रविवार, 28 जून 2020

हाँ मैं बुद्ध नहीं बन सकता / प्रवीण परिमल






▪1985 में प्रकाशित

मेरी पहली कविता-पुस्तक #तुममें_साकार_होता_मैं से
एक कविता आप मित्रों के लिए....

#हाँ_मैं_बुद्ध_नहीं_बन_सकता

नहीं, मैं बुद्ध नहीं बन सकता
मुझे अज्ञानी ही रहने दो
प्रबुद्ध नहीं बन सकता
क्योंकि, न तो मेरा बाप शुद्धोधन है
न ही माँ माया
न तो पत्नी यशोधरा है
न ही पुत्र राहुल!
और तो और ...
मैं ख़ुद भी सिद्धार्थ नहीं हूँ!

फिर किसे,
किसके भरोसे पर छोड़ जाऊँ
अपनी जिम्मेदारियों से
कैसे मुँह मोड़ जाऊँ?

तुम ही बताओ---
आख़िर कौन खरीदेगा
वृद्ध पिता के लिए चश्मे
और वक्त काटने के लिए
'रामायण' की एक प्रति

कौन लाएगा
मां के लिए दमे की दवा
और सिर पर थोपने के लिए
ठंडे तेल की एक शीशी

कौन बनवाएगा
पत्नी के लिए साया- कुर्ती
और चाँदी के एक जुड़े झुमके

और कौन खरीदेगा
बेटे के लिए स्कूल की किताबें,
पहनने के लिए स्कूल-ड्रेस ??

नहीं नहीं,
मैं बुद्ध नहीं बन सकता
मुझे अज्ञानी ही रहने दो
प्रबुद्ध नहीं बन सकता
क्योंकि, अभी मुझे ऑफिस जाकर
ओवरटाइम - वाउचर भुनाना है,
बनिए का पिछला उधार चुकाना है
और इस माह के लिए
घर का राशन लाना है!
फिर रात को देर तक ट्यूशंस करने हैं
वरना कैसे चुकाऊँगा
घर का किराया
बिजली का बिल
कहाँ से दूँगा
पैसे , दूध और कोयलेवाले को?

नहीं नहीं,
मुझे माफ कर देना
क्योंकि , मैं बुद्ध नहीं बन सकता
मुझे अज्ञानी ही रहने दो
प्रबुद्ध नहीं बन सकता!

हाँ,  कुछ हद तक
श्रवण कुमार ही बन जाऊँ
वही बहुत है
परिवार- नौका का पतवार बन जाऊँ
वही बहुत है...
क्योंकि, न तो मेरा बाप शुद्धोधन है
न ही माँ माया
न तो पत्नी यशोधरा है
न ही पुत्र राहुल
और तो और...
मैं ख़ुद भी सिद्धार्थ नहीं हूँ!

इसलिए मुझे माफ करना
मैं सचमुच बुद्ध नहीं बन सकता!
मैं सचमुच बुद्ध नहीं बन सकता!!

मैं सचमुच बुद्ध नहीं बन सकता!!!
     
     ▪प्रवीण परिमल



कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें