शनिवार, 27 जून 2020

आपातकाल पर देशबंधु का सम्पादकीय





देशबन्धु में संपादकीय आज.

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छह साल से लगातार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में रहने और कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने के बावजूद भाजपा किस कदर अपनी सत्ता और अस्तित्व को लेकर डरी हुई है, उसमें आत्मविश्वास की कितनी कमी है, इसका ताजा उदाहरण आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के ट्वीट के रूप में पेश हुआ है। दोनों ने ही आपातकाल की 45 बरसी पर ट्वीट किया। मोदीजी ने लिखा कि आज से ठीक 45 वर्ष पहले देश पर आपातकाल थोपा गया था। उस समय भारत के लोकतंत्र की रक्षा के लिए जिन लोगों ने संघर्ष किया, यातनाएं झेलीं, उन सबको मेरा शत-शत नमन! उनका त्याग और बलिदान देश कभी नहीं भूल पाएगा।

वहीं अमित शाह ने लिखा कि इस दिन, 45 साल पहले सत्ता की खातिर एक परिवार के लालच ने आपातकाल लागू कर दिया। रातों-रात देश को जेल में तब्दील कर दिया गया गया।  प्रेस, अदालतें, भाषण... सब ख़त्म हो गए। ग़रीबों और दलितों पर अत्याचार किए गए। एक अन्य ट्वीट में शाह ने कहा- लाखों लोगों के प्रयासों के कारण, आपातकाल हटा लिया गया था। भारत में लोकतंत्र बहाल हो गया था लेकिन यह कांग्रेस में गैरमौजूद रहा। परिवार के हित, पार्टी और राष्ट्रीय हितों पर हावी थे। यह खेदजनक स्थिति आज की कांग्रेस में भी पनपती है!

पता नहीं भाजपा नेताओं को, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को कांग्रेस की इतनी चिंता क्यों है। अमित शाह जी जिस परिवार के हित की बात कर रहे हैं, यानी बिना नाम लिए गांधी परिवार को निशाना बना रहे हैं, क्या वे इस बात को नहीं जानते कि उसी गांधी परिवार के दो लोगों इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की निर्मम हत्या हुई।

यह सच है कि आपातकाल भारतीय राजनीति के दुखद अध्यायों में दर्ज है। 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के हालात देखते हुए संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर आपातकाल लागू किया था। इसके बाद देश के बड़े हिस्से में दमन का सिलसिला जारी हुआ। प्रेस की स्वतंत्रता बाधित हुई। विरोधियों से राजनैतिक हिसाब-किताब चुकता किया गया।  बहुत से लोगों को जेल भेजा गया। आपातकाल का विरोध करने वाले कई तरह की ज्यादतियों का शिकार भी बने। तब बहुत से राजनैतिक विश्लेषकों ने लोकतंत्र को ख़तरे में बताया। लेकिन कड़े संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी और सुदीर्घ मंथन के बाद स्थापित लोकतंत्र का महत्व तब की जनता जानती थी। इसलिए भारत का लोकतंत्र कुछ समय के लिए डांवाडोल होने के बाद फिर से मजबूत स्थिति में आ गया।

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी को हार मिली। लेकिन उसके बाद उन्हीं इंदिरा गांधी को फिर से जनता ने सिर-माथे पर बिठाया। उनकी असामयिक हत्या के बाद राजीव गांधी सत्ता में आए। फिर 1991 में वापस नरसिंह राव के नेतृत्व में केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी। उसके बाद 2004 से लेकर 2014 तक फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की सरकार रही। कहने का आशय यह कि जिस आपातकाल की याद दिलाकर बार-बार यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि कांग्रेस ने लोकतंत्र को कुचल दिया। उसी कांग्रेस के हाथों जनता ने देश की कमान कई बार सौंपी। और यह सब जानते हैं कि जनतंत्र जनता से ही संभव है।

आपातकाल के दौर में जिन लोगों ने जेलयात्राएं कीं और सत्ता की ज्यादतियां सहन कीं, उनमें से कई बड़े राजनेता बने, कई बड़े पत्रकार बनकर बाद में दिल्ली की सत्ता के सिपहसालार बने और जो यह सब नहीं कर पाए, वे अब आपातकाल के दौरान उठाए कष्टों के नाम पर किसी न किसी तरह का लाभ अर्जित करने में सफल रहे। लेकिन उनमें से अब गिने-चुने लोग ही हैं, जो मौजूदा सत्ता की आलोचना के लिए मुंह खोल पाते हों।

पांच साल पहले आपातकाल के चार दशक पूरे होने के मौके पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने देश में फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया था। आडवाणी जी ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में देश को आगाह किया था कि लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताक़तें आज पहले से अधिक ताकतवर हैं और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल जैसी घटना फिर दोहराई नहीं जा सकती। उन्होंने जो अंदेशा जतलाया था, वह आज सच होता नजर आ रहा है।

भाजपा को कांग्रेस के अंदरूनी लोकतंत्र की परवाह है, लेकिन वह इस तथ्य को अनदेखा कर रही है कि आज सरकार भी कुछ गिने-चुने लोग ही चला रहे हैं और बाकियों को पता भी नहीं चलता कि कब उनके अधिकारक्षेत्र से संबंधित फैसला सुना दिया जाता है। अमित शाह जी को प्रेस, अदालतें, भाषण सब खत्म हो जाने का अफ़सोस था। लेकिन आज उनके शासन में क्या हालात हैं, इसकी समीक्षा वे करेंगे। स्वतंत्र मीडिया किस चतुराई से गोदी मीडिया में बदल दिया गया। अदालती फैसलों पर सवाल उठने लगे। लोगों को अपनी बात कहने के लिए देशद्रोह का इल्जाम झेलने और कई बार तो झूठे आरोप में जेल जाने तक की नौबत आ गई।

शिक्षा संस्थान राजनीति की कुटिल चालों का केंद्र बन गए और कई छात्रों का भविष्य सरकार की मुखालफत करने के कारण दांव पर लग गया। सीबीआई, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं पर सरकारी दबाव का असर देखा गया। संवैधानिक संस्थाओं को योजनाबद्ध तरीके से बेअसर किया गया। जो भाजपा कांग्रेस पर व्यक्तिपूजा और परिवारवाद का आरोप लगाती है, उसी भाजपा में नरेन्द्र मोदी को दैवीय शक्तियों से युक्त बताने की चाटुकारिता बड़े नेता कर चुके हैं और परिवारवाद से भी वह मुक्त नहीं रह पाई है। संसद, विधानसभाओं से लेकर बीसीसीआई तक इसके उदाहरण मौजूद हैं।

पिछले छह सालों में अभिव्यक्ति के अधिकार, जातीय और लैंगिक बराबरी, न्यायिक स्वतंत्रता, धार्मिक सद्भाव, इन तमाम लोकतांत्रिक गुणों पर भरपूर आघात सत्ता की नाक के नीचे हुआ और भाजपा को अब भी 45 साल पहले लगे आपातकाल में लोकतंत्र की फिक्र हो रही है। भाजपा के साथ वे तमाम लोग भी गुजरे जमाने के आपातकाल को खूब याद कर रहे हैं, जो आज भाजपा को इस मुकाम पर लाने में सहयोगी बने हैं। 2011 में भ्रष्टाचार के नाम पर लड़ाई छेड़ने वाले और लोकपाल के लिए आंदोलन करने वाले अब यूपीए को सत्ता से बेदखल कर अपने-अपने कूचों में आराम फरमा रहे हैं।

अन्ना हजारे को अब देश में शायद कहीं कुछ गलत नहीं लगता। किरण बेदी भाजपा के राज में राज्यपाल बन गईं। अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए। उस आंदोलन के बहुत से साथी भाजपा और आप के खेमों में बंटकर आंदोलन में उठाए कष्टों का मेवा खा रहे हैं। इन्हें अब न भ्रष्टाचार की फिक्र है, न लोकपाल की, न लोकतंत्र की। और जनता भी मौजूदा आफ़तकाल पर आवाज न उठाने लगे, इसलिए उसे 45 साल पुराने आपातकाल की याद दिलाई जा रही है। अतीत के भरोसे वर्तमान की गलतियों पर चादर ढंकने की यह कोशिश देश के भविष्य पर बहुत भारी पड़ने वाली है।

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