शनिवार, 25 जुलाई 2020

बाहुबलि पुराण / तू राजा औऱ मैं तेरा स्वामी /आलोक यात्री



(शुक्ला से लेकर दुबे तक केवल सिस्टम की नाकामी)

  19 साल पहले विकास दुबे के खिलाफ जो मुकदमा लिखा गया था उसमें आरोप था कि उसने थाने में घुसकर तत्कालीन राज्य मंत्री संतोष शुक्ला की हत्या कर दी। पुलिस स्वयं गवाही से मुकर गई और तफ्तीश भी कमजोर रही। लिहाजा दुबे छूट गया। इसके बाद वह पूरी गुंडई के साथ अपना आतंक बढ़ाता रहा और 8 पुलिसवालों की हत्या तक से उसे गुरेज़ नहीं रहा। यह घटना आईना है उत्तर प्रदेश में वर्षों से चले आ रहे पुलिस, नेता और अपराधियों के गठजोड़ का। इसका पहला उदाहरण श्रीप्रकाश शुक्ला था। जिसका इस्तेमाल कई दिग्गज राजनितिज्ञों ने अपने लाभ के लिए किया। अपराध के रास्ते राजनैतिक महत्वाकांक्षा की ही परिणिति थी कि श्रीप्रकाश शुक्ला ने कथित रूप से मुख्यमंत्री की सुपारी ले ली थी। जिसने पूरे तंत्र को ही सकते में डाल दिया था। डॉन के नाम से मशहूर इस दुर्दांत अपराधी के सफाए के लिए सरकार को ऐतिहासिक कदम उठाते हुए सूबे में पुलिस के स्पेशल टास्क फोर्स का गठन करना पड़ा था।
  पुलिस का संरक्षण प्राप्त बदमाश दुबे डिप्टी एसपी समेत 8 पुलिस वालों को मार डाले, यह बात ताज्जुब में डाल देती है। इस घटना में दुबे की मानसिकता और पुलिस के प्रति उसके रवैए को समझना होगा। सूबे में पुलिस, सियासत और अपराध का गठजोड़ इतना मजबूत और भरोसेमंद है कि हार्डकोर अपराधियों के लिए पुलिसवालों की हत्या दरबार में आए दूत को मारने जैसा अनैतिक अपराध माना जाता है। बड़े से बड़े माफिया, ऑर्गेनाइज्ड गिरोह और बाहुबली भरसक कोशिश करते हैं कि उनके हाथों कोई पुलिस वाला न मारा जाए। लेकिन दुबे के हाथों हुए इस कांड ने पुलिस महकमे को हिला कर रख दिया है। सूबे के आपराधिक इतिहास में ऐसे दुस्साहस की घटनाएं गिनती की ही हैं। एक तो नक्सली हमले की ही है। 20 नवंबर 2004 में डेढ़ सौ से अधिक नक्सलियों ने घात लगाकर 17 कॉन्स्टेबल की हत्या कर दी थी। लगभग 20 साल पहले गाजियाबाद के कवि नगर थाने के दो सिपाहियों की भी महेश उर्फ बिच्छू द्वारा निर्मम हत्या कर उनके शवों को उनके हथियार समेत जला कर नष्ट कर दिया गया था। बिच्छू न सिर्फ पुलिस का मुखबिर था बल्कि उसे भी पुलिस का संरक्षण प्राप्त था। इससे पहले1981 में एटा जिले के अलीगढ़ थाना क्षेत्र में डाकू छविराम ने 9 पुलिस कर्मियों को घेरकर मार डाला था।
  अपने मुखबिरों और पुलिस में बैठे भेदियों के जरिए छविराम ने गिरोह का पीछा कर रहे इंस्पेक्टर राजपाल सिंह और उनकी टीम को थका-थका कर निढ़ाल कर डाला था। छविराम ने अपने गिरोह को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर पहले तो पुलिस को चकमा दिया। फिर घेरकर इंस्पेक्टर समेत 9 पुलिस वालों को मार डाला। इस दौरान बेहमई कांड व उसके बाद मल्लाह व यादव सामूहिक हत्याकांड के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन तब तक पुलिस ने एनकाउंटर में कुख्यात डकैत बाबा मुस्तकीम और छविराम गिरोह का सफाया कर दिया था।
  यह वह दौर था जब नेता, पुलिस, अपराधियों का गठजोड़ प्रारंभिक अवस्था में था। सूबे में पूरब से लेकर पश्चिम तक के किसी भी बड़े अपराधी गिरोह ने पुलिस से सीधे मोर्चा कभी नहीं लिया। तस्वीर को देखते हुए कहा जा सकता है कि राजनीति के अपराधीकरण का केंद्र गोरखपुर रहा है। 1980-90 के दशक में इलाके में हरिशंकर तिवारी गिरोह का दबदबा था। तिवारी तो विधायक बने ही उनके कई सिपहसालार भी विधायक का रुतबा पाने में सफल रहे। मधुमिता हत्याकांड में सलाखों के पीछे जीवन व्यतीत कर रहे अमरमणि त्रिपाठी भी उनमें से एक है। तिवारी की प्रतिद्वंदिता वीरेंद्र शाही गिरोह से है। दोनों गिरोह की आपसी मुठभेड़ में दर्जनों लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन दोनों ही बाहुबलियों ने पुलिस पर हमले का दुस्साहस आज तक नहीं किया।
  उस दौर में आमने-सामने की मुठभेड़ में पुलिस वाले की हत्या में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी सरगना श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम सुर्खियों में आया था। शुक्ला लखनऊ के हजरतगंज में एक मशहूर हेयर ड्रेसर की दुकान पर दाढ़ी बनवाने आया था। लेकिन पुलिस को इसकी भनक लग गई। घेराबंदी को धता बता कर शुक्ला फायरिंग करता हुआ दारुलशफा विधायक निवास की ओर भाग निकला। दरोगा आर. के. सिंह शुक्ला का पीछा कर रहे थे लेकिन ठोकर लगने से गिरे दरोगा की रिवाल्वर भी छिटक कर दूर जा गिरी। भाग रहा शुक्ला अचानक पलटा और रिवाल्वर उठाकर दरोगा की हत्या कर दी। हालांकि शुक्ला को बाद में इसका अंजाम भी भुगतना पड़ा।
  बनारस के बृजेश सिंह, त्रिभुवन सिंह, मुख्तार अंसारी, इलाहाबाद के अतीक अहमद जैसे बाहुबलियों ने पुलिस पर सीधा अटैक कभी नहीं किया। सवाल यह उठता है कि बाहुबली न होते हुए भी अपराध के निचले पायदान पर खड़े पच्चीस हजारिए दुबे ने पुलिस पर सुनियोजित तरीके से हमला क्यों किया? क्या वह इसके अंजाम से वाकिफ नहीं था? थाने में दुबे के हाथों मारे गए संतोष शुक्ला के भाई मनोज शुक्ला ने खुलासा किया था कि उसके भाई (तत्कालीन राज्य मंत्री) की हत्या का मुख्य आरोपी दुबे पुलिस की कमजोर चार्जशीट और पुलिस वालों के बयानों से मुकरने की वजह से कानून के शिकंजे से बच निकलने में सफल रहा था। तत्कालीन सरकार इस मामले में हाईकोर्ट भी नहीं गई। इलाके के एक प्रिंसिपल की हत्या के मामले में दुबे आजीवन जेल की सजा काट रहा था। लेकिन आम चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल के नेता ने उसे जेल से बाहर निकलवाने में मदद की थी। जिसका पुलिस स्तर पर कोई विरोध नहीं किया गया था। यही मदद पुलिस पर भारी पड़ी।
  अपराध की दुनिया में विकास दुबे की पुलिस चैलेंज की कहानी कुछ-कुछ कुख्यात माफिया सरगना श्रीप्रकाश शुक्ला के कारनामों से मेल खाती है। 1990 के दशक में गैंगस्टर शुक्ला का पूरे इलाके में आतंक था। शुक्ला के हौसलों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 25 वर्ष की उम्र में उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री की कथित तौर पर 6 करोड़ रुपए की सुपारी ली थी। शुक्ला इस कदर शातिराना दिमाग था कि पुलिस के पास उसकी मात्र एक ही फोटो थी। वह भी पुलिस को काफी जद्दोजहद के बाद हाथ लगी थी। श्रीप्रकाश का उदय भी गोरखपुर से ही हुआ था। उसने पहला कत्ल महज 20 साल की उम्र में किया था। कहा जाता है कि 1993 में राकेश तिवारी नाम के एक युवक ने श्रीप्रकाश की बहन को देखकर सीटी बजाने का गुनाह किया था। राकेश तिवारी की हत्या के बाद पुलिस से बचने के लिए शुक्ला बैंकॉक भाग गया। बैंकॉक से आने के बाद शुक्ला ने बिहार का रुख किया। जहां से उसने जुल्म की दुनिया में घोषित रूप से कदम रखा और कुख्यात सूरजभान गैंग का हिस्सा बन गया। जिसके बाद उसने जुर्म की दुनिया में तेजी से पांव पसारने शुरू कर दिए। 1997 में उसने कुख्यात माफिया सरगना और राजनेता वीरेंद्र शाही कि लखनऊ में दिनदहाड़े हत्या कर दी। कहा जाता है कि शाही की हत्या उनके विरोधी हरिशंकर तिवारी के इशारे पर की गई थी। इसके बाद शुक्ला ने लखनऊ में ही अमीनाबाद में लॉटरी के थोक विक्रेता पंकज श्रीवास्तव की उसके ऑफिस में घुसकर नृशंस हत्या कर दी। चंद रोज बाद लखनऊ के ही बिल्डर मूलचंद अरोड़ा का अपहरण कर उसने सनसनी फैला दी। कहा जाता है कि अरोड़ा की रिहाई के एवज में एक करोड़ रुपए की फिरौती वसूली गई। सरकारी टेंडर हथियाने को लेकर भी श्रीप्रकाश ने अगस्त 1997 में लखनऊ के एक होटल में ठहरे गोरखपुर के ठेकेदारों पर एके-47 से गोलियों की बौछार कर दी थी। इस हमले में एक ठेकेदार की जान चली गई थी। तीन अन्य घायल हो गए थे। जिसके बाद रेलवे टेंडर में श्रीप्रकाश का एकछत्र राज कायम हो गया। चंद महीने में ही शुक्ला आम लोगों से लेकर पुलिस तक के लिए खौफ का पर्याय बन गया। 13 जून 1998 को शुक्ला ने पटना के इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर लाल बत्ती गाड़ी से उतर रहे बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की भारी भरकम सिक्योरिटी के बावजूद हत्या कर दी।
  शुक्ला के अंत की पटकथा उत्तर प्रदेश के सचिवालय में तत्कालीन मुख्यमंत्री, गृहमंत्री और पुलिस महानिदेशक की मौजूदगी में लिखी गई। देश के इतिहास में श्रीप्रकाश शुक्ला जैसे किसी अपराधी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए पहली बार स्पेशल टास्क फोर्स जैसे किसी संगठन का गठन किया गया। श्रीप्रकाश शुक्ला को दबोच ने के लिए तत्कालीन एडीजी अजय राज शर्मा ने पुलिस के बेहतरीन 50 जवानों को छांट कर एसटीएफ का गठन किया था। श्रीप्रकाश के सफाई की मुहिम ऐसे ही तेजतर्रार अधिकारी अरुण कुमार को सौंपी गई थी। जिनकी अगुवाई में गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाना क्षेत्र के वसुंधरा इलाके में श्री प्रकाश शुक्ला को एनकाउंटर में ढेर किया गया। श्रीप्रकाश शुक्ला से लेकर विकास दुबे तक के उदय से लेकर एनकाउंटर में मारे जाने तक की कहानी यह बताती है कि बीते दो दशक में पुलिस, सियासत और अपराध का गठजोड़ और मजबूत हुआ है।
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