शुक्रवार, 19 जून 2020

हारना और हार को स्वीकारना ही जीवन है / मनु लक्ष्मी मिश्रा





अपने बच्चों को हारना भी सिखाइये और हार को सकारात्मक रूप से लेना भी सिखाएं वरना वो हलका सा झटका भी न झेल पाएंगे । 1960 और 1970 के दशक में पैदा हुए अधिकांश बच्चे अपने अभिभावकों से इतनी बार कूटे गए हैं कि मुझे लगता है इनसे मजबूत शायद ही कोई हो । कई बार तो बिना गलती के भी कूट दिए जाते थे। घर में कोई हथियार नहीं बचा जिससे मारा नहीं गया हो चप्पल, फूंकनी, चिमटा, कपडे धोने का सोटा, पानी का पाइप, झाड़ू आदि का प्रयोग हुआ और आज देखो हम अपने बच्चों के एक थप्पड़ भी नहीं मार सकते, जब से एक या दो बच्चों का चलन चल निकला था बस वहीँ से पिटाई कम होते होते बंद हुई है ।
हमारे समय तो पूरा मोहल्ला एक परिवार कि तरह  होता था, मोहल्ले के चाचा ताऊ भी मौका मिलते ही हाथ साफ कर लेते थे आज किसी के बच्चे को डाटं भी नहीं सकते ।
हम भी तभी की पैदावार हैं और इतने पक्के हो चुके हैं कि आत्महत्या तो दूर की बात सामने वाले को ही दस बातें सोचने पर  मजबूर कर दें । जीवन में डिप्रेशन के उतार चढ़ाव देख के इतने ढीट हो चुके हैं कि अब जब भी जीवन में डिप्रेशन वाली सिचुएशन आती है तो वहीं समय याद आ जाता है ।

एक कहानी कहीं पढ़ी थी सुनाती हूँ-एक व्यक्ति का दाहिना हाथ किसी दुर्घटना में कट गया। उसे डिप्रेशन हो गया। लगा सोचने कि जी कर क्या करूँ, लोग लूला  कह कर चिढ़ाते हैं... उसने सोचा कि आत्महत्या कर लेता हूँ, मुक्ति मिल जाएगी। फिर उसने सोचा कि जब मरना ही है तो शान से मरें, सो तय किया सबसे ऊंचे टावर स्टारडम बिल्डिंग पर से कूद जाता हूँ।
    अगले दिन वह  स्टारडम बिल्डिंग पर चढ़ गया। ऊपर से वह कूदने ही वाला था कि नीचे देखा, "एक आदमी जिसके दोनों हाथ नहीं थे, वह उछल उछल कर नाच रहा था।" लूले ने सोचा, "साला मेरा हाथ नहीं है तो मैं मरने जा रहा हूँ, और इसके दोनों नहीं हैं फिर भी नाच रहा है? यह कैसे हो सकता है? उसने कहा, "मरना कैंसल! पहले इस नाचने वाले से बात करते हैं, फिर सोचेंगे..."
    वह ऊपर से उतरा, नाचने वाले के पास गया और डांट कर बोला, "क्यों बे! तुझे ऐसी क्या खुशी मिल गयी कि उछल रहा है? तेरे दोनों हाथ नहीं है फिर भी नाच रहा है, कैसे?"
     उसने गुर्रा कर देखा और कहा, "साले! तेरे भी दोनों हाथ कट जाएं और पिछवाड़े में खुजली हो तो तू भी ऐसे ही नाचेगा..."

     यह जिन्दगी जो है न! किसी को परफेक्ट नहीं बनाती। पैजामा देती है तो नाड़ा खींच लेती है। यहां सबकी शर्ट का एक न एक बटन टूटा ही हुआ है। फिर भी यह कम सुन्दर नहीं। इतनी सुन्दर है कि इससे इश्क कर लिया जाय।
     जीवन में यदि उपलब्धियों के कारण घमण्ड होने लगे तो अपने से आगे वाले को देखना चाहिए, और यदि विपत्तियों के कारण अवसाद घेरे तो पीछे वालों को... आप ना ही सबसे आगे हो सकते हैं, न ही सबसे पीछे... हम सब बीच में हैं, अपने अपने हिस्से की उपलब्धियों के साथ। इस जीवन में हमें जो चीज सबसे अधिक बुरी लगती है, वह भी तभी तक है जबतक जीवन है। जीवन न रहे तो वह भी नहीं मिलेगी... सो क्यों न मुस्कुरा कर जीयें?
     जीवन फुटबॉल या हॉकी नहीं है, जो एक बार चूक गए तो आगे गोल मार देंगे। जीवन क्रिकेट की तरह है, एक बार बॉल विकेट को छू गयी तो कुछ भी कर लो दुबारा बैट पकड़ने का मौका नहीं मिलेगा। जिंदगी बार बार बाउंसर मारती है, पर हमारी ड्यूटी है कि हम उसको रोकते रहें। न लगे छक्का-चौका, सिंगल ही सही... वह भी न मिले तो ओवर चाट जाना भी बुरा नहीं। अरे पचास ओवर तो केवल इस उम्मीद पर खेले जा सकते हैं कि कहीं अगली बॉल फुलटॉस आ जाय... मजा खेलने में है, रन तो बाद की बात है।
    क्रिकेट का ही एक किस्सा है, शायद इंग्लैंड के विरुद्ध ओपनिंग करने उतरे थे सुनील गावस्कर... उस दिन उनसे रन ही नहीं बन रहे थे। पूरा का पूरा ओवर बिना रन के चला जाता। हार कर उन्होंने कैच उठाया पर फील्डर मुस्कुरा मुस्कुरा कर कैच भी छोड़ देते... गावस्कर साठ ओवर के खेल में अंत तक नॉट आउट रहे और रन बनाए 36. गावस्कर भले अपनी इस पारी को याद करना न चाहें, पर यह पारी भी एक तरह की विश्व रिकार्ड ही है।
     सच पूछिए तो फेल होने का भी अपना एक अलग ही मजा है। कल्पना कीजिये कि किसी अखाड़े में हारने वाला पहलवान धूल झाड़ कर खड़ा हो और जीतने वाले को आँख मार कर मुस्कुरा दे... एकाएक सारे दर्शक होहकार लगाते हुए उसकी ओर हो जाएंगे। जीवन को ऐसे भी जिया जा सकता है।
     कुछ लोगों में टॉप करने की जिद्द होती है। फोकट का टेंशन देती है यह जिद्द...आप देश के सारे प्रधानमंत्रियों के बारे में पढ़ लीजिये, उनमें से कोई स्कूल टॉपर नहीं रहा होगा। आप अपने राज्य के मुख्यमंत्रियों को ही देख लीजिए, कोई स्कूल टॉपर नहीं मिलेगा... कोई बड़ा उद्योगपति स्कूल टॉपर नहीं रहा होगा... यह सिद्ध करता है कि किसी एक फील्ड में फेल होने का मतलब यह नहीं कि सारे रास्ते बंद हो गए। पिच पर डटे रहे तो किसी न किसी गेंद पर छक्का लग ही जायेगा। पिच पर डटे रहना महत्वपूर्ण है।
      एक नितांत व्यक्तिगत बात बताती हूँ जब पहली बार मेरे जीवन में ऐसी अवसादपूर्ण स्थिति आई थी । जब मैं कक्षा ११ में संत अन्थोनी में पढ़ती थी,भाई बहनों में सबसे बड़ी थी ,बाबा के न रहने पर पिता जी तीसरे नंबर के भाई होने के बावजूद पूरे परिवार जो गाँव में रहते थे की ज़िम्मेदारी लिए थे ।प्रतिवर्ष किसी न किसी चाचा या दादा की लड़की की शादी होती थी ।पूरा दहेज देने की ज़िम्मेदारी मेरे पिता जी की थी तो पूरी तनख़्वाह इसी में खर्च हो जाती थी ।अपने परिवार यानि की हम भाई बहनों का पालन पोषण करने के लिए वे ट्यूशन करते थे ।संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे ,चरित्रवान तो इतने कि प्रयाग के बड़े बड़े लोग अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए उन्हें गुरु जी रखते थे ।मेरे पिता जी बहुत मेहनत करते ,जब मैं ११वीं में आई तो पता नहीं कैसे एक आवारा टाइप का लड़का हम लड़कियों का पीछा करने लगा ।अब क्या करें,एक दिन साथ में कोई लड़की नहीं थी वो मेरा पीछा करने लगा ।डरते डरते घर पहुँची ।मन नहीं लगा कि घर से स्कूल दो कदम पर है कोई देख लेगा तो पिता जी से कह देगा ।बात आई गई हो गई वह उच्छृंखल लड़का और उद्दंड हो गया ।रोज़ पीछा करता पर हिम्मत न पड़ती विरोध की ।एक दिन वही हुआ जिसका डर था ,रात को पिता जी ने बुलाया और पास बैठाया बेटा तुम मेरी सबसे बड़ी बेटी हो लाडो,कोई कमी छोड़े हैं का बताओ।नहीं पिता जी आप को कोई कुछ कहा क्या ?बिटिया सच सच बताओ ।कुछ नहीं पिता जी कुछ नहीं कहते कहते आंसू आ गए आवाज़ भराभरा गई ।माँ वहीं बैठी थीं पर पिता की आँखों को डबडबाते देख भरभराकर उनकी गोद में गिर गई ।दोनों बाप बेटी जम के रोये ,माँ भी रोने लगी ।फिर मुँह हाथ धोकर खाना खाए ।पिता जी एक शब्द भी कुछ नहीं पूँछें ।बात आई गई हो गई पर बड़ी ग्लानि महसूस हो रही थी ।पिताजी तक ये बात पहुँची,इतने अच्छे पिता की बेटी होकर मैंने उन्हें बहुत दुख दिया ।अंदर अंदर घुटने लगी ,सोच रही थी कि कैसे धरती फट जाय और मैं मर जाऊँ,एक्सीडेंट हो जाय मर जाऊँ या कहीं ज़हर मिल जाय खा लूँ पर विचार कौंधा कि किसी ने तो ज़रूर ये बात पिताजी को बताई होगी अगर मैं मर गई तो मेरे पिता को ये लोग झूठ मूठ ब्लेम करेंगे औरमेरे चरित्र पर लांछन लगायेंगे ।नहीं मैं कायर नहीं हूँ ।तुरंत हनुमान चालीसा पढ़ी,मन शांत हुआ और निश्चय किया कि अब कोई पीछा करें तो बताऊँ ।एक दिन हम लड़कियों स्कूल जा रहीं थी वही लड़का कुछ लफ़ंगे लड़कों के साथ कोई गाना गा रहा था और हम लोगों के पीछे पीछे चल रहा था ।घर आनंद भवन के पास और स्कूल भारद्वाज आश्रम के पास यानी की पैदल का रास्ता ।न जाने कहाँ से हिम्मत आ गई,मैं वहीं रुक गई सब लड़कियाँ कहने लगीं मनु चल न चल ,ये दुष्ट हैं परेशान करेंगे ।मैंने ललकार के उन दुष्टों को अच्छी अच्छी उत्कृष्ट गालियों से नवाज़ा ।सब भाग खड़े हुए ये कहते हुए चल भाग बे येमें काली माई चढ़ि आई हैं,अबहिन सब लोग घेर लेहैं ।सब भाग गये ।आज मुझे लगता है कि मैं पहली बार मन से कमजोर हुई पर मेरे पिता के प्यार ने मुझे बचा लिया । एक बात और है अवसाद का दौर कभी न कभी सबके जीवन में आता है... पर परिवार और समाज मिल कर हमेशा अवसाद से बाहर निकाल देते हैं। परिवार और समाज की आवश्यकता सबसे अधिक इसी दिन के लिए है। सो अपने परिवार से, समाज से जुड़ कर रहना ही बेहतर
      यह जिन्दगी बहुत खूबसूरत है इतनी खूबसूरत कि एक जन्म तो केवल मस्ती करने के लिए जी लिया जाय। गाँव में तो कुछ बूढ़वे साले केवल इसलिए जीते हैं कि गाँव भर को परेशान कर सकें...
      सो मुस्कुरा कर कहिये, लव यू जिंदगी! हारेंगे तो हुरेंगे, जीतेंगे तो थुरेंगे...।
 सुशांत मेरा प्यारा हीरो चला गया ,पर हारना नहीं चाहिए ।वो स्पेशल था तो हारा क्यों, लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं उसके साथ फ़िल्म इंडस्ट्री के मठाधीश सौतेला व्यवहार करते थे ।वो करण जौहर की तरह द्विअर्थी वाहियात मजाक नहीं कर सकता था, अवॉर्ड फंक्शन्स में बेवकूफाना हरकतें नहीं कर सकता था, वो विज्ञान की बातें कर सकता था, वो चांद तक पहुंचने के ख़्वाब बुन सकता था, वो बच्चों के लिए फ्री एजुकेशन की बातें कर सकता था, वो लोगों का सम्मान कर सकता था, लेकिन इन जैसा कभी नहीं बन सकता था। लगाओ पैग, मनाओ खुशियां, अभी ना जाने कितने सुशांत और बाकी होंगे। सुशांत चाहे तुम हीरो रहते या नहीं रहते पर अपने बाप का सहारा तो रहते।तुम्हारी बहनों का हाथ राखी लिए भाई को खोजता रहेगा। नहीं जाना चाहिए था भाई , लोग कह रहे हैं छोटे शहर का लड़का था, कमजोर पड़ गया, तुमने हम छोटे शहर वालों की नाक कटा दी ।मैं कुछ भी कहूं पर मैं जानती हूं तुम बहुत दुखी रहे होंगे तभी ऐसा निर्णय लिया है। तुम्हारी आत्मा को ईश्वर शांति दें हम लोग तुम्हें कभी भूलेंगे नहीं।

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