शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

वोहरा समिति की सिफारिशें.। / आलोक यात्री



📎 📎   आभार  /   साभार
भाई  श्री  सलामत  मियां ‌ जी
व भाई श्री सुब्रत भट्टाचार्य जी
दैनिक युग करवट 🙏 🙏 🙏
(सुविधा हेतु मूल प्रति संलग्न)

वोहरा कमेटी की सिफारिशें लागू होतीं तो
कानून व्यवस्था की तस्वीर कुछ और होती


  विकास दुबे के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के बाद यूं तो कई सवाल खड़े हुए हैं। लेकिन इस प्रकरण पर जो सबसे बड़ा सवाल उठा है वह यह है कि क्या इस देश में कानून के शासन के बजाय पुलिस शासन स्थापित हो रहा है? कुछ समय पूर्व तेलंगाना पुलिस ने भी बलात्कार के चार आरोपियों को इसी तरह मार डाला था। अधिकांश लोग उन आरोपियों को मार डालने के पक्ष में खड़े थे। यहां गौर करने वाली बात यह है कि अपराधियों को मुठभेड़ में मार देने का समर्थन आम लोग इसलिए भी करते हैं क्योंकि हमारे देश में आम नागरिकों को न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं। जबकि इस तरह होने वाले एनकाउंटर में हत्या का समर्थन करना एक तरह का भावनात्मक मामला है। इस प्रक्रिया में पीड़ित को ''त्वरित न्याय" मिल जाता है लेकिन न्याय की प्रक्रिया हाशिए पर चली जाती है। राजनीति और अपराधी के गठजोड़ पर अंकुश के लिए जो वोहरा कमेटी गठित की गई थी उस पर अमल हुआ होता तो देश में कानून व्यवस्था की तस्वीर कुछ और होती।
  एक अकेले विकास दुबे के मारे जाने से पुलिस ने क्षणिक तौर पर अपनी पीठ भले ही ठोक ली हो लेकिन ग्राम पंचायतों से लेकर उच्च सदन में ऐसे तमाम विकास दुबे भरे पड़े हैं जो धन बल की राजनीति से इस मुकाम तक पहुंचे हैं। यह तो पता नहीं कि विधान सभा या लोक सभा में पहुंचने वाला पहला अपराधी कौन था? लेकिन आज निचले सदन से लेकर उच्च सदन में प्रतिनिधि के रूप में मौजूद ऐसे अपराधियों की उपस्थिति चिंताजनक है। बीते चुनाव में बड़ी संख्या में दागियों के विधानसभा और लोकसभा में पहुंचने के बाद चुनाव आयोग खुद ऐसे लोगों पर अंकुश की पहल की सिफारिश कर चुका है।
  यह देश की विडंबना है कि एक तरफ जनता विकास दुबे, श्रीप्रकाश शुक्ला, मुन्ना बजरंगी जैसे अपराधियों के मारे जाने पर ताली बजाती है। पुलिस की पीठ ठोकी है। उसका जयघोष करती है। वहीं दूसरी ओर रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया, मुख्तार अंसारी, हरि शंकर तिवारी, अतीक अहमद, अमरमणि त्रिपाठी, डी.पी. यादव जैसे बाहुबलियों को चुनाव में जिता कर विधानसभा व लोकसभा में भेजती है। गौरतलब है कि एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा लोकसभा में 43 फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें से कई पर तो आतंकवाद, हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे संगीन आरोप दर्ज हैं। 2019 का लोकसभा चुनाव जीत कर आए प्रतिनिधियों की संख्या, साल 2014 में जीत कर आए दागी पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों के मुकाबले 26 फीसदी अधिक है।
  राजनीति में सुचिता की बात करने वाली हर पार्टी अपराधी पृष्ठभूमि वाले प्रतिनिधियों को प्रत्याशी बनाने से गुरेज नहीं करती। खुद पर उंगली न उठे इसलिए आम तौर पर यह कह कर, इस निर्णय पर उठे सवाल खारिज कर दिए जाते हैं कि जनता की अदालत में फैसला होने दिया जाए। जनता की अदालत पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि भाजपा के प्रतिनिधि भी दूध के धुले नहीं हैं। 2019 में लोकसभा पहुंचे 116 सांसदों यानी 39 फीसदी प्रतिनिधियों का दामन दागदार है। कांग्रेस के ऐसे सांसदों की संख्या 29 है। यानी कांग्रेस के जितने भी सांसद चुने गए हैं उनमें से 57 फ़ीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। जेडीयू में यह औसत 81 फीसदी है।
  इस सब के बावजूद विकास दुबे को लेकर राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोप के बीच नेता अपराधी गठबंधन को लेकर पुरानी बहस नए सिरे से एक बार फिर तेज हो गई है। ऐसे गठजोड़ में पुलिस स्वाभाविक हिस्सा होती है। जबकि नौकरशाही ढके-छुपे तौर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है। सियासी अपराधी गठजोड़ पर प्रभावी प्रहार करने के लिए 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने वोहरा समिति गठित की थी। जिसने नेताओं, अपराधियों और नौकरशाहों के गठजोड़ को तोड़ने के लिए इसका हल सुझाया था। समिति के अध्यक्ष तत्कालीन पूर्व गृह सचिव एन.एन. वोहरा थे। समिति में रॉ और आईबी के सचिव, सीबीआई के निदेशक और गृह मंत्रालय के विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा एवं पुलिस) भी शामिल थे।
  अपनी रिपोर्ट में वोहरा समिति ने बार-बार दोहराया है कि राजनीतिक संरक्षण से ही देश में तरह-तरह के गलत धंधे फल-फूल रहे हैं। रिपोर्ट कहती है- यह कहने की जरूरत नहीं है कि आपराधिक सिंडिकेटों के राज्य और केंद्र के वरिष्ठ सरकारी अफसरों या नेताओं के साथ सांठ-गांठ के बारे में सूचना के किसी प्रकार के लीकेज का सरकारी कामकाज पर स्थाई प्रभाव हो सकता है। इस बीच बीते चार आम चुनावों में राजनीति में अपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। 2004 में 24 फ़ीसदी सांसदों की पृष्ठभूमि दागी थी। वहीं 2009 में ऐसे सांसदों की संख्या बढ़ कर 30 फ़ीसदी और 2014 में 34 फ़ीसदी हो गई। मौजूदा लोकसभा में दागी प्रतिनिधियों की संख्या 43 फीसदी है।
  वोहरा रिपोर्ट की बाबत उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं कि यह व्यवस्था का नकाब उतारने वाली रिपोर्ट है। और कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि उसकी कार्यप्रणाली का खुलासा हो जाए। सत्ताधारी दल बदलते रहते हैं, लेकिन कार्यप्रणाली वही रहती है। यही कारण है कि वोहरा समिति जैसी समितियों की सिफारिशें कभी लागू नहीं होतीं। नेता अपराधी प्रकरण पर सूबे के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह का कथन भी काबिले गौर है। वह कहते हैं- पुलिस सुधारों की जरूरत है। जांच और कानून व्यवस्था के लिए अलग अलग एजेंसी होने चाहिए। 1996 में उच्चतम न्यायालय में मैंने एक याचिका दाखिल की थी। जिस पर 2006 में फैसला आया कि पुलिस को राजनैतिक हस्तक्षेप से दूर रखा जाए। लेकिन यह फैसला आज तक लागू नहीं हुआ।
  2014 में केंद्र में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी   तो तृणमूल कांग्रेस के नेता दिनेश त्रिवेदी ने उनसे वोहरा समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद स्थिति आज भी जस की तस है। अधिकारियों के अनुसार, आर्थिक क्षेत्र में सक्रिय लॉबी, तस्कर गिरोहों, माफिया तत्वों के साथ भ्रष्ट नेताओं एवं अफसरों के गठबंधन को तोड़ने के ठोस उपाय भी वोहरा रिपोर्ट में सुझाए गए हैैं। रिपोर्ट की तीन प्रतियां ही तैयार की गई थीं। सभी प्रतियों को गोपनीय रखा गया है। कहा जा रहा है कि इस रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम के साथ नेताओं और पुलिस के नेक्स्स की विस्फोटक जानकारियां हैं। इसलिए कोई भी दल इसे सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। गौरतलब है कि वोहरा समिति का गठन 1993 में मुंबई विस्फोट कांड के दौरान किया गया था। खुफिया एवं जांच एजेंसियों ने दाऊद इब्राहिम गैंग की गतिविधियों और संबंधों को लेकर यह रिपोर्ट तैयार की थी। जिसमें साफ था कि मेमन भाइयों और दाऊद इब्राहिम का साम्राज्य सरकारी तंत्र के संरक्षण के बिना खड़ा नहीं हो सकता था। तब यह जरूरी माना गया कि इस गठजोड़ के बारे में पता लगाया जाए और इस तरह के मामलों में वक्त रहते जानकारी जुटाकर कार्यवाही की जाए। तब समिति ने सिफारिश की थी कि।सरकार एक नोडल एजेंसी बनाएं जो ऐसे मामलों का पर्यवेक्षण करे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि राॅ, आईबी, सीबीआई के पास जो जानकारी या डाटा होगा उसे नोडल एजेंसी को दे दिया जाएगा। लेकिन इस पर आज तक अमल नहीं किया गया। पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। 1995 में समिति की सौ पन्ने की रिपोर्ट में से महज 12 पन्ने ही सार्वजनिक किए गए। रिपोर्ट में दाऊद इब्राहिम के अफसरों और नेताओं से संबंधों की विस्फोटक जानकारी होने की वजह से ही शायद यह रिपोर्ट आज भी धूल फांक रही है।
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