ा जाए? उस रचना में आई लोकोक्तियों, मुहावरों को अपनी भाषा के समकक्षी मुहावरों में कैसे बदला जाए? रचना के भीतरी नाद तक पहुंचकर कैसे उसे शब्द दिये जाएं? उस रचना को हू-ब-हू न रखकर उसका कैसे पुनर्सजन किया जाए? एक अच्छे अनुवादक के सामने ये बहुत बड़ी चुनौतियाँ आती हैं, जिन्हें आप कठिनाइयाँ भी कह सकती हैं?

प्रश्न  : आपका अनुवाद के क्षेत्र में कैसे आना हुआ?

उत्तर : आपके इस प्रश्न का उत्तर थोड़ा लंबा हो जाएगा, क्योंकि उत्तर के साथ मेरी पृष्ठभूमि भी जुड़ी हुई है। यह बता दूँ कि मैं एक पंजाबी परिवार में ही जन्मा-पला हूँ। यह बात अलग है कि मेरा जन्म, पालन-पोषण हिन्दी प्रांत में हुआ और शिक्षा-दीक्षा भी। मेरे माता-पिता, दादा-नानी, चाचा सब 1947 की भारत-पाक विभाजन की क्रूर त्रासदी को झेलते हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बहुत छोटे से उप-नगर मुरादनगर में रोजी-रोटी की तलाश में आए थे। उनका सबकुछ पीछे छूट चुका था और वे लुटे-पिटे तन और मन पर भारी ज़ख़्म लेकर आए थे। पिता और चाचा को मुराद नगर स्थित एक सरकारी फैक्टरी में श्रमिक के तौर पर नौकरी मिल गई थी और रहने को छोटा-सा क्वार्टर भी। जहाँ मेरा परिवार रहता था, वह फैक्टरी एस्टेट का एक निम्न क्षेत्र था जहाँ कई छोटी-बड़ी जातियों के लोग एक ही मुहल्ले में रहते थे। इस मिश्रित कल्चर में मेरे परिवार में पंजाबी बोली धीरे-धीरे दम तोड़ती चली गई। हम लोग घर में आपस में पंजाबी में बोलना भूल गए। जब मैं छठी कक्षा में आया, तब तात्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने स्कूलों में त्रिभाषा फार्मूला लागू किया जिसमें संस्कृत के स्थान पर विद्यार्थी कोई एक क्षेत्रीय भाषा पढ़-सीख सकता था। मेरे स्कूल में बांग्ला, उर्दू और पंजाबी के टीचर थे। स्कूल वालों ने विद्यार्थियों से कहा कि अपने अपने माता-पिता से पूछकर आओ कि तुम कौन-सी भाषा सीखना चाहते हो। मैंने जब अपने घर में यह बात रखी तो मेरे पिता ने कहा – “बचा सकता है तो बेटा, अपनी माँ-बोली बचा ले।” यह पिता के मुँह से अनायास निकला था या यह उनके अंदर के दर्द की आवाज़ थी, कह नहीं सकता, लेकिन इस वाक्य ने मेरे अन्दर अपनी माँ-बोली से जुड़ने का जो अवसर दिया, उसे मैं आज तक नहीं भूल सका। छठी से आठवीं कक्षा तक मैंने पंजाबी सीखी जो बाद में मेरे बहुत काम आई और मैं हिन्दी साहित्य के साथ-साथ पंजाबी साहित्य से भी बावस्ता हुआ। 1976 में जब मेरी सरकारी नौकरी दिल्ली में लगी तो सबसे पहले मैं दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी, चांदनी चौक का सदस्य बना और मैंने पंजाबी साहित्य को पढ़ना शुरू किया। उन दिनों हिन्दी की जो बड़ी पत्रिकाएं थीं जैसे ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’ ‘कादम्बिनी’, ’नवनीत’ आदि, उनमें मैं देखता था कि पंजाबी के तीन-चार लेखकों की रचनाओं के अनुवाद ही छपा करते थे। जैसे उनके अलावा पंजाबी में कोई और लेखक हो ही नहीं। समूचे पंजाबी साहित्य का प्रतिनिधित्व यही दो-चार नाम किया करते थे जबकि स्थिति उलट थी। पंजाबी में बेहतरीन लिखनेवाले अनेक लेखक मुझे मिले जिनकी रचनाओं का अनुवाद नहीं हो रहा था। मैंने तब उस समय बीड़ा उठाया कि मैं उन सभी पंजाबी लेखकों की श्रेष्ठ लेखन को हिन्दी के पाठकों के सम्मुख रखूंगा जिससे हिन्दी पाठक अब तक वंचित रहा है। मेरी इस काम में मेरे मित्र रमेश बत्तरा ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई और मेरा पहला अनुवाद ‘सारिका’ में प्रकाशित हुआ। इस प्रकार मैं अनुवाद की दुनिया में आया।

प्रश्न  : हमें मालूम हुआ है कि आपने अब तक छह सौ से अधिक पंजाबी कहानियों और पचास से ऊपर पंजाबी की साहित्यिक पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया है, जबकि हिन्दी में आपकी मौलिक किताबें 13-14 ही हैं। आपको पंजाबी भाषा के लेखन में ऐसी क्या खासियत नज़र आई कि आपने अपने मौलिक लेखन को दूसरे दर्जे पर रख कर इतना अनुवाद किया?

उत्तर  : इसके दो कारण हैं। पहला यह कि मैं अपनी माँ-बोली के साहित्य को अनुवाद के माध्यम से बड़ा आकाश देना चाहता था, दूसरा यह कि पंजाबी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह किसी भी भाषा के साहित्य से कमतर नहीं है। कहानी, कविता और उपन्यास के क्षेत्र में यहाँ बहुत क्लासिक काम हुआ है। मेरे अनुवाद का क्षेत्र तो प्रमुखत: फिक्शन ही रहा है, इसलिए मैं कह सकता हूँ कि 1940 से लेकर अब तक पंजाबी कहानी ने जो चार पीढ़ियों में यात्रा की है, उसमें अधिकतर ऐसी हैं जिन्हें हम विश्व के श्रेष्ठ साहित्य के सामान्तर रख सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए मैंने ‘पंजाबी की यादगार कहानियाँ’ अनुवाद कीं जो वर्ष 2018 में इसी शीर्षक से चार खंडों में प्रकाशित हुईं। कुल साठ कहानियों की इस पुस्तक को तैयार करने, कहानियों का चयन और अनुवाद करने में मेरे जीवन के अट्ठारह वर्ष लगे हैं। यही कारण रहा कि हिन्दी में मेरी मौलिक किताबों की संख्या अनुवादित किताबों से कम हैं। कम क्या, बहुत कम हैं!

प्रश्न  : कहानियों और उपन्यासों में वर्जित शब्दों के प्रयोग को क्या आप बोल्डनेस मानते हैं?

उत्तर  : नहीं, मैं बोल्डनेस नहीं मानता। वर्जित शब्द हमारे जीवन का ही हिस्सा होते हैं, उन्हें इसी जीवन से ही उठाया गया होता है, नए शब्दों के रूप में घड़ा नहीं जाता है। सवाल बस इतना है कि आप जो लिखने जा रहे हैं, उसमें उसकी जैनुइन डिमांड कितनी है, है भी या नहीं, या फिर सिर्फ़ और सिर्फ़ पाठकों में जुगुप्सा पैदा करने की खातिर ही उनका प्रयोग किया गया है। आप राही मासूस रज़ा का ‘आधा गाँव’ पढ़ लें, वहाँ ये शब्द उस कृति का ज़रूरी हिस्सा बनकर आए हैं, लेखक ने मात्र जुगुप्सा अथवा रोमांच बढ़ाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया।

प्रश्न  : आपके दो कविता संग्रह आए हैं, तीसरा आने की प्रक्रिया में है। आपने अनुवाद में कदम रखा तो कविताएं लिखनी कम कर दीं या सिर्फ़ अनुवाद पर ही केंद्रित हो गए?

उत्तर  :  कविता मेरे लेखन की प्रमुख विधा नहीं रही, यूं मुझे अपने लेखन के शुरुआती दिनों से ही कविता से प्यार है। खूब पढ़ता हूँ। उर्दू शायरी भी। मेरी मुख्य विधा कहानी और लघुकथा रही है या फिर अनुवाद। छह कहानी संग्रह और तीन लघुकथा संग्रह हिन्दी में आ चुके हैं। पर कविताएं बीच बीच में लिखता रहा हूँ। कविता से परहेज नहीं है। ‘यत्किंचित’, ‘रोशनी की लकीर’ कविता संग्रह छपे और सराहे गए। तीसरा संग्रह कुछ हटकर है। प्रेम कविताओं की संख्या उसमें अधिक हैं। आने वाले समय में जल्द ही ‘बिन पानी समंदर’ शीर्षक से पाठकों के सम्मुख होगा। अनुवाद ने केवल मेरे कविता लेखन को ही नहीं, समूचे लेखन को प्रभावित किया। उसकी जो गति होनी चाहिए थी, वह अनुवाद के चलते धीमी पड़ी रही।  अब तक कुल पाचेसेक कहानियाँ और सत्तर के करीब लघुकथाएँ और सौ-एक कविताएँ ही लिख पाया हूँ। एक उपन्यास चल रहा है लेकिन कछुआ गति से।

प्रश्न  : बाल साहित्य को दोयम दर्जे का क्यों माना जाता है?

उत्तर  :  भावना जी, पता नहीं बहुत से लेखकों को यह भ्रम क्यों है कि छोटों के लिए लिखकर लेखक छोटा हो जाता है। बच्चों के लिए लिखना बड़ों के लिए लिखने से अधिक कठिन और श्रमसाध्य कार्य है।

प्रश्न  : लघुकथा मानव-मूल्यों के संरक्षण, संवर्द्धन और परिवर्द्धन की कथा-विधा है। इस संदर्भ में आपका क्या दृष्टिकोण है?

उत्तर  :  यूं तो समूचा साहित्य ही मानव-मूल्यों के संरक्षण, संवर्द्धन और परिवर्द्धन को लेकर लिखा जाता है। लघुकथा साहित्य में इसकी अहमियत इसलिए अधिक बढ़ जाती है क्योंकि इस विधा में कम शब्दों में हमें बड़ी बात कहनी होती है। और कम शब्दों की कथा में जब मानव-मूल्यों के संरक्षण, संवर्द्धन और परिवर्द्धन का प्रयास होता है और लेखक उसमें सफलता पाता है तो यह विधा और अधिक परिपक्व और संप्रेषणीय हो उठती है।

प्रश्न  : हमारे जीवन में पारस्परिक रिश्ते किस तरह बदल रहे हैं, इसे आपने अपने कहानी संग्रह ‘रंग बदलता मौसम’ में कैसे व्यक्त किया है, व्याख्यायित करें?

उत्तर  : स्वार्थ पर टिके रिश्ते कभी भी स्थायी नहीं होते। मेरे कहानी संग्रह ‘रंग बदलता मौसम’ की अधिकतर कहानियाँ प्रेम और वृद्धजीवन की पीड़ा को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानियाँ हैं, कुछ जीवन के अन्य विविध रंगों को समेटती हैं पर रिश्तों के छीजने की पीड़ा उनमें भी ध्वनित होती है। प्रेम में छल-कपट, बुजुर्गों के प्रति उपेक्षा और अवहेलना, भ्रष्ट राजनीति का दंश, ये सब प्रेम, मनुष्यता और प्रकृति की रसधारा को बाधित ही करने वाले तत्व हैं। मैंने अपनी इन कहानियों में रिश्तों की टूटन और उनमें उपजने वाली दरारों की ओर संवेदना का पल्लू पकड़कर संकेत करने का प्रयास किया है और एक लेखक के तौर पर मेरी यह इच्छा रही है कि इस धरती पर प्रेम, मनुष्यता और प्रकृति की रसधारा अक्षुण्ण रहे।

प्रश्न  : चलते-चलते हमारे पाठकों के लिए अपनी एक लघुकथा भी प्रस्तुत करें।

उत्तर  :  जी, आपके सुधी पाठकों के लिए अपनी लघुकथा ‘गुड़िया’ प्रस्तुत कर रहा हूँ –

लघुकथा
गुड़िया
-सुभाष नीरव

"नाशपिटा कहीं का...हद ही कर दी इसने तो।" डेढ़ वर्षीय पिंकी को गोद में उठाये प्रभा बड़बड़ाती हुई बालकोनी से कमरे में घुसी।
"क्या हो गया? इतना गुस्सा किस बात पर ?" प्रकाश ने पत्नी का तमतमाया चेहरा देख पूछा।
"वो सामने वाले ब्लॉक में कोने का दूसरी मंजिल का मकान है न, उसकी बालकोनी में से एक बूढ़ा खूसट कई दिनों से मुझे घूर रहा है।" प्रभा ने पिंकी को बेड पर लिटाते हुए कहा।
प्रकाश ने बाहर बालकोनी में जाकर देखा, एक सफेद दाढ़ी वाला बूढ़ा अपनी बालकोनी में टहलता हुआ उसे दिखाई दिया।
"लगता है कोई नया परिवार अभी हाल में ही आया है।" प्रकाश अंदर कमरे में जाकर प्रभा से बोला जो पिंकी को थपकियां देकर सुलाने का प्रयत्न कर रही थी।
"हां, बीसेक दिन ही हुए हैं आए को। पर बालकोनी में सिवाय बूढ़े के किसी और को नहीं देखा मैंने। कभी कुर्सी डालकर बैठा मिलेगा, कभी टहलता। पर नज़रें इधर हमारी बालकोनी पर ही गड़ाए रखेगा, बूढ़ा खूसट ! अपनी सफेदी का भी ख्याल नहीं।" प्रभा का बड़बड़ाना जारी था।
"इन फ्लैटों में बूढ़े बेचारे भी क्या करें। ऊपर टंगे रहते हैं। बालकोनी में थोड़ा टहल लिया या बैठकर धूप सेंक ली...। तुम नाहक बेचारे पर गुस्सा हो रही हो।" प्रकाश ने हँसते हुए प्रभा को समझाने का प्रयास किया।
"बेचारा?... अकेले या पिंकी को लेकर जब भी बालकोनी में जाती हूँ, इस खूसट की नजरें इधर ही गड़ी मिलती हैं। और ...और..." प्रभा कहते कहते रुक गई।
"और क्या ?"
"कल शाम तो इसने हद ही कर दी। ये मोबाइल लेकर खड़ा था। मुझे लगा, इसने चुपके से मेरी फ़ोटो भी ली है।"
"क्या ? तुमने कल ही क्यों नहीं बताया?" अब तो प्रकाश को भी बूढ़े की इस हरकत पर गुस्सा हो आया।
"अभी जाता हूँ , लेता हूँ इस ठरकी की क्लास।"
"मैं भी चलती हूँ, बूढ़े की ऐसी अक्ल ठिकाने लगाऊँगी कि याद रखेगा। भूल जाएगा ताकना-झांकना।"
तभी कामवाली आ गई।
"रामरती, पिंकी का ज़रा ख्याल रखना। हम अभी आए।" कहकर दोनों नीचे उतरे और भन्नाए हुए से बूढ़े के मकान की सीढ़ियाँ चढ़ गए।
बेल बजाने पर दरवाज़ा बूढ़े ने ही खोला। उन्हें देख बूढ़े के चेहरे पर मुस्कान तैर गई।
"आओ आओ...अंदर आ जाओ।"
कमरे में नीम उजाला था। दीवार से लगे एक दीवान पर कोई लेटा था। दीवान की बगल में दो कुर्सियां और दो मोढ़े रखे थे। तभी एक अस्फुट-सा स्त्री स्वर कमरे में उभरा, जिसके शब्द प्रभा और प्रकाश पकड़ नहीं पाए। बूढ़े ने कमरे की लाइट जला दी तो कमरे की हर चीज़ साफ साफ दीखने लगी।
"पूछ रही हैं, कौन आया है। पिछले एक साल से अधरंग है इसे। बिस्तर पर ही रहती है।" कहते हुए बूढ़ा, बुढ़िया के करीब सिरहाने की तरफ बैठ गया। तब तक प्रभा और प्रकाश कुर्सियों पर बैठ चुके थे।
"सुखवंती, गुड़िया के मम्मी-पापा आए हैं।"
बुढ़िया ने लेटे-लेटे गर्दन घुमा कर दोनों की तरफ देखा और "अच्छा अच्छा !" कहा जिसे बूढ़ा ही समझ पाया। बुढ़िया ने फिर कुछ पूछा, शब्दों की जगह मुंह से जैसे फूंक-सी निकली हो।
"पूछ रही है, गुड़िया को नहीं लाए?"
प्रभा और प्रकाश ने एक-दूजे की ओर देखा, पर बोले नहीं।
"कल मैंने आपकी गुड़िया की फ़ोटो मोबाइल पर इसे दिखाई तो बहुत खुश हुई। बोली- ये तो बिल्कुल अपनी परी जैसी है।" बूढ़े ने बताया। फिर बूढ़े ने बगल वाली दीवार की ओर इशारा करते हुए कहा, "ये है हमारी परी...।"
दीवार पर एक जोड़ा डेढ़-दो साल की बच्ची को उठाये मुस्करा रहा था।
"ये आपके बहू-बेटा और पोती ..." प्रभा के मुंह से बमुश्किल ये शब्द निकले।
"हाँ-हाँ, ठीक पहचाना।" बूढ़े ने चहक कर कहा, "है न हमारी परी आपकी गुड़िया की तरह !" बूढ़े का चेहरा खिला हुआ था।
"ये आपके साथ नहीं रहते ?" प्रकाश ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा।
इस पर बूढ़े का खिला हुआ चेहरा एकदम से मुरझा गया । उसकी आंखें पनीली हो उठीं, "बेटा... अब ये तीनों वहाँ चले गए जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता..."
कमरे का सन्नाटा बहुत देर तक कांपता रहा।
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(यह पूरा इंटरव्यू 'प्राची' पत्रिका में छपा था)



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