शुक्रवार, 19 जून 2020

दिल्ली को कोरोना ने लूटा /अरविंद कुमार सिंह





कोरोना पी़ड़ितों की प्रयोग भूमि बनी दिल्ली

दिल्ली के बारे में एक पुराना शेर है जिसका आखिरी हिस्सा बताता है कि ‘ जो भी गुजरा हैै, उसने लूटा है। ‘ लेकिन ये कहावत उस दौर की है जब तमाम हमलावर लूट के इरादे से यहां आते थे। अब तो अपना राज है। दिल्ली कमजोर राज्य हो या मजबूत लोगों पर इसका असर नहीं होता। दिल्ली में क्या हो रहा है इसका पूरे देश पर मनोवैज्ञानिक असर मुंबई से भी ज्यादा होता है जो देश की आर्थिक राजधानी है। इसी नाते कोरोना संकट में दिल्ली की केजरीवाल सरकार विफलता के कारण राष्ट्रीय आलोचना का विषय बन गयी है। यहां मैं नाहक आलोचना नहीं कर रहा क्योंकि मैं भी दिल्ली सरकार के मोहल्ला क्लीनिक माडल से प्रभावित रहा हूं और मुझे लगता था कि देश में सबसे बेहतर तरीके से दिल्ली कोरोना से निपटते हुए एक नयी और प्रेरक राह बनाएगी। लेकिन दिल्ली की विफलता ने सबकी चिंता को बढ़ा दिया है। आज दिल्ली अजीबोगरीब प्रयोगभूमि बनी हुई है। तमाम कहानियां बताती हैं कि कोरोना पीड़ितों को उसी तरह मरने के लिए छोड़ दिया गया है जैसे साधनविहीन इलाकों में।
साधन संपन्नता के बाद भी ऐसी क्या समस्या है कि  दिल्ली सरकार के 38 अस्पतालों में से 33 दिल्ली के भीतर कोरोना मरीजों का उपचार नहीं कर रहे हैं और मरीजों को लेने से मना कर रहे हैं। उनसे कहा जा रहा है कि इसके लिए बने पांच 5 डेडिकेटेड अस्पतालों में आप उनमें जाईए। इन पांचों अस्पतालों में 4,400 बिस्तरें हैं जिसमें भी मात्र 28 फीसदी बिस्तरों पर मरीज हैं और 72 फीसदी बिस्तरे खाली हैं। फिर भी जनता को दर-दर भटकना पड़ रहा है। जहां 3,156 बिस्तरे खाली हों वहां का क्या कहें। इसकी तुलना में निजी अस्पतालों में 40 फीसदी बिस्तरे खाली हैं। गंगा राम अस्पताल जिसके केवल 12 फीसदी बिस्तरे खाली हैं और 88 फीसदी भरे हैं उन पर तो एफआईआर दर्ज की गयी है, बाकी 33 अस्पताल मरीजों को लेने मना कर रहे हैं वे मुक्त हैं।
दिल्ली में भारत सरकार के अधीन सबसे प्रतिष्ठा के अस्पताल ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ओफ मैडिकल साइंस (AIMS), सफदरजंग अस्पताल, लैडी हार्डिंग अस्पताल, डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल आदि हैं। कई स्वायत्त संस्थाएं भी भारत सरकार के अदीन हैं। भारत सरकार के पास दिल्ली में 13,200 बिस्तरों के अस्पताल है जबकि दिल्ली नगर निगम के पास 3,500 बिस्तरो के अस्पताल हैं। यानि दोनों मिलाकर 16,700 बिस्तरे होते हैं। लेकिन इनमे से केवल 1,502 बिस्तरे कोरोना मरीजों के लिए आरक्षित हैं। मतलब भारत सरकार के तहत केवल 8 फीसदी बिस्तरे कोरोना मरीजों के लिए हैं। यही नहीं मृत लोगों का दाह संस्कार भी पांच पांच दिन में नहीं हो पा रहा है।
दिल्ली सरकार के द्वारा 2 जून को  गठित डॉ. महेश वर्मा कमेटी ने कहा ता कि इस महीने के अंत तक एक लाख व्यक्ति दिल्ली में संक्रमित होगा। 15 जुलाई तक 42,000 बिस्तरों की दिल्ली में जरूरत होगी जो अभी केवल 8,600 हैं। इस कमेटी ने ये भी कहा कि 20 फीसदी यानि 1700 बिस्तरे वेंटिलेटर वाले रिजर्व होने चाहिए। लेकिन आलम यह है कि कि सिर्फ 472 बिस्तरे दिल्ली में हैं जिसमें वेंटिलेटर हैं। इनको 15 जुलाई तक 10,500 करना अब किसी के बस की बात नही हैं। ये आंकड़े दिल्ली सरकार में मंत्री और विधान सभा अध्यक्ष रहे अजय माकन ने आज सार्वजनिक किए हैं। वे केंद्रीय गृह राज्यमंत्री भी रहे हैं औऱ मैने लंबे समय से देखा है कि होमवर्क करके ही अपनी बात रखते हैं। अगर ऐसी तस्वीर है तो फिर समझा जा सकता है कि दिल्ली कहां बैठी है।
जन स्वास्थ्य के मामलों में सबसे संपन्न इलाका भारत में महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली माना जाता है। जिलों में सबसे बुरी दशाएं हमारे प्रांत उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में है। लेकिन वहां अभी ईश्वर की कृपा बनी हुई है। समय है कि तत्काल इस मसले पर भारत सरकार मोरचा संभाले और दिल्ली सरकार, एमसीडी और एनडीएमसी समेत सारी स्वायत्त संस्थाएं अपने दरवाजे तड़प रहे लोगों के लिए खोलें।

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