बुधवार, 22 जुलाई 2020

फिसलन / देवेंद्र कुमार



फिसलन—कहानी

देवेन्द्र कुमार
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अचल रोज सुबह बेटे जय को सोसाइटी के गेट पर छोड़ने जाता है । स्कूल बस निश्चित समय पर आती है। सीढ़ियों से उतरते हुए और वापस चढ़ते समय दोनों बार उसका सामना पडोसी धीरज से होता है। वह अपने पौधे की देख रेख में लगा रहता है। जैसे उसे इस बात की परवाह नहीं कि कौन आया या गया। क्योंकि अचल ने उससे जब जब भी नमस्कार किया, तो धीरज ने उसकी ओर देखे बिना जवाब दिया और अपना काम करता रहा। अचल को उसका व्यवहार ठीक नहीं लगा। क्या वह उत्तर में अचल की ओर देख कर, मुस्कान के साथ नमस्कार नहीं कर सकता था!
अचल ने गैलरी में कई गमले रखे हुए हैं जिनकी देख भाल भोलू माली करता है। धीरज के दरवाजे के बाहर केवल एक गमला रखा है। भोलू ने बताया है कि धीरज ने उससे कभी मदद नहीं मांगी। उसका स्वभाव अजीब है। वह सोसाइटी में किसी से बात नहीं करता।शहर में उसके कई नाते रिश्तेदार हैं,पर वह किसी से सम्बन्ध नहीं रखता। फ़्लैट में अकेला रहता है,एक नौकर जरूर आता है साफ़ सफाई और खाना पकाने के लिए। लोग कहते हैं कि धीरज काफी पैसे वाला है। शायद वह सोचता है –अगर वह नाते रिश्तेदारों से हेल मेल रखेगा तो लोग उससे पैसों की मदद मांग सकते हैं। अचल नहीं जानता कि सच क्या है, पर यह तो साफ़ है कि धीरज किसी से सम्बन्ध बनाने की इच्छा नहीं रखता।
धीरज के व्यवहार से क्षुब्ध होकर अचल ने नमस्कार करना छोड़ दिया, उसने निश्चय कर लिया कि घमंडी धीरज से कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा। लेकिन एक सुबह कुछ ऐसा हुआ कि सब कुछ बदल गया। वह जय को सोसाइटी के गेट पर छोड़ कर लौटा तो देखा कि धीरज गमले के पास गिरा हुआ है, वह हाथ के बल उठने की कोशिश कर रहा था। अचल उसे सहारा देकर उसके फ्लैट में ले गया।चोट नहीं थी, दर्द जरूर था।डाक्टर आकर देख गया।उसने दवा लिख दी और एक दो दिन आराम करने की सलाह दी।
पता चला कि पौधे में पानी देते समय उसका पैर फिसल गया था। धीरज ने कहा-‘आपने क्यों तकलीफ की,मैं खुद ही उठ जाता। मदद के लिए धन्यवाद।’ अचल ने कहा -‘ मुझे जो ठीक लगा,मैंने वही किया।’ अपने फ़्लैट की ओर आते समय उसने धीरज के नौकर बजरंगी को संकेत से बाहर बुलाया, उससे पूछा कि क्या वह धीरज के किसी सगे सम्बन्धी को जानता है?उसने बताया कि धीरज के दो भाई और दो बहनें इसी शहर में अपने परिवार के साथ रहते हैं, पर यहाँ कोई नहीं आता। अचल ने कहा –‘अगर कर सको तो उन लोगों धीरज के फिसल कर गिरने की खबर दे दो।’
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बजरंगी ने कहा-‘ खबर मिलने पर रिश्तेदार तो आ जायेंगे लेकिन हो सकता है मालिक उनसे ठीक व्यवहार न करें।’ अचल को भी इस बात का डर था पर उसने कुछ सोच कर ही बजरंगी से धीरज के रिश्तेदारों को खबर देने को कहा था।
शाम के समय धीरज के दरवाजे की घंटी कई बार बजी। अचल ने कई आवाजें सुनीं,उनमें बच्चों की मीठी खिल खिल भी शामिल थी। तभी बजरंगी अचल के पास आया।उसने कहा कि धीरज के भाई बहन अपने परिवार सहित आ गए हैं।अचल ने पूछा कि कुल कितने जने हैं और फिर उसे पैसे देकर बाजार से नाश्ता लाने को कहा।जब बजरंगी खाने पीने का सामान लेकर लौटा, तब तक अचल की पत्नी विद्या ने चाय बना ली थी। अचल ने बजरंगी के हाथों चाय- नाश्ता भेज दिया फिर वह और विद्या भी धीरज के फ़्लैट में जा पहुंचे, तब बजरंगी मेज पर प्लेटें लगा रहा था।
धीरज के घर की हवा में हंसी जैसे तैर रही थी।धीरज बार बार कह रहा था कि वह एकदम ठीक है, उसने अचल दम्पति का परिचय देते हुए कहा-‘ चाय नाश्ते के लिए आप सब इन्हें धन्यवाद दे सकते हैं।
इस पर अचल ने हँस कर कहा—‘ हम सबको धीरज की चोट को धन्यवाद देना चाहिए जिसने अपरिचित लोगों को एक दूसरे के निकट आने का मौका दिया। फिर धीरज से बोला-‘ ये सब मेरे मेहमान हैं इसलिए किसी धन्यवाद की जरूरत नहीं है।’
अचल की बात का जवाब धीरज ने दिया-‘ तुम्हारे मेहमान बाद में,पर उससे पहले ये सब मेरे हैं.’
सुनकर अचल को अच्छा लगा।वह कुछ कहता इससे पहले किसी ने सितार के तार को छेड दिया। यह धीरज के भाई विनय की बेटी रमा थी।उसने हाथों में सितार थामा हुआ था।पास ही उसकी छोटी बहन उमा मेंडोलिन लेकर खड़ी थी।उमा ने धीरज से कहा –‘चाचा जी, मुझे पता है आप बहुत मीठी बांसुरी बजाते हैं,मेंडोलिन और सितार के साथ बांसुरी की संगत खूब जमेगी।’ कुछ देर बाद कमरे में संगीत लहरियां तैरने लगीं। सचमुच धीरज बहुत मीठी बांसुरी बजा रहा था।
मौज मस्ती और हंसी ख़ुशी का यह दौर कई घंटे तक चला।आखिर मेहमान फिर मिलने की बात कह कर विदा लेने लगे,तब अचल ने कहा-‘आज तो मन नहीं भरा। अगले रविवार को आप सब मेरे घर चाय पर निमंत्रित हैं।समय होगा शाम चार बजे।धीरज को मैं अलग से निमंत्रण दूंगा।’
धीरज बोला-‘ मुझे अलग से निमंत्रण क्यों,क्या मैं इन सब में शामिल नहीं हूँ?’
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अचल को लगा कि दूरी कुछ कम हो रही है।यह अच्छा संकेत था।धीरज मेहमानों को विदा करने अपने दरवाजे से बाहर आया तो देखा कि उसका गमला नहीं है।तब अचल ने कहा-‘आपके पैर में चोट है, शायद कुछ दिन तक आप अपने पौधे की देख भाल न कर सकें,यही सोच कर मैंने माली से कहा तो वह आपके और मेरे गमले नीचे पार्क में ले गया।’
‘पर आपके गमले क्यों?’
मैं और आप पडोसी जो हैं। हम दोनों के पौधे साथ साथ रहेंगे।’-कह कर अचल मुस्करा दिया।’
अगला रविवार आया तो मेहमान भी आ गए।अचल ने अपने चार मेहमानों को भी बुलाया था।वे थे चार बच्चे। वे बहुत मीठा गाते थे। अचल ने कहा कि ये चारों हर दिन शाम के समय नीचे मंदिर में भजन गाते हैं।पर उसने यह नहीं बताया कि वे सडक पर मेहनत मजूरी करके जीवन जीने वाले बेसहारा बच्चे हैं। अचल ने कई बार उन्हें मंदिर में गाते हुए सुना था। बच्चों के गायन ने सबको मुग्ध कर दिया। उमा,रमा और धीरज के संगीत ने भी एक बार फिर से समां बाँध दिया। विदा होने से पहले धीरज के भाई अविनाश ने कहा-‘अब अगली बारी मेरी है। क्यों न हम महीने में एक बार बारी बारी से इसी तरह मिलते रहें।’ सभी अविनाश के प्रस्ताव से सहमत थे।
अचल और धीरज मेहमानों को विदा करने के लिए सोसाइटी के गेट तक गए। लौटते समय धीरज पार्क में गया। वह अपने पौधे को देखना चाहता था। माली भोलू उसे पार्क में एक तरफ रखे गमलों के पास ले गया। धीरज ने देखा कि एक गमला पौधों की कतार से अलग रखा था। उस पर नाम लिखा था-धीरज।
‘मेरा गमला सबसे अलग क्यों रखा है?’ धीरज ने पूछा। फिर बोला-‘भोलू भय्या,आप पुराने गमलों को कैसे नया करते हैं?’
जवाब में भोलू गेरू के रंग वाला डिब्बा और ब्रश ले आया। धीरज ने ब्रश को र्रंग में डुबा कर गमले पर लिखे अपने नाम पर लगा दिया।फिर गमले को उठा कर दूसरे गमलों के बीच रख दिया। कुछ पल खड़ा हुआ गमलों की कतार को देखता रहा, फिर अपने फ़्लैट की ओर बढ़ चला। अचल ने जान लिया कि यह कोई दूसरा ही धीरज है। (समाप्त )

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