सोमवार, 20 जुलाई 2020

हमने भस्मासुर पाले? / ऋषभदेव शर्मा



मध्य प्रदेश के गुना में पुलिस की बर्बरता से त्रस्त किसान दंपति के कीटनाशक पी लेने  के समाचार से एक बार फिर साबित हो गया कि भारतीय लोकतंत्र की कब्र खोदने का काम इस महादेश के अतिशय मुस्तैद पुलिस तंत्र ने ही अपने जिम्मे ले रखा है। अब समस्या इतनी सरल नहीं रही है कि मीडिया में निंदा करने और कोसने से सुलझ जाए।  अगर हम सोचते हैं कि कुछ पुलिसकर्मियों और अधिकारियों के तबादले और बर्खास्तगी से इस महारोग से मुक्ति मिल जाएगी, तो हम मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे हैं। आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु हो, चाहे उत्तर प्रदेश या अब मध्य प्रदेश, सारे देश में अभय दान देकर खुद हमीं ने भस्मासुर पाल रखे हैं। कानून के ये रखवाले जब कानून को ताक पर रख कर खुले आम हिंसा का पिशाच-नृत्य करते हैं, तो हमीं इन्हें हीरो बनाते हैं और गुणगान करते हुए इनकी आरती उतारते हैं। कथित कर्तव्यपालन और आत्मरक्षा के नाम पर पुलिस की स्वेच्छाचारिता पर पर्दा डालना भी जैसे लड़खड़ाए हुए लोकतंत्र का दैनिक उपचार बन गया है। हमने  चुप्पी की अश्वगंधा से पोस-पोस कर सारे पुलिस तंत्र की इम्युनिटी इतनी बढ़ा दी है, कि वह खुद को जन-गण का माई-बाप समझने लगा है। पुलिस की ऐसी निरंकुशता किसी भी लोकतंत्र के लिए श्रेयस्कर नहीं हो सकती। इस तरह की घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाए, कम है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में किराये की जमीन पर खेती कर रहे एक किसान दंपति के साथ पुलिस की मारपीट पर चौतरफा आक्रोश व्याप्त है। क्योंकि हर किसी को यह अहसास है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति एक न एक कानून और व्यावस्था की धज्जियाँ उड़ा कर लोकतंत्र को पुलिस राज में बदल देगी। सयाने बता रहे हैं  कि  पुलिस एक जमीन से अवैध कब्जा हटाने पहुंची थी। इस पर खेती कर रहे राजकुमार नाम के किसान ने उससे कहा कि उसने फसल के लिए दो लाख रुपये का लोन लिया है, इसलिए उसे फसल काटने तक की मोहलत दी जाए। पुलिस को तो शायद संवेदनहीन होने का विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता है। सो, पुलिस नहीं मानी और उसने खेत में बुलडोजर चला दिया। टोकने पर मारपीट शुरू कर दी। इससे क्षुब्ध किसान और उसकी पत्नी ने खेत में ही कीटनाशक पी लिया। अफरा तफरी में राजकुमार के भाई ने एक महिला पुलिसकर्मी को धक्का दे दिया। बस फिर क्या था!  पुलिसकर्मियों ने किसान को ताबड़तोड़ पीटना शुरू कर दिया। उसे बचाने आई उसकी पत्नी को भी नहीं बख्शा गया। हो सकता है कि इस समय इस कथित अत्याचार के खिलाफ बोलना राजनीति करने जैसा लगे, लेकिन यह ज़रूरी है कि सरकारी पार्टियाँ हों या विपक्षी दल, सभी को पुलिसिया निरंकुशता के प्रतिरोध के लिए खड़े होना चाहिए और ऐसी वैक्सीन खोजनी चाहिए जो इस बर्बर संक्रमण से मरणशील लोकतंत्र को बचा सके। कहना न होगा कि जब विधयिका और न्यायपालिका अपनी अपनी ज़िम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभातीं, तो प्रशासन निरंकुश हो जाता है और उसका दुष्परिणाम जनता को पुलिस राज के रूप में झेलना पड़ता ही है। इसका उल्टा भी सच है। यानी, अगर किसी देश की व्यवस्था पुलिस राज में ढलती दिखाई दे, तो समझना चाहिए कि विधयिका और न्यायपालिका अपने दायित्व-निर्वहन में कहीं चूक रही हैं। अतः पुलिस की चूलें कसनी हैं, तो पहले विधयिका और न्यायपालिका को ज़िम्मेदार बनाना होगा।

अंततः, यहाँ प्रसंगहीन होकर भी 'धूमिल' की कविता 'पटकथा' का यह सवाल कितना प्रासंगिक है कि-

"अचानक, इस तरह,क्यों चुक गये हो?
वह क्या है जिसने तुम्हें
बर्बरों के सामने अदब से
रहना सिखलाया है?
क्या यह विश्वास की कमी है जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गई है?
या कि शर्म अब तुम्हारी सहूलियत बन गई है?"
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