सोमवार, 20 जुलाई 2020

गूगल का भारत में (निवेश) दिलचस्पी / ऋषभ देव शर्मा



गूगल का भारत में निवेश

कोरोना काल में देश की अर्थ व्यवस्था की सेहत के बारे में तरह तरह के अनुमानों के बीच यह खबर काफी आस बँधाने वाली है कि गूगल भारतीय बाजार में अगले सात साल में 75 हजार करोड़ रुपये का निवेश करेगी। कंपनी यह निवेश ‘गूगल फॉर इंडिया डिजिटलीकरण कोष’ के जरिये करेगी। इसमें शक की गुंजाइश नहीं कि ‘गूगल फॉर इंडिया’ कार्यक्रम के मौके पर गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई की  यह घोषणा भारत के भविष्य और उसकी डिजिटल अर्थ व्यवस्था में कंपनी के भरोसे का प्रतीक है।

गौरतलब है कि इस  निवेश के लिए भारत के डिजिटलीकरण के जो चार प्रमुख क्षेत्र चुने गए हैं, उनसे एक ओर तो 'आत्मनिर्भर भारत' के अभियान को गति मिलेगी तथा दूसरी ओर नई आर्थिक चुनौतियों का सामना करने का देशवासियों का हौसला बढ़ेगा।

कहना न होगा कि इस निवेश के लिए  हर भारतीय तक उसकी भाषा में सस्ती पहुँच और सूचनाओं को उपलब्ध कराने का जो पहला लक्ष्य रखा गया है, वह गूगल को तो घर घर तक विस्तार देगा ही, भारतीय भाषाओं के तकनीकी पहलू को भी निश्चित रूप से ताकत देगा। बहुभाषिकता इस महादेश की बुनियादी सच्चाई है। इसकी उपेक्षा करके यह सोचना कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सुपरिणामों को अंग्रेज़ी के माध्यम से जन जन तक पहुँचाया जा सकता है, हमारे नीतिकारों की बड़ी भूल रही है। इसीलिए सारा विकास शहरों तक सीमित होकर रह गया। हाशिए पर स्थित गाँवों और वनांचलों तक वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रसार के लिए तो केवल भारतीय भाषाएँ ही काम आ सकती हैं। इसलिए अगर गूगल   ने यह फैसला किया है कि देश की आम जनता तक संचार और प्रौद्योगिकी को उसकी अपनी भाषाओं में पहुँचाना है, तो यह स्वागत योग्य है। इससे हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं का तकनीकी पक्ष तो मजबूत होगा ही,  जन भाषा भाषियों में आत्मविश्वास का संचार भी होगा। अंग्रेजी की औपनिवेशिक गुलामी से देश की मुक्ति की दिशा में यह एक सार्थक पहल होगी।

दूसरा लक्ष्य तो एकदम स्पष्ट है ही कि भारत की जरूरत के मुताबिक नए उत्पाद और सेवाओं का निर्माण किया जाएगा। अगर यह कहा जाए कि कोरोना उत्तर काल में उभरती नई विश्व व्यवस्था में भारत को यह ध्यान रखना होगा कि नए उत्पादों और सेवाओं के लिए हमें भविष्य में उन बड़ी शक्तियों का मुँह न ताकते रहना पड़े, जो इनके एवज में अपनी मनमानी हमारे ऊपर थोपती हैं या धौंस जमाती हैं। महाबलियों की धौंसपट्टी का जवाब अपनी उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता बढ़ा कर ही दिया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि गूगल का भारत में निवेश हमारी आत्मनिर्भरता को मजबूत सहयोग दे सकेगा।

इस महत्वाकांक्षी निवेश का तीसरा क्षेत्र कारोबारियों को डिजिटल बदलाव के लिए सशक्त करने से संबंधित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब विमुद्रीकरण की घोषणा की थी तो यह भी कहा था कि इससे डिजिटल लेन देन को बढ़ावा मिलेगा। मिला भी कुछ हद तक। लेकिन कागज़ी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ते ही वह किला ढह गया। इधर एक अच्छी खबर यह है कि कोरोना विश्वमारी के डर से डिजिटल कारोबार में अचरजकारी वृद्धि हुई है। यदि गूगल कोई ऐसी योजना लेकर आए कि यह रुझान गति पकड़ सके, तो शायद डिजिटल इकोनॉमी के वे लाभ देश को मिल सकें, जिनकी उस समय प्रधानमंत्री ने कामना की थी।

गूगल के भारत में इस विराट निवेश का चौथा क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा एवं कृषि जैसे क्षेत्रों में सामाजिक भलाई के लिए कृत्रिम मेधा और प्रौद्योगिकी लाभ पहुँचाना शामिल है। कहना न होगा कि ये ही वे मूलभूत मोर्चे हैं, जिन पर काम करके नई और मजबूत अर्थ व्यवस्था को अपने पैरों पर खड़ा किया जाना है। स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि के लिए हमारे बजट में जिस तरह के नाकाफ़ी प्रावधान रहते है, उनकी कुछ क्षतिपूर्ति अगर इस निवेश से हो सके, तो बड़ी बात होगी।

अंततः यह आशंका भी कि कहीं कोई स्वनामधन्य मंत्री महोदय यह कह कर भाँजी न मार दें कि कोई भी कंपनी भारत में निवेश अपने लाभ के लिए करती है, हमारे ऊपर अहसान नहीं करती। जी हाँ, पहले ऐसा हो चुका है!000

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